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क्या हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लैंगिक भेदभाव करता है? पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

LiveLaw News Network
16 Sep 2019 4:25 AM GMT
क्या हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लैंगिक भेदभाव करता है? पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस
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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक कानून के छात्र की तरफ से दायर याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है।

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के छात्र दक्ष कादियान द्वारा दायर याचिका में अधिनियम को यह कहते हुए चुनौती दी गई है कि यह लैंगिक भेदभाव करता है। याचिका में कहा गया है कि अधिनियम के अनुसार बिना वसीयत के व्यक्ति की मौत हो जाने के मामले में उत्तराधिकारी की योजना बेटियों के ऊपर बेटों को वरीयता देती है।

अधिनियम की धारा 8 के अनुसार, एक पुरुष हिंदू अगर बिना वसीयत किए मर जाता है तो उसकी संपत्ति पर पहला हक प्रथम श्रेणी के वारिसों का बनता है। यह बात अनुसूची में निर्दिष्ट है। अगर प्रथम श्रेणी का कोई वारिस नहीं है तो उस स्थिति में संपत्ति पर दूसरी श्रेणी के वारिसों का हक बनता है।

जबकि अधिनियम में बेटी के वारिसों को दूसरी श्रेणी में रखा गया है और बेटों के वारिसों को प्रथम श्रेणी में स्थांतरित कर दिया गया है। याचिका में कहा गया है कि ऐसे में यह वर्गीकरण मनमाना है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। यहां तक कि दूसरी श्रेणी के वारिसों की लाइन में भी महिला लाइन की तुलना में पुरूष लाइन को वरीयता दी गई है। उदाहरण के तौर पर, रिश्तेदारों जैसे मां के माता-पिता व भाई-बहन आदि को पिता के माता-पिता व भाई-बहनों के बाद रखा गया है।

महिला की ओर से आए वारिसों पर पुरुष की ओर के वारिसों को वरीयता देना लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण है, जो संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत निषिद्ध है।

याचिका

अधिवक्ता सार्थक गुप्ता के माध्यम से दायर इस याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिनियम पिता पक्ष या सगोत्र को सजातीय पर वरीयता देता है। एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का सगोत्र तब कहा जाता है, जब इन दोनों के बीच में एक पुरूष के माध्यम से खून का रिश्ता हो या गोद लेने से आपस में जुड़े हो। अगर कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से खून के रिश्ते से या गोद लेने से जुड़ा हो,परंतु ऐसा रिश्ता पूरी तरह से किसी पुरूष के माध्यम से ना हो तो इसे 'काग्रेट या सजातीय' कहा जाता है।

बिना वसीयत के किसी की मौत हो जाने के मामले में उत्तराधिकारी की योजना के अनुसार, सबसे पहले, संपत्ति पर प्रथम श्रेणी में वर्णित रिश्तेदारों का हक होगा। अगर प्रथम श्रेणी में कोई उत्तराधिकारी नहीं है तो उस संपत्ति पर दूसरी श्रेणी के उत्तराधिकारियों का हक बनेगा। अगर प्रथम श्रेणी और दूसरी श्रेणी में कोई उत्तराधिकारी नहीं है तो 'ऐग्रेट या सगोत्र' पर विचार किया जाता है। अगर कोई 'सगोत्र' भी नहीं है तो उसके बाद ही 'काग्रेट या सजातीय' पर विचार किया जाता है।

याचिका में इसे भी लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण बताया गया है। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से बीस सितम्बर तक जवाब मांगा है।

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