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INX मीडिया केस : चिदंबरम के खिलाफ PMLA के पूर्वव्यापी प्रावधान नहीं बल्कि 2007 के बाद भी मनी लॉन्ड्रिंग जारी रही : सॉलिसिटर जनरल

LiveLaw News Network
28 Aug 2019 12:42 PM GMT
INX मीडिया केस : चिदंबरम के खिलाफ PMLA के पूर्वव्यापी प्रावधान नहीं बल्कि  2007 के बाद भी मनी लॉन्ड्रिंग जारी रही : सॉलिसिटर जनरल
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INX मीडिया केस में चिदंबरम के वकीलों की उन दलीलों का जवाब देते हुए कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) को पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospective effect) से चिदंबरम पर लागू किया गया है, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को कहा कि वर्ष 2007 के INX एफडीआई सौदे के बाद भी मनी लॉन्ड्रिंग जारी रही।

पीठ ने चिदंबरम को मिली गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा बढ़ाई

दरअसल वरिष्ठ वकील डॉ ए. एम. सिंघवी ने मंगलवार को कोर्ट में कहा था कि वर्ष 2009 में PMLA में जोड़े गए प्रावधान INX एफडीआई लेनदेन के संबंध में चिदंबरम के खिलाफ लगाए गए। सॉलिसिटर जनरल गुरुवार को भी बहस जारी रखेंगे। जस्टिस आर. बानुमति और जस्टिस ए. एस. बोपन्ना की पीठ ने ईडी मामले में चिदंबरम को मिली गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा को बढ़ा दिया है।

"मनी लॉन्ड्रिंग के पैसे का उपयोग भी है अपराध"

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि लॉन्ड्रिंग अपने आप में एक अपराध है। अगर लॉन्ड्रिंग का पैसा उपयोग में है तोे ये भी अपराध है। प्रवर्तन निदेशालय को किसी व्यक्ति को एक उचित विश्वास पर गिरफ्तार करने का वैधानिक अधिकार है कि उसने अपराध किया है। सुप्रीम कोर्ट हिरासत में लेकर पूछताछ के अधिकार पर रोक नहीं लगा सकता।

सॉलिसिटर जनरल ने मामले की जटिलता को किया रेखांकित

"हम बहुत बुद्धिमान लोगों के साथ डील कर रहे हैं। एक बेवकूफ आदमी मनी लॉन्ड्रिंग नहीं कर सकता। इस तरह के अपराध की शुरुआत अचानक नहीं होती है। इसे परतों में छिपाना पड़ता है। यह अन्य अपराधों के विपरीत ज्यादातर डिजिटल ऑपरेशन है। ये बलात्कार जैसा अपराध नहीं है जहां फोरेंसिक एक्सपर्ट की जरूरत पड़ती है," SG ने पीठ को बताया।

"लॉन्ड्रिंग एक स्वतंत्र अपराध है और भारत, लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाने के लिए बनाए गए वैश्विक वैधानिक नेटवर्क का एक हिस्सा है। हमारे पास ऐसे अपराधियों को सजा सुनिश्चित करने का एक पारस्परिक अंतर्राष्ट्रीय कर्तव्य है," सॉलिसिटर जनरल ने आगे कहा।

सॉलिसिटर जनरल ने केस डायरी के अदालत द्वारा अवलोकन पर दिया जोर

सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट से यह आग्रह किया कि हिरासत की पूछताछ की आवश्यकता के बारे में 'न्यायिक विवेक' को संतुष्ट करने के लिए अदालत द्वारा केस डायरी पर गौर किया जाए। आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 172 का उल्लेख करते हुए तुषार ने कहा कि केस डायरी, हालांकि सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं की जा सकती है, फिर भी कोर्ट द्वारा जांच में सहायता के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। अग्रिम जमानत की सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी द्वारा एकत्र की गई सभी सामग्रियों को अदालत में भेजने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह जांच को प्रभावित कर सकती है।

"हम चार्जशीट दाखिल होने तक जांच की रिपोर्ट साझा नहीं कर सकते हैं। यह बहुत संवेदनशील है," उन्होंने कहा। उस समय वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने यह कहते हुए हस्तक्षेप किया कि याचिकाकर्ता की ये दलील नहीं थी कि सभी सामग्रियों को न्यायालय को दिखाया जाना चाहिए।

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