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ICJ ने पाकिस्तान को जाधव की मौत की सजा पर पुनर्विचार करने और कांसुलर एक्सेस देने के निर्देश दिए

Live Law Hindi
18 July 2019 4:54 PM GMT
ICJ ने पाकिस्तान को जाधव की मौत की सजा पर पुनर्विचार करने और कांसुलर एक्सेस देने के निर्देश दिए
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भारत के लिए एक बड़ी जीत में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (ICJ) ने बुधवार को यह कहा कि पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव को कांसुलर एक्सेस के बारे में उनके अधिकारों के बारे में देरी से सूचित कर वियना संधि 1963 के अनुच्छेद 36 (1) (बी) का उल्लंघन किया है।

ICJ का ऑपरेटिव आदेश

"न्यायालय का यह विचार है कि पाकिस्तान उन कृत्यों को रोकने और वियना संधि के अनुच्छेद 36 के तहत अपने दायित्वों का पूरी तरह से पालन करने के लिए बाध्य है। नतीजतन, पाकिस्तान को अनुच्छेद 36 के तहत अधिकारों को देरी किए बिना जाधव को सूचित करना चाहिए। अनुच्छेद 1 (बी) भारतीय कांसुलर अधिकारियों को उनके पास पहुंचने और उनके कानूनी प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने की अनुमति देता है, जैसा कि अनुच्छेद 36, पैरा 1 (ए) और (सी) द्वारा प्रदान किया गया है," ICJ ने आदेश दिया।

पाकिस्तान को जाधव की दोषसिद्धि और सजा की करनी होगी समीक्षा

ICJ ने पाकिस्तान को जाधव की दोषसिद्धी और मौत की सजा की प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने यह उल्लेख किया कि पाकिस्तान की उच्च अदालतें सैन्य अदालत के फैसले की समीक्षा कर सकती हैं। पाकिस्तान कानून के अंतर्गत जाधव के लिए क्षमा याचिकाएं भी शामिल हैं।

"अदालत ने यह पाया कि पाकिस्तान जाधव की सजा पर अपने स्वयं के चयन, प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार करने के लिए बाध्य है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 में उल्लिखित अधिकार के उल्लंघन के प्रभाव के लिए पूरा वजन दिया गया है, " कोर्ट ने कहा।

पाकिस्तान द्वारा समीक्षा किए जाने तक मौत की सजा पर रोक रहेगी जारी

इसमें कहा गया कि 17 मई को दिया गया मौत की सजा पर रोक का फैसला तब तक जारी रहेगा जब तक पाकिस्तान जाधव की दोषसिद्धी और सजा की प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार नहीं कर लेता है।

अदालत ने भारत की प्रार्थना (सजा रद्द हो) को किया अस्वीकार

हालांकि न्यायालय ने सैन्य अदालत द्वारा जाधव की सजा को रद्द करने की भारत की प्रार्थना को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनकी सजा को वियना कन्वेंशन का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है। अदालत ने यह कहा कि भारत ने ये दलील दी थी कि जाधव को दी गयी सजा को रद्द किया जाए और उन्हें वापस भारत सुरक्षित भेजने के आदेश जारी किए जाने चाहिए। अदालत ने यह कहा कि जाधव की सजा को वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है। कोर्ट के अध्यक्ष जस्टिस अब्दुलकवी अहमद यूसुफ ने ये आदेश पढ़ा।

जस्टिस जिलानी ने पाकिस्तान के पक्ष में किया मतदान

पाकिस्तान के न्यायाधीश जस्टिस जिलानी के पाकिस्तान के पक्ष में मतदान करने के साथ 15: 1 बहुमत से प्रक्रिया के दुरुपयोग के आधार पर भारत के आवेदन को स्वीकार करने के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा की गई आपत्तियों को खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने पाकिस्तान के इस तर्क को भी 15: 1 बहुमत से खारिज कर दिया कि ये अधिकार (कांसुलर) जासूसी के आरोपी व्यक्तियों पर लागू नहीं है।

अदालत ने पाकिस्तान द्वारा दिये गए तर्क को नकारा

न्यायालय ने यह कहा कि वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 के संदर्भ और उद्देश्य को जब पढ़ा जाता है तो यह मालूम चलता है कि यह जासूसी के संदिग्ध व्यक्तियों को बाहर नहीं करता है। अनुच्छेद 36 का सार और उद्देश्य इस तर्क का समर्थन नहीं करता कि यह जासूसी के संदिग्ध व्यक्तियों की श्रेणियों पर लागू नहीं होता।

पाकिस्तान का दूसरा तर्क भी हुआ खारिज

पाकिस्तान के दूसरे तर्क कि प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून के नियम जासूसों के लिए कांसुलर एक्सेस से इनकार करते हैं, को भी न्यायालय द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। इस संबंध में न्यायालय ने यह उल्लेख किया कि वियना कन्वेंशन ने इस विषय पर कानून को समेकित किया है, और चूंकि भारत और पाकिस्तान दोनों इस कन्वेंशन में हस्ताक्षरकर्ता हैं इसलिए प्रथागत कानून इस मामले को नियंत्रित नहीं करेगा।

पाकिस्तान का तीसरा तर्क और वो भी हुआ अस्वीकार

पाकिस्तान द्वारा दिया गया तीसरा तर्क था कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 2008 का द्विपक्षीय समझौता इस मुद्दे को खारिज करेगा। न्यायालय ने यह विचार व्यक्त किया कि समझौते के खंड को राजनीतिक आधार पर दूसरे देश में गिरफ्तार नागरिकों को कांसुलर पहुंच से इनकार करने के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता है। दूसरी ओर समझौते ने असमान रूप से दोनों देशों के इरादे को दूसरे राष्ट्रीयता से संबंधित गिरफ्तार व्यक्तियों को मानवीय उपचार देने के इरादे को प्रतिबिंबित किया है।

18 फरवरी से 21 फरवरी तक चली थी मामले में सुनवाई

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र की अदालत ने पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव की फांसी के मामले में 18 फरवरी से 21 फरवरी तक सार्वजनिक सुनवाई की थी। इससे पहले जाधव को जासूसी के आरोप में पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी।

भारत जाधव के मामले में पहुंचा था संयुक्त राष्ट्र

भारत ने संयुक्त राष्ट्र की अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए यह आरोप लगाया था कि पाकिस्तान भारत को जाधव की गिरफ्तारी की सूचना देने में विफल रहा है और उसे कांसुलर पहुंच प्रदान करने में भी विफल रहा है और उसने वर्ष 1963 में कांसुलर संबंधों पर वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 का उल्लंघन किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान ने यह तर्क दिया था कि जासूसी के आरोप में हिरासत में लिए गए लोगों के लिए कांसुलर संबंध पर वियना कन्वेंशन लागू नहीं होता।

पाकिस्तान और भारत के मध्य जाधव की गिरफ्तारी की वजह को लेकर मतभेद

पाकिस्तान ने यह दावा किया कि उसकी सेनाओं ने जाधव को 3 मार्च 2016 को कथित तौर पर ईरान से प्रवेश करने के बाद बलूचिस्तान प्रांत से गिरफ्तार किया था। वहीं भारत का कहना है कि जाधव को ईरान से अगवा किया गया था, जहां नौसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उनके व्यापारिक हित थे।

वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने रखा था भारत का पक्ष

वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ICJ में भारत के लिए पेश हुए। ICJ ने साल्वे की इस दलील को माना है कि जाधव की दोषसिद्ध गलत निष्कर्षों पर आधारित थी और सैन्य अदालत ने उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया था।

पाकिस्तान द्वारा ICJ में दी गई दलील

पाकिस्तान के लिए ICJ में पेश हुए क्वींस वकील खावर कुरैशी ने जाधव की भारतीय पहचान पर विवाद किया और कहा कि उसके पास सशस्त्र बलों से सेवानिवृत्त होने का कोई सबूत नहीं था। वह एक मुस्लिम नाम के साथ भारतीय पासपोर्ट के साथ था। उन्होंने भारतीय पत्रकारों करण थापर, प्रवीण स्वामी और चंदन नंदी द्वारा लिखे गए लेखों का हवाला देते हुए कहा कि जाधव एक जासूसी मिशन पर पाकिस्तान में भारत द्वारा लगाया गया एक जासूस है।


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