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हैदराबाद निज़ाम की परिसंपत्ति : यूके की अदालत ने दिया भारत के पक्ष में फ़ैसला, पाकिस्तान का दावा किया खारिज

LiveLaw News Network
3 Oct 2019 9:55 AM GMT
हैदराबाद निज़ाम की परिसंपत्ति : यूके की अदालत ने दिया भारत के पक्ष में फ़ैसला, पाकिस्तान का दावा किया खारिज
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इंग्लैंड और वेल्ज़ की हाईकोर्ट ने बुधवार को हैदराबाद के निज़ाम की परिसंपत्ति के बारे में भारत के पक्ष में फ़ैसला दिया और पाकिस्तान के दावे को ख़ारिज कर दिया। आज़ादी से पहले हैदराबाद प्रांत के पूर्व निज़ाम की आठवीं पीढ़ी के वारिश मुकर्रम जाह को यूके की अदालत से मिली यह बड़ी राहत है। यह मामला यूके के एक बैंक में जमा 10 लाख पौंड (अब 350 लाख पौंड) पर मालिकाना हक़ का है। यह राशि पूर्व निज़ाम आसफ़ जाह ने पाकिस्तान को सुरक्षित रखने को दिया था और अब इन पर मालिकाना हक़ उनको दे दिया गया है।

देश के बँटवारे के समय 1947 में आसफ़ जाह ने यह राशि लंदन में तत्कालीन पाकिस्तानी उच्चायुक्त को भारत की ओर से आक्रमण होने की स्थिति में स्वतंत्र हैदराबाद प्रांत के लिए सुरक्षित रखने को दिया था। बाद में निज़ाम ने दावा किया कि उसने इस राशि के हस्तांतरण की अनुमति नहीं दी थी और उन्होंने यह राशि वापस माँगी, लेकिन नैटवेस्ट बैंक जहाँ यह राशि रखी गई थी, ने इस आग्रह को ठुकरा दिया और कह कि यह राशि तभी दी जा सकती है जब पाकिस्तान इसके लिए राज़ी हो क्योंकि इसपर क़ानूनी हक़ उसी का है।

भारत ने पहले भी क़ानूनी कार्रवाई की लेकिन...

भारत ने निज़ाम के दावे का समर्थन किया और उसने इसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की लेकिन यह इसलिए विफल रही क्योंकि पाकिस्तान एक संप्रभु देश बन गया था। पर यह बाधा 2013 में दूर हो गई जब पाकिस्तान ने इस राशि पर अपना दावा किया और इस तरह संप्रभु राष्ट्र होने के कारण उसको मिली छूट समाप्त हो गई। इसके बाद इस मामले को इंग्लैंड एंड वेल्ज़ हाईकोर्ट को सौंप दिया गया।

निज़ाम का मामला मुख्यतः इस बात पर आधारित था कि यह फ़ंड विश्वास के तहत दिया गया था। निज़ाम ने दावा किया कि इस राशि का हस्तांतरण बिना किसी अनुमति के हुआ था। पाकिस्तान ने दूसरी ओर दावा किया कि इस फ़ंड पर उसका दावा है और यह हैदराबाद को की गई हथियारों और अन्य सहायता की आपूर्ति के बदले उसे मिली राशि है जो भारत के ख़िलाफ़ अपनी सुरक्षा के लिए हैदराबाद ने पाकिस्तान से मँगाए थे।

दिलचस्प यह है कि उस समय जो 10 लाख पौंड की राशि बैंक में जमा की गई थी अब वह बढ़कर 350 लाख पौंड हो चुकी है। इस मामले पर हुई बहस के दौरान पाकिस्तान ने निज़ाम की दलील को दो मुख्य आधार पर चुनौती दी :

पहला, इस मामले के तथ्य इस तरह के हैं कि इसका निपटारा अदालत में नहीं हो सकता

"हैदराबाद राज्य और पाकिस्तान के बीच हुआ यह ट्रांसफ़र और इसके साथ हुए अन्य वित्तीय कारोबार उस समय के राजनीतिक संदर्भ में दो संप्रभु देशों के सरकारों के बीच हुआ कारोबार जैसा है। इस तरह के कारोबारों पर अदालत से नहीं निपटने लायक़ और/या राज्य सिद्धांत के विदेशी अधिनियम इस तरह के कारोबार पर लागू होते हैं ताकि इस तरह के मामलों मने अदालत इसकी सुनवाई से मना कर दे या अपने न्यायिक क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से मना कर दे"।

दूसरा, उसने कहा कि हैदराबाद पर भारत का आक्रमण संयुक्त राष्ट्र के नियम, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 और भारत और हैदराबाद के बीच जड़ समझौते के अनुसार ग़ैरक़ानूनी था। इस तरह, निज़ाम के वारिशों और भारत इस पर अपने दावे नहीं कर सकते।

यह मामला न्यायमूर्ति मार्कस स्मिथ के समक्ष लाया गया जिन्होंने गवाहियों और तथ्यों और दस्तावेज़ों एवं विशेषज्ञों की राय पर ग़ौर किया। इन सबके आधार पर उन्होंने भारत और निज़ाम VII के पक्ष में फ़ैसला सुनाय।

फ़ैसला

(1) पहला, जो फ़ंड भारत ने दिया उसके बारे में भारत का यह दावा सही है कि ग़ैरक़ानूनी होने की बात "विश्लेषणात्मक रूप से असंगत" है।

(2) दूसरा, अगर गैरवैधानिक होने की बात भारत के दावे के संदर्भ में संगत भी हो तो भी भारत और निज़ाम के राजकुमारों के बीच जो समझौता हुआ उसने इसे असंगत बना दिया है और अदालत के समक्ष ग़ैरवैधानिक होने का मामला कोई मामला नहीं रहा।

(3) तीसरा, चूँकि ऐसा कुछ भी गैरवैधानिक नहीं है जो राजकुमारों और भारत, विशेषकर भारत को इस फ़ंड पर दावा करने से रोक सके।



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