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उपद्रव और हिंसा का बार में कोई स्थान नहीं है, बीसीआई ने दिल्ली के सभी बार एसोसिएशनों से कार्य पर लौटेने को कहा

LiveLaw News Network
5 Nov 2019 1:57 PM GMT
उपद्रव और हिंसा का बार में कोई स्थान नहीं है, बीसीआई ने दिल्ली  के सभी बार एसोसिएशनों से कार्य पर लौटेने को कहा
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दिल्ली की जिला अदालत में फैली हिंसा और वकीलों का अदालत के काम से निरंतर विरक्त रहने के मामले में कड़ा रुख अख्तियार करते हुए , बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने सभी बार एसोसिएशनों के नेताओं से कहा है कि वह काम न करने का अपना संकल्प वापस लें और अदालत परिसर में शांति बहाल करें।

दिल्ली के बार एसोसिएशनों की समन्वय समिति और दिल्ली के सभी जिला बार एसोसिएशनों को संबोधित एक पत्र में बीसीआई ने कहा,

''हम फिर से आपसे अनुरोध करते हैं...सोमवार को पारित प्रस्ताव को वापस लें और आज से ही अदालत का कामकाज फिर से शुरू कर दें।

हां, यदि शांति और सद्भाव बहाल नहीं किया गया और काम से दूर रहने का संकल्प वापस नहीं लिया जाता है तो हमारे पास इस प्रकरण से हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। हम न तो किसी पूछताछ या जांच में भाग लेंगे और न ही हम अदालत के अंदर या बाहर किसी का बचाव करने की स्थिति में होंगे।''

बीसीआई ने सोमवार को सभी वकीलों से अनुरोध किया था कि वह अदालतों में शांति और सद्भाव बनाए रखें। उसके बावजूद भी, पुलिसकर्मियों और आम जनता के खिलाफ हिंसा की घटनाओं की सूचना मिली हैं।

पत्र में लिखा है कि

''साकेत कोर्ट के कुछ वकीलों द्वारा बाइक सवार पुलिसकर्मी की पिटाई करने एक ऑटो चालक के साथ मारपीट, आम जनता (जिसे समाचार और मीडिया में उजागर किया जा रहा है) से धक्का-मुक्की या हमले की घटनाएं सबसे दुर्भाग्यपूर्ण हैं और बार काउंसिल ऑफ इंडिया इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती है। ये गंभीर दुराचार के कार्य हैं।"

रविवार को एक विशेष कोर्ट लगाकर दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पारित अनुकूल निर्णय को देखते हुए बीसीआई ने इन घटनाओं की निंदा की है और कहा है कि-

''हमें हाईकोर्ट के प्रति आदरभाव रखना चाहिए कि वह इतनी जल्दी से हमारे बचाव में आए। स्वत: संज्ञान लिया गया और आपकी सभी मांगों को स्वीकार कर लिया गया। आप इतने कम समय में इतनी बड़ी राहत दिए जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। आपने जो भी चाहा, आपको मिला...लेकिन हम न्यायपालिका/हाईकोर्ट के प्रति कृतज्ञ होने के बजाय, हम उनके प्रति अपना अनादर दिखा रहे हैं। जो सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है!''

हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था

रविवार, 3 नवंबर को हाईकोर्ट ने स्वत संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई की थी। यह सुनवाई शनिवार को तीस हजारी कोर्ट में पुलिस अधिकारियों और वकीलों के बीच कोर्ट परिसर के भीतर पार्किंग विवाद को लेकर हुई हाथापाई के बाद हुई फायरिंग की घटना पर हुई थी। इस विवाद के बाद दो वकीलों पर पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने और लाठीचार्ज में कई लोगों के घायल होने के कारण यह घटना बढ़ गई थी।

मामले की सुनवाई के बाद, हाईकोर्ट ने सीबीआई, विजिलेंस और आईबी की सहायता से, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एसपी गर्ग की अध्यक्षता में दुर्घटना की न्यायिक जांच का आदेश दिया था। साथ ही कहा था कि जांच छह सप्ताह के भीतर पूरी की जाए।

इसके अलावा, अदालत ने दो आरोपी पुलिस अधिकारियों को निलंबित करने और दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर का भी निर्देश दिया था।

दिल्ली हाईकोर्ट की त्वरित प्रतिक्रिया की सराहना करते हुए बीसीआई ने कहा,

''हम जो कहना चाहते हैं, वह यह है कि हमारे देश की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार, हाईकोर्ट (वह भी दिल्ली हाईकोर्ट जैसे हाईकोर्ट) ने रविवार को कोर्ट लगाई और अधिवक्ताओं के पक्ष में इस तरह का अभूतपूर्व आदेश पारित किया। हमें अदालत के इस अहसान को नहीं भूलना चाहिए। बार के सभी नेताओं को सम्मानपूर्वक रजिस्ट्री द्वारा आमंत्रित किया गया था, यह एक ऐतिहासिक कदम था। हम भविष्य के लिए इस कदम/ आदेश के महत्व को देखते हैं, इसलिए, हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप इस तरह के आदेश को वापस ले लिया जाए।''

बीसीआई ने पश्चिम बंगाल में वकीलों की पिटाई के उदाहरणों का हवाला दिया, वहां वकीलों द्वारा हड़ताल और विरोध प्रदर्शन करने के बावजूद भी किसी अदालत ने उनका पक्ष नहीं लिया या उनकी मांगों को अनसुना कर दिया। बीसीआई ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा समर्थित समर्थन के लिए दिल्ली बार एसोसिएशनों को कोर्ट आभारी होना चाहिए।

मामले के कानूनी पहलू को उठाते हुए बीसीआई ने स्पष्ट किया कि पुलिस के पास इस मामले से संबंधित किसी भी गिरफ्तारी को प्रभावित करने का कोई अधिकार नहीं था और इसलिए बार एसोसिएशनों को पुलिस के खिलाफ बल का प्रयोग करके मजाक का विषय बनना बंद कर देना चाहिए।

''कानूनी रूप से, पुलिस के पास इस मामले में जांच खत्म होने या उसका निष्कर्ष निकलने तक किसी पुलिसकर्मी को भी गिरफ्तार करने या कोई कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। पुलिस इस मामले में कोई कार्र्वाई नहीं कर सकती।

इसलिए, समन्वय समिति ( कि पुलिस अधिकारियों या कर्मियों को पहले गिरफ्तार किया जाना चाहिए) का संकल्प अब निरर्थक है और इसका कोई कानूनी आधार नहीं है। हमें कानूनी दृष्टिकोण से इस महत्वपूर्ण पहलू पर विचार करना है, ताकि हम सोसाइटी के सामने हंसी का पात्र न बनें।''

बीसीआई ने अधिवक्ताओं से भी कहा कि वे इस मामले को न बढ़ाएं और यह समझें कि बार चुनावों में उनके लिए यह फायदेमंद होगा। बीसीआई ने सवाल किया कि जो उम्मीदवार जांच एजेंसियों द्वारा हिंसा फैलाने के दोषी पाए जाएंगे, क्या आपको लगता है कि उन्हें कोई चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाएगी ?

बीसीआई ने कहा कि पुलिस फोर्स 3 नवंबर के आदेश का रिव्यू फाइल करने की तैयारी कर रहा था। ऐसे में अधिवक्ताओं की ओर से उपद्रव और हिंसा की कार्रवाई, जिसे मीडिया द्वारा प्रसारित किया जा रहा है और सीसीटीवी में कैद किया गया है, केवल पुलिस का मामला आसान करेंगे।

बीसीआई ने कहा कि-

''आप सभी से हमारा विनम्र निवेदन है कि सबसे अच्छे साक्ष्य/ सामग्री एकत्र करें, और पुलिस की गोलीबारी, अत्याचार और आक्रामकता के हमारे मामले को साबित करने के लिए प्रमुख गवाहों का पता लगाएं।

हमारा प्रयास यह सुनिश्चित करने का होना चाहिए कि कोई भी वकील सीबीआई/आईबी/विजिलेंस और जज द्वारा पूछताछ करने के बाद दोषी न पाया जाए/या उसे आरोपी भी न बनाया जाए।''

अंत में, परिषद ने बार एसोसिएशनों के पदाधिकारियों को आमंत्रित किया है ताकि इस मामले से संबंधित मुद्दों पर शांतिपूर्वक चर्चा की जा सके, यदि कोई ऐसा मुद्दा हो तो।



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