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एफबी ट्रोल के ख़िलाफ़ एफआईआर : कर्नाटक हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा, सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश का किया था उल्लंघन

LiveLaw News Network
15 Oct 2019 9:39 AM GMT
एफबी ट्रोल के ख़िलाफ़ एफआईआर : कर्नाटक हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा,  सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश का किया था उल्लंघन
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यह कहते हुए कि यह मामला पुलिस द्वारा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का उत्कृष्ट उदाहरण है, कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रोल मागा नामक फ़ेसबुक पेज के एडमिन के खिलाफ दायर एफआईआर को निरस्त कर दिया। अदालत ने सरकार को याचिकाकर्ता एस जयकांत को एक माह के भीतर एक लाख रुपए का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया और उस मजिस्ट्रेट के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई करने को कहा जिसने यह आदेश सुनाया था।

न्यायमूर्ति पीएस दिनेश कुमार ने शुक्रवार को अपने आदेश में कहा, "याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई ग़ैरक़ानूनी थी।" पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक को उस पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा गया है जो इस व्यक्ति की गिरफ़्तारी के लिए ज़िम्मेदार है और तीन माह के भीतर अदालत में इस आदेश पर हुई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने को कहा। यह भी कहा गया कि पुलिस से इसकी एक लाख रुपए की लागत वसूली जाए। अपने आदेश में अदालत ने कहा, "सभ्य समाज में एक नागरिक की स्वतंत्रता पवित्र होती है।"

अदालत ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह न्यायिक मजिस्ट्रेट के ख़िलाफ़ जांच करे जिसने दूसरे मामले में जयकांत को पुलिस हिरासत में भेजा जबकि उसी तरह के तथ्यों के आधार पर जयकांत को पहले मामले में अग्रिम ज़मानत मिल गई थी।

पीठ ने कहा,

"मजिस्ट्रे के लिए यह ज़रूरी था कि वह याचिकाकर्ता को पुलिस हिरासत में भेजने से पहले सभी दस्तावेज़ों को ग़ौर से देखता और याचिकाकर्ता के वक़ील की दलील पर ध्यान देता। इस मामले में विशेष ध्यान देने की ज़रूरत थी, क्योंकि सेशन जज ने याचिकाकर्ता को अग्रिम ज़मानत दे रखी थी।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अरनेश कुमार सहित विभिन्न मामलों में सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फ़ैसलों के बावजूद मजिस्ट्रेट ने उसे पुलिस हिरासत में भेज दिया। इस वजह से याचिकाकर्ता को अग्रिम ज़मानत मिलने के बावजूद हिरासत में रहना पड़ा। यह गंभीर मामला है और इसका प्रतिकार होना चाहिए। फिर…अरनेश कुमार के ख़िलाफ़ विभागीय जाँच का आदेश भी दिया गया"।

पुलिस ने जयकांत को इस आधार पर गिरफ़्तार कर लिया था कि उसने जेडीएस प्रमुख एचडी देवगौडा, मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और उनके बेटे और पार्टी के नेता निखिल कुमारस्वामी के ख़िलाफ़ गाली-गलौज और अपमानजनक बातें पोस्ट की थी।

जयकांत ने जेडीएस के आईटी विंग के रविराज की शिकायत पर अपने ख़िलाफ़ एफआईआर को निरस्त करने के लिए अदालत में याचिका दायर की थी।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का उल्लंघन

इससे पूर्व, आरोपी को तत्काल रिहा किए जाने का निर्देश देते हुए अदालत ने कहा कि इस क़दम से सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का भारी उल्लंघन हुआ है, पुलिस की सख़्त कार्रवाई यह दिखाती है कि राज्य में क़ानून के शासन का महल ध्वस्त हो चुका है और यहाँ पुलिस राज क़ायम हो चुका है।

पेशे से इंजीनियर जयकांत को पुलिस ने उन्हीं तथ्यों के आधार पर गिरफ़्तार किया था जिस आधार पर उसके ख़िलाफ़ मई में एफआईआर दायर किया गया था। पीठ ने कहा, "दोनों ही एफआईआर में जो आरोप लगाए गए हैं वे समान ही हैं। पुलिस की कार्रवाई से यह निष्कर्ष निकला कि पुलिस किसी भी तरह आरोपी को गिरफ़्तार करने और हिरासत में भेजने में कामयाब रही"।

फैसले की कॉपी डाउनलोड करने के लिए लिंक पर क्लिक करें


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