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निर्वासन कोई सामान्य उपाय नहीं है और इसका संयम से और असाधारण परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
29 Jan 2022 7:36 AM GMT
निर्वासन कोई सामान्य उपाय नहीं है और इसका संयम से और असाधारण परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्वासन कोई सामान्य उपाय नहीं है और इसका संयम से और असाधारण परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओक ने कहा, निर्वासन के आदेश का प्रभाव एक नागरिक को भारत के पूरे क्षेत्र में बेरोकटोक आने- जाने के उसके मौलिक अधिकार से वंचित करना है और इसलिए निर्वासन के आदेश को पारित करके लगाए गए प्रतिबंध को तर्कसंगतता के परीक्षण में खड़ा होना चाहिए ।

इस मामले में जिला जालना निवासी एक व्यक्ति को 5 दिन के भीतर जिला जालना की सीमा से बाहर स्वयं जाने का निर्देश दिया गया।

महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 56(1)(ए)(बी) के तहत शक्तियों का आह्वान करते हुए, सक्षम प्राधिकारी ने यह आदेश इस आधार पर पारित किया था कि उसकी गतिविधियां बहुत खतरनाक हैं और भारतीय दंड संहिता के तहत उसके खिलाफ दर्ज अपराध गंभीर प्रकृति के हैं जो जनता को व्यापक रूप से परेशान कर रही हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस आदेश को चुनौती देने वाली उनकी रिट याचिका खारिज कर दी।

अपील में, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने शुरुआत में, इस प्रकार कहा:

4..भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के खंड (डी) के तहत, नागरिकों को भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है।

अनुच्छेद 19 के खंड (5) के मद्देनज़र, राज्य को एक कानून बनाने का अधिकार है जो खंड (डी) द्वारा प्रदत्त अधिकार के प्रयोग पर उचित प्रतिबंध लगाने को सक्षम बनाता है। 1951 के अधिनियम की धारा 56 के प्रावधानों के तहत पारित किया गया एक आदेश उस व्यक्ति पर प्रतिबंध लगाता है जिसके खिलाफ किसी विशेष क्षेत्र में प्रवेश करने का आदेश दिया गया है। इस प्रकार, ऐसे आदेश अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं। इसलिए, निर्वासन का आदेश पारित करके लगाए गए प्रतिबंध को तर्कसंगतता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

7. इसमें किसी भी तरह का संदेह नहीं हो सकता है कि निर्वासन का आदेश एक असाधारण उपाय है। निर्वासन के आदेश का प्रभाव एक नागरिक को भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आवाजाही के मौलिक अधिकार से वंचित करना है। व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा आदेश व्यक्ति को अपने परिवार के सदस्यों के साथ अपने घर में रहने से भी रोकता है, जिस अवधि के लिए यह आदेश प्रभाव में है। किसी दिए गए मामले में, ऐसा आदेश व्यक्ति को उसकी आजीविका से वंचित कर सकता है। इस प्रकार यह ध्यान में रखते हुए कि यह एक असाधारण उपाय है, धारा 56 का सहारा लिया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 का उल्लेख करते हुए, अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर वस्तुनिष्ठ सामग्री होनी चाहिए जिसके आधार पर सक्षम प्राधिकारी को ये गणना करते समय अपनी व्यक्तिपरक संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए कि किसी भी व्यक्ति की हरकतें या कार्य से व्यक्तियों या संपत्ति को खतरा या नुकसान हो रहा है।

अदालत ने कहा,

"7... खंड (बी) के तहत एक आदेश पारित करने के लिए, वस्तुनिष्ठ सामग्री होनी चाहिए जिसके आधार पर सक्षम प्राधिकारी को व्यक्तिपरक संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि ऐसा व्यक्ति बल या हिंसा या आईपीसी के अध्याय XII, XVI या XVII के तहत दंडनीय अपराधों के अपराध के कृत्य में शामिल या शामिल होने वाला है। अध्याय XII के तहत अपराध सिक्के और सरकारी स्टांप से संबंधित हैं। अध्याय XVI के तहत अपराध मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध और अध्याय XVII के तहत अपराध संपत्ति से संबंधित अपराध हैं। किसी दिए गए मामले में, भले ही एक व्यक्ति के खिलाफ धारा 56 की उप-धारा (1) के खंड (बी) में संदर्भित कई अपराध दर्ज किए गए हों, जो अपने आप में धारा 56 की उप-धारा (1) के खंड (बी) के तहत निर्वासन का एक आदेश पारित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा, जब खंड (बी) को लागू करने की मांग की जाती है, तो रिकॉर्ड पर सामग्री के आधार पर, सक्षम प्राधिकारी को संतुष्ट होना चाहिए कि गवाह अपनी सुरक्षा या अपनी संपत्ति के संबंध में अपनी ओर से आशंका के कारण निर्वासित किए जाने के लिए प्रस्तावित व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए आगे आने को तैयार नहीं हैं। सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस तरह की व्यक्तिपरक संतुष्टि की रिकॉर्डिंग खंड (बी) के तहत एक वैध आदेश पारित करने के लिए अनिवार्य है।"

अदालत ने कहा कि हालांकि सक्षम प्राधिकारी से विस्तृत कारणों से युक्त निर्णय लिखने की अपेक्षा नहीं की जाती है, लेकिन उसे अपने सामने रखी गई वस्तुनिष्ठ सामग्री के आधार पर धारा 56 की उप-धारा (1) में किसी एक आधार के अस्तित्व की अपनी व्यक्तिपरक संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा:

"10.. हालांकि सक्षम प्राधिकारी को न्यायिक आदेश के समान कारणों को दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, जब चुनौती दी जाती है, सक्षम प्राधिकारी को विवेत के आवेदन को दिखाने की स्थिति में होना चाहिए। न्यायालय बाहरी आदेश का परीक्षण करते समय ये नहीं कर सकता कि वो सामग्री की पर्याप्तता के सवाल पर जाएं जिसके आधार पर व्यक्तिपरक संतुष्टि दर्ज की गई है। हालांकि, न्यायालय हमेशा इस बात पर विचार कर सकता है कि क्या कोई सामग्री मौजूद थी जिसके आधार पर व्यक्तिपरक संतुष्टि दर्ज की जा सकती है। न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है जब या तो वहां कोई सामग्री नहीं है या प्रासंगिक सामग्री पर विचार नहीं किया गया है। न्यायालय इसलिए हस्तक्षेप नहीं कर सकता क्योंकि एक और दृष्टिकोण लिए जाने की संभावना है। जैसा कि किसी भी अन्य प्रशासनिक आदेश के मामले में, दुर्भावना, तर्कहीनताया मनमानी के आधार पर न्यायिक समीक्षा की अनुमति है।"

रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों का हवाला देते हुए, बेंच ने पाया कि, इस मामले में, विवेक का गैर-उपयोग रिकॉर्ड के चेहरे पर स्पष्ट है। अदालत ने कहा कि अगर दो साल की अधिकतम स्वीकार्य अवधि के लिए निर्वासनददद का आदेश बिना व्यक्तिपरक संतुष्टि दर्ज किए पारित किया जाता है, तो अधिकतम स्वीकार्य अवधि के लिए विस्तार के आदेश को बढ़ाने की आवश्यकता के बारे में, यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के खंड (डी) के तहत मौलिक अधिकार की गारंटी पर अनुचित प्रतिबंध लगाने के बराबर होगा।

पीठ ने अपील की अनुमति देते हुए कहा,

"हाईकोर्ट के आक्षेपित निर्णय और आदेश के अवलोकन से पता चलता है कि दुर्भाग्य से, डिवीजन बेंच ने यह नहीं देखा कि निर्वासन का आदेश एक सामान्य उपाय नहीं है और इसका संयम से और असाधारण परिस्थितियों में सहारा लिया जाना चाहिए। यह संवैधानिक न्यायालय का कर्तव्य है कि उक्त आदेश का परीक्षण उन मापदंडों के भीतर करे जो इस न्यायालय द्वारा अच्छी तरह से तय किए गए हैं।"

केस का नाम: दीपक पुत्र लक्ष्मण डोंगरे बनाम महाराष्ट्र राज्य

केस नंबर/तारीख: 2022 की सीआरए 139 | 28 जनवरी 2022

पीठ: न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी, न्यायमूर्ति अभय एस ओक

वकील: अपीलकर्ता के लिए अधिवक्ता संदीप सुधाकर देशमुख, प्रतिवादियों के लिए अधिवक्ता सचिन पाटिल

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