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फ़ैसले को लागू करने वाली अदालत फ़ैसले की सीमा के बाहर नहीं जा सकती : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
15 Sep 2019 4:34 AM GMT
फ़ैसले को लागू करने वाली अदालत फ़ैसले की सीमा के बाहर नहीं जा सकती : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फ़ैसले को लागू करने वाली अदालत लागू होने वाले फ़ैसले की सीमा के बाहर नहीं जा सकती।

केएस जगनाथन और एस भास्करन ने ट्रस्टी के रूप में एक मंदिर की ओर से मामला दायर किया था और ज्ञानंबल और उसके पति के ख़िलाफ़ स्थाई रोक आदेश जारी करने की माँग की थी जो उस समय उस परिसंपत्ति में एक किरायेदार के रूप में रह रहे थे जिस बारे में मुक़दमा दायर किया गया था।

उमापतीमूर्ति नामक व्यक्ति इस मामले में प्रतिवादी था। अपने लिखित बयान में उसने दावा किया था वह सदाशिवमूर्ति का सबसे बड़ा बेटा है और उसे उसके छोटे भाई केएस सभापति ने मंदिर के ट्रस्टी के पद से हटा दिया है। इस मामले में फ़ैसला आया और अपीली कोर्ट ने उमापतीमूर्ति की अपील ख़ारिज कर दी।

इसके बाद फ़ैसले को लागू करने की याचिका के तहत उमापतीमूर्ति ने एक आवेदन सीसीपी की धारा 47 के अंतर्गत दायर किया और फ़ैसले को निरस्त करने की माँग की और कहा कि मूल फ़ैसले का आधार धोखाधड़ी है। इन लोगों ने आरोप लगाया कि सदाशिवमूर्ति का वारिस होने का प्रमाणपत्र जो निर्णयधारकों ने सामने रखा वह फ़र्ज़ी तरीक़े से बनाया गया था और इसमें यह नहीं बताया गया था कि उमापतीमूर्ति सदाशिवमूर्ति का सबसे बड़ा बेटा है।

इस आवेदन को ख़ारिज करते हुए फ़ैसले को लागू करने वाली अदालत ने कहा कि फ़ैसला होने से पहले उन्होंने इस वारिस के प्रमाणपत्र पर आपत्ति नहीं की, जब इसे निचली अदालत के समक्ष रखा गया। और किसी भी सूरत में निचली अदालत ने सिर्फ़ वारिस के प्रमाणपत्र के आधार पर ही ट्रस्टीशिप के मामले पर फ़ैसला दिया है बल्कि अन्य दस्तावेज़ों पर भी ग़ौर किया गया है।

जेडी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कुछ बिक्री क़रार जिसमें उमापतीमूर्ति को सबसे बड़ा बेटा और केएस सभापति को सदाशिवमूर्ति का दूसरा नाबालिग़ बेटा बताया गया था, पर ग़ौर करते हुए निष्कर्षतः कहा कि उमापतीमूर्ति मंदिर का ट्रस्टी हो सकता है। उसने यह भी कहा कि मूल मामले में जो फ़ैसला दिया गया वह अवैध है और इसे लागू नहीं किया जा सकता।

इस मामले [(एस भास्करन बनाम सिबैस्टीयन (मृत)] की अपील में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस एमएम शांतनागौदर और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि फ़ैसला जिनके पक्ष में हुआ है उनकी ओर से ट्रस्टीशिप के मामले को फ़ैसले को लागू करने वाली याचिका के तहत आवेदन से दुबारा खोलकर हाईकोर्ट ने फ़ैसले से बाहर जाने का काम किया है और इस तरह सीपीसी की धारा 115 के तहत अपनी समीक्षात्मक सीमा का उल्लंघन किया है। अदालत ने कहा,

इस मामले में निचली अदालत पेश किए गए रिकार्ड पर ग़ौर कर चुका है और बता चुका है कि अपीलकर्ता और उसके चाचा मंदिर के ट्रस्टी हैं। उमापतीमूर्ति इस मामले में पक्षकार था और उसने इस फ़ैसले का एक लिखित बयान देकर विरोध किया था और सदाशिवमूर्ति के सबसे बड़े बेटे होने का दावा किया था। हालाँकि, उस समय उसने सदाशिवमूर्ति के वारिश के प्रमाणपत्र का विरोध नहीं किया था जिस पर अपने फ़ैसले के दौरान निचली अदालत ने ग़ौर किया था। पहली अपीली अदालत ने इस फ़ैसले की पुष्टि की थी और प्रतिवादी ने इसके ख़िलाफ़ अपील नहीं की थी। इसे देखते हुए निचली अदालत का निष्कर्ष अंतिम हो गया और उमापतीमूर्ति और दूसरे प्रतिवादियों को इसे मानना होगा।


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