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अगर उपहार से विशेष रूप से इंकार नहीं है तो उपहार लेने वाले के लिए ज़रूरी नहीं है कि वह सत्यापित करने वाले गवाह की जांच करे : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
25 Sep 2019 5:11 AM GMT
अगर उपहार से विशेष रूप से इंकार नहीं है तो उपहार लेने वाले के लिए ज़रूरी नहीं है कि वह सत्यापित करने वाले गवाह की जांच करे : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब उपहार के क़रार से मुक़दमे में विशेष रूप से इंकार नहीं किया गया तो उपहार लेने वाले के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह सत्यापित करने वाले गवाह की भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 68 के एक परंतुक के तहत जांच करे।

वर्तमान मामले (गोविंदभाई छोटाभाई पटेल बनाम पटेल रमनभाई माथुरभाई), में हाईकोर्ट ने वादी के मुक़दमे को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि उन्होंने इस दस्तावेज़ तैयार किए जाने से इंकार नहीं किया बस यह आरोप लगाया था कि इसमें धोखाधड़ी और जालसाज़ी की गई है। यह भी कहा गया कि जिस संपत्ति को उपहार में देने की बात है वह ख़ानदानी सम्पत्ति नहीं है बल्कि ख़ुद से अर्जित की गई है जो उपहार प्राप्त करने वाले को अपने पिता की वसीयत से मिला है जिसे उन्होंने उसके नाम किया था।

पीठ ने कहा, उपहार संबंधी क़रार से इंकार स्पष्ट होना चाहिए

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और हेमंत गुप्ता की पीठ ने कन्नन नांबियार बनाम नारायणी अम्मा मामले में केरल हाईकोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र किया जिसमें साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 की व्याख्या करते हुए कहा कि उपहार संबंधी क़रार से इंकार करने की बात स्पष्ट होनी चाहिए और यह स्पष्ट रूप से कही जानी चाहिए कि दाता ने यह क़रार नहीं किया था। पीठ ने कहा,

"हम समझते हैं कि उपहार संबंधी क़रार से इंकार स्पष्ट होना चाहिए और यह कि दाता ने इस तरह का कोई क़रार नहीं किया। इसका मतलब यह हुआ कि इससे इंकार की बात न केवल कही जानी चाहिए बल्कि यह प्रकट और स्पष्ट होनी चाहिए …"

अदालत ने कहा कि इस मामले में वादी ने क़रार में धोखाधड़ी और जालसाज़ी का आरोप लगाया है जो कि विभिन्न तरह के आरोपों और सबूतों पर आधारित है पर सत्यापित किए गए दस्तावेज़ को इसमें शामिल नहीं किया गया है। हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही बताते हुए पीठ ने कहा,

"….किसी भी तरह की जालसाज़ी या धोखाधड़ी की अनुपस्थिति में और इस क़रार से किसी भी तरह से इंकार नहीं करने से दान लेने वाले पर किसी भी तरह का यह दायित्व नहीं था कि वह इस उपहार को सत्यापित करने वाले की जांच करे। जो साक्ष्य पेश किए गए हैं उसके हिसाब से, उपहार लेने वाला व्यक्ति उपहार देने वाले की कई सालों से देखभाल कर रहा था। अपीलकर्ता अमेरिका में रह रहे थे और वे अपने माँ-बाप की देखभाल नहीं कर पा रहे थे। इसलिए अपीलकर्ता के पिता ने उस व्यक्ति के नाम उपहार देने का क़रार किया जो उनकी देखभाल कर रहा था। इस वसीयत में किसी भी तरह की इच्छा के नहीं होने के कारण लाभार्थी इस परिसंपत्ति को इस तरह हासिल करेगा जैसे कि यह उसका ख़ुद का हासिल किया हुआ है।"

संपत्ति पैतृक है और दाता को उपहार का यह क़रार करने का अधिकार नहीं है?

इस मामले में एक और मामला यह उठा कि विवादित संपत्ति पैतृक है और दाता को उपहार का यह क़रार करने का अधिकार नहीं है। सीएन अरुणाचल मुदालियर बनाम सीए मुरुगंथा मुदालियर मामले में फ़ैसले का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा चूँकि इस वसीयत का लाभार्थी उसका बेटा था और वसीयत में किसी भी तरह की इच्छा का ज़िक्र नहीं होने से लाभार्थी इस संपत्ति को ख़ुद से अर्जित करने वाली संपत्ति के रूप में इसे हासिल करेगा। पीठ ने कहा,

"संपत्ति पैतृक है, यह साबित करने का दायित्व वादी पर है। यह उसको साबित करना है कि आशभाई की वसीयत में इस संपत्ति को परिवार के लाभ के लिए दिया गया है ताकि इसे पैतृक संपत्ति माना जाए। इस तरह की बात के समर्थन में किसी भी तरह के साक्ष्य के नहीं होने के कारण दान देनेवाले व्यक्ति के पास जो संपत्ति है उसे ख़ुद से अर्जित संपत्ति मानी जा सकती है। एक बार जब दाता के हाथ की संपत्ति को ख़ुद से अर्जित संपत्ति मान ली जाती है तो उस स्थिति में वह अपनी संपत्ति को परिवार के लिए किसी अजनबी व्यक्ति को देने के साथ-साथ जो चाहे कर सकता है।"



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