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J&K हाईकोर्ट ने कहा, भीख मांगने का अपराधीकरण सामाजिक निर्मितियों का परिणाम

LiveLaw News Network
26 Oct 2019 10:58 AM GMT
J&K हाईकोर्ट ने कहा, भीख मांगने का अपराधीकरण सामाजिक निर्मितियों का परिणाम
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एक महत्वपूर्ण फैसले में जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट ने शुक्रवार को भीख मांगने के अपराधीकरण को असंवैधानिक घोषित किया और जम्मू-कश्मीर के भिखारी निवारण अधिनियम, 1960 और जम्मू-कश्मीर भिखारी निवारण नियम, 1964 के प्रावधानों को समाप्त कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की पीठ ने अपने फैसले में कहा,

"भीख मांगने का अपराधीकरण गरीबों को अपराधी मान लेने की पूर्वधारणा और आधारहीन रूढ़िबद्धता जैसे सामाजिक निर्मितियों का नतीजा है, जो इस बात को नजरअंदाज करता है कि गरीबों को गंभीर बहिष्करण और विषम स्थिति में जीने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. भीख मांगने को अपराध घोषित करना गरीबी को अपराध बनाता है। इसका इरादा यह गरीबों को सार्वजनिक स्थलों से दूर रखना, समावेशी और बहुलवाद की संवैधानिक गारंटी से उन्हें वंचित करना और परिणामतः उनको और ज्यादा वंचित करना है।"

अधिवक्ता सुहैल राशिद भट की जनहित याचिका पर कोर्ट ने 4 जून को आदेश सुरक्षित रखा था और शुक्रवार को यह फैसला सुनाया।

जैसा कि जम्मू और कश्मीर भिखारी अधिनियम, 1960 की धारा 2 (ए) के तहत भीख मांगने को परिभाषित किया गया है, अधिनियम की धारा 3 कहती है कि भीख मांगने को अपराध कहने के लिए आपराधिक मनःस्थिति का होना जरूरी नहीं है। धारा 2 (ए) के अनुसार, भीख मांगना अपराध इस प्रकार है:

(i) किसी बहाने या उसके बिना सार्वजनिक स्थान पर, या मंदिर, मस्जिद या सार्वजनिक पूजा के अन्य स्थान पर याचना करना;

(ii) भीख मांगने के उद्देश्य से किसी भी निजी परिसर में प्रवेश करना;

(iii) भीख प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार का घाव, चोट, विकृति या बीमारी चाहे वह इंसान की हो या किसी जानवर की उसे प्रकट या प्रदर्शित करना;

(iv) किसी सार्वजनिक स्थान पर या मंदिर, मस्जिद या सार्वजनिक पूजा स्थल में या उसके आसपास बिना उद्देश्य भटकना या ऐसी स्थिति या तरीके से वहां रहना जैसे कि ऐसा करने वाला व्यक्ति भीख मांगने के लिए ही मौजूद है।

(v) भीख मांगने में खुद के उपयोग की अनुमति देना, लेकिन इसमें किसी कानून या जिला मजिस्ट्रेट की ओर से अधिकृत उद्देश्य के लिए धन या शुल्क या उपहार माँगना शामिल नहीं है।

न्यायालय ने गौर किया कि यह परिभाषा "अस्पष्ट, अतिव्यापी और उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकीर्ण रूप से गढ़ा गया है'।

अधिनियम की धारा 2 (ए) के तहत भीख मांगने की परिभाषा लोगों को इस बात के लिए अपराधी बनाती है कि वे क्या हैं, बजाय इसके कि वे क्या करते हैं। 196 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने कहा कि अधिनियम, 1960 की धारा 3 के तहत आपराधिक मंजूरी, सामग्री पर आधारित है और अधिनियम की धारा 2 (ए) के तहत गरीबों की आपराधिकता की अवधारणा पर आधारित है।



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