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दिव्यांग अधिनियम, 2016 के प्रावधानों की जानकारी हो इसके लिए संपूर्ण महाराष्ट्र में इस पर कार्यशाला आयोजित किए जाएं : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
14 Nov 2019 3:00 AM GMT
दिव्यांग अधिनियम, 2016 के प्रावधानों की जानकारी हो इसके लिए संपूर्ण महाराष्ट्र में इस पर कार्यशाला आयोजित किए जाएं : बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस बात पर ग़ौर करते हुए कि राज्य में दिव्यांगों के बारे में लोगों में संवेदनशीलता ज़्यादा नहीं है और उनके प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं जानते हैं, कहा कि इसलिए राज्य सरकार इस मुद्दे पर राज्य भर में प्रशिक्षण कार्यक्रम और कार्यशाला का आयोजन करे ताकि राज्य के अधिकारियों को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के बारे में जागरूक बनाया जा सके।

न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति आरआई चागला की पीठ ने इस बारे में एक ही साथ नत्थी किए गए दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। ये याचिकाएं ऑल इंडिया हैंडीकैप्ड डिवेलप्मेंट फ़ाउंडेशन एवं राष्ट्रीय अपंग विकास महासंघ ने दायर की थी। जनहित की इन दोनों ही याचिकाओं के माध्यम से विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों की सुरक्षा और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995 के प्रावधानों को लागू कराने की मांग की गई है।

सरकार की ओर से दलील

एजीपी जीडब्ल्यू मत्तोस ने पीठ के समक्ष अपनी दलील में कहा कि सरकार की नीयत नेक है और वह ज़मीनी स्तर पर स्थितियों से वाक़िफ़ है और वह दिव्यांग लोगों के अधिकारों के अधिनियम, 2016 को लागू करने के लिए हर सम्भव प्रयास करेगी।

इससे पहले अदालत ने कहा था,

"…हम राज्य के प्रमुख विशेषकर उसकी कार्यपालिका के सर्वोच्च अधिकारी मुख्य सचिव से यह उम्मीद करते हैं कि वे पूरे राज्य में प्रशिक्षण कार्यक्रम और कार्यशाला का आयोजन करेंगे ताकि राज्य के अधिकारियों को दिव्यांगों से संबंधित अधिनियम 2016 के प्रावधानों के बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी हो"।

इस अधिनियम के पास होने के तीन साल बाद भी दिव्यांगों के प्रति संवेदनशीलता की कमी की चर्चा करते हुए अदालत ने कहा,

"ऐसा इसलिए है क्योंकि इस बारे में लोगों को जानकारी नहीं है कि दिव्यांगों के भी अधिकार हैं। इस अधिकार को सिर्फ़ इसलिए पराजित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि संसद ने ईमानदारी से जिस क़ानून को पास किया है, उसके प्रति ख़राब रवैया अपनाते हुए उसे लागू करने से इंकार किया जा रहा है। इस क़ानून को बहुत ही ईमानदारी से लागू किए जाने की ज़रूरत है और यह प्रभावी तरीक़े से लागू हो इसके लिए हर तरह के प्रयास किए जाने की ज़रूरत है। यह तभी संभव है जब राज्य के अधिकारी और नगर निगम के संबंधित कर्मचारी जिन पर यह ज़िम्मेदारी है…सजग हों और इसके लिए राज्य को प्रशिक्षण और सजगता कार्यक्रम चलाना होगा।

इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को इसमें बुलाया जाना चाहिए और इसमें क़ानूनी पेशे से जुड़े लोगों को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए ताकि वे इन अधिकारियों को इसके क़ानूनी पक्ष के बारे में बता सकें। उम्मीद यह की जाती है कि विभागों के प्रमुखों को इस क़ानून और और विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के बारे में जागरूक किया जा सके। यह संभव है कोई दिव्यांग व्यक्तियों को अपने अधिकारों के बारे में पता नहीं हो पर आम लोगों और उनके सहकर्मियों में उनके प्रति संवेदनशीलता नहीं होने के कारण इन दिव्यांगों को उनके अधिकारों और ज़रूरी मदद से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।"

पीठ ने कहा,

"हम समझते हैं कि राज्य के अधिकारियों को इस बारे में जानकारी देने के लिए इस कार्यक्रम के आयोजन को आवश्यक बनाया जाना चाहिए। इसलिए हम चाहेंगे कि इस तरह के कार्यक्रम राज्य में आयोजित किए जाएंं और हम निर्देश देते हैं कि महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक न्याय विभाग के तहत राज्य सरकार का हर बड़ा विभाग इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करे।"

इसके बाद अदालत ने राज्य में राजनीतिक हालात को देखते हुए इस मामले की सुनवाई 12 दिसम्बर को करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि उस समय तक राज्य में सरकार का गठन हो जाएगा।"

अदालत ने वरिष्ठ वक़ील गायत्री सिंह और मीनाज काकालिया से राज्य सरकार के इन कार्यशालाओं/कार्यक्रमों में भाग लेने का आग्रह किया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इन दोनों वकीलों को इन कार्यकरमों में लाने-ले जाने की पूरी व्यवस्था करे। इसके अलावा, महाराष्ट्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वे इन कार्यकरमों में राज्य के अधिकारियों को संबंधित विषयों की जानकारी देंगे।



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