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अयोध्या सुनवाई 11वां दिन : सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा से कहा, भक्त का दावा देवता के विपरीत नहीं हो सकता

LiveLaw News Network
24 Aug 2019 9:27 AM GMT
अयोध्या सुनवाई 11वां दिन : सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा से कहा, भक्त का दावा देवता के विपरीत नहीं हो सकता
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अयोध्या मामले की सुनवाई के 11वें दिन हिंदू पक्षकार 'निर्मोही अखाड़ा' की दलीलों में तब एक नया मोड़ आया जब अखाड़ा ने देवता की संपत्ति के प्रबंधक होने का दावा किया और देवता राम लला की ओर से दायर मुकदमे के खिलाफ रुख अपनाया।

"अखाड़े का संपत्ति पर लंबे समय से रहा है कब्जा"

अखाड़े की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एस. के. जैन ने पूरी संपत्ति पर विशेष कब्जा देने का दावा पेश किया। उन्होंने कहा कि अखाड़े का लंबे समय तक उक्त संपत्ति पर कब्जा रहा है और उसने देवता की ओर से दायर मुकदमे से 30 साल पहले वर्ष 1959 में मुकदमा दायर किया था।

"प्रबंधक का दावा कैसे हो सकता है देवता के प्रतिकूल१"

लेकिन CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने एस. के. जैन से देवता के 'शबैत' के दावे की कानूनी दृढ़ता के बारे में सवाल किया।

"शबैत (प्रबंधक) का दावा कभी भी देवता के प्रतिकूल नहीं हो सकता। यदि आप सूट 5 (देवता द्वारा दायर वाद ) को चुनौती दे रहे हैं तो आप देवता के टाइटल के खिलाफ जा रहे हैं। इसलिए, एक शबैत के रूप में आप कह रहे हैं कि देवता के मुकदमे को खारिज करें। मान लें कि मुकदमा 5 खारिज कर दिया गया तो आपका कोई स्वतंत्र दावा नहीं है। आप जीवित नहीं रह सकते," जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा।

"क्या अखाड़ा ले रहा है देवता के विपरीत स्थिति"

जैन ने जवाब में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय हैं जो यह कहते हैं कि मंदिर प्रबंधन पर कब्जा केवल शबैत को दिया जा सकता है और देवता के 'नेक्स्ट फ्रेंड' (next friend) को नहीं। तब जस्टिस बोबड़े ने अखाड़े को यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या वह "देवता के विपरीत" स्थिति ले रहा है ?

"देवता के हित में फैसला केवल प्रबंधक द्वारा लिया जाना मुमकिन"

जैन ने अदालत को यह समझाया कि देवता (राम लला) की याचिका वर्ष 1989 में दाखिल की गई थी लेकिन अखाड़ा वर्ष 1934 से इस स्थान पर काबिज है। "मैंने यह दलील ली है कि देवता के हित में फैसला केवल शबैत द्वारा ही लिया जा सकता है," उन्होंने कहा। भगवान राम का जन्म स्थान एक "न्यायिक व्यक्ति" नहीं है, जैसा कि दावा किया गया है और अखाड़े ने यह दावा करने का हकदार है, जैन ने जोर दिया।

"अखाड़ा का दावा केवल कब्जे और भक्त के रूप में प्रबंधन को लेकर"

पीठ ने कहा कि अखाड़ा ने अब तक उच्च न्यायालय में इसके द्वारा बनाए गए मामले के विपरीत तर्क दिया है और जैन से कहा है कि वो "योग्यता पर मामला बनाने" के लिए दस्तावेजों का उल्लेख करें। जैन ने कहा कि अखाड़ा संपत्ति के मालिकाना हक का दावा नहीं कर रहा है बल्कि अपने कब्जे और एक भक्त के रूप में प्रबंधन करने के अधिकार का दावा पेश कर रहा है।

"शबैत के अधिकार के समर्थन में मौखिक साक्ष्य उपलब्ध"

एक स्पष्ट प्रश्न के जवाब में कि क्या उसके पास शबैत के अधिकार के समर्थन में कोई दस्तावेजी साक्ष्य है, जैन ने यह कहा, "मेरे पास मौखिक साक्ष्य हैं (गवाहों के) जो दूसरों द्वारा अस्वीकार नहीं किए गए हैं " और उन्होंने विवादित स्थल का प्रबंधन इंगित करने के लिए बयान पढ़े। उन्होंने यह भी कहा कि अखाड़े में एक डकैती में रिकॉर्ड खो गया है।

पीठ ने तब अभिलेखों से यह बताया कि उन्होंने कहा है कि अखाड़ा 'राम चबूतरा' में पूजा कर रहा था। जैन ने कहा कि इसका मतलब 'राम चबूतरा मंदिर' है। पीठ ने कहा, "ऐसा नहीं है ... आपने विवादित मंदिर और राम चबूतरा में अंतर किया है।"

वकील के बयानों पर कि मौखिक बयानों को ठीक से दर्ज नहीं किया गया है, पीठ ने यह कहा, "ये विटनेस बॉक्स में दिए गए प्रमाण नहीं हैं। ये वो हलफनामे हैं जो विवेक का इस्तेमाल कर तैयार किए जाते हैं।"

दलील के दौरान अखाड़ा ने स्वयं को बताया गरीब

जैन ने कहा कि अखाड़ा "गरीब" है क्योंकि उसने वर्ष 1982 में विवादित ढांचे के बाहरी आंगन पर कब्जा करने के बाद पैसे सहित सभी कुछ खो दिया था और फिर वर्ष 1992 में पूरी संरचना को ध्वस्त कर दिया गया था। पीठ 26 अगस्त को मामले की आगे सुनवाई करेगी।

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