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एक महीने तक दिल्ली से बाहर रहने की शर्त पर चंदशेखर आज़ाद को मिली ज़मानत

LiveLaw News Network
15 Jan 2020 12:43 PM GMT
एक महीने तक दिल्ली से बाहर रहने की शर्त पर चंदशेखर आज़ाद को मिली ज़मानत
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दिल्ली कोर्ट ने बुधवार को दरियागंज में सीएए के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में 21 दिसंबर से हिरासत में चल रहे भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर आजाद को जमानत दे दी।

तीस हजारी अदालत की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉक्टर कामिनी लाऊ ने यह शर्त लगाई कि आज़ाद को एक महीने के लिए दिल्ली से बाहर रहना होगा और उक्त अवधि के दौरान उन्हें उत्तर प्रदेश में अपने मूल स्थान सहारनपुर में रहना चाहिए।

न्यायाधीश ने कहा,

"ये विशेष परिस्थितियां हैं। मुझे दिल्ली चुनाव के दौरान कोई परेशानी नहीं चाहिए।"

अदालत ने हालांकि, आजाद के वकील महमूद प्राचा के अनुरोध पर आज़ाद को जामा मस्जिद जाने की अनुमति दे दी गई (आजाद ने घोषणा की थी कि वह अपनी रिहाई पर जामा मस्जिद का दौरा करेंगे)।

न्यायाधीश ने कहा कि आजाद अगले चौबीस घंटे तक सहारनपुर जाने से पहले जाम मस्जिद जाने के लिए फ्री हैं।

हालांकि प्रचा ने यह समझाने का प्रयास किया कि आजाद को दिल्ली में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए, लेकिन कोर्ट ने इनकार कर दिया।

प्रचा ने आजाद को दिल्ली में अपने घर पर रखने का भी प्रस्ताव दिया। न्यायालय ने हालांकि यह बात खारिज कर दी। जब प्राचा ने कहा कि आजाद को यूपी में सुरक्षा का खतरा है, तो न्यायाधीश ने कहा कि उनके लिए आवश्यक सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि एक महीने तक जमानत की शर्तें लागू रहेंगी। वह शर्तों का संशोधन भी मांग सकते हैं। अदालत ने सहारनपुर के उस स्थान पर रहने के लिए जोर दिया, जिसका पता आज़ाद ने पुलिस को दिया था।

मंगलवार को सरकारी वकील ने ज़मानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा था कि आज़ाद ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए हिंसा भड़काई थी।

अभियोजक ने शुरुआत में आजाद के वकील महमूद प्राचा के साथ पोस्ट साझा करने से इनकार कर दिया था, लेकिन न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा कि जब तक किसी विशेषाधिकार का दावा नहीं किया जाता है, तब तक कथित आपत्तिजनक पोस्ट को साझा किया जाना चाहिए।

इस पर, अभियोजक ने कुछ पोस्ट पढ़ीं। यह देखते हुए कि पोस्ट में सीएए-एनआरसी का विरोध करने के लिए जामा मस्जिद के पास विरोध और धरना के लिए आजाद ने अपनी पोस्ट में आह्वान किया था, इस पर जज ने पूछा, "धरना में क्या गलत है? विरोध करने में क्या गलत है? विरोध करना एक संवैधानिक अधिकार है।"

यह देखते हुए कि पोस्ट में कुछ भी हिंसक नहीं था, न्यायाधीश ने पूछा, "हिंसा कहां है? इन पोस्ट में से किसी के साथ क्या गलत है? कौन कहता है कि आप विरोध नहीं कर सकते? क्या आपने संविधान पढ़ा है?" "आप ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे कि जामा मस्जिद पाकिस्तान है।

यहां तक ​​कि अगर यह पाकिस्तान भी होता तो भी आप वहां जा सकते हैं और विरोध कर सकते हैं। पाकिस्तान अविभाजित भारत का हिस्सा था", न्यायाधीश ने अभियोजक को बताया।

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि आजाद की कोई भी पोस्ट असंवैधानिक नहीं थी और अभियोजक को याद दिलाया कि उन्हें विरोध करने का अधिकार था।

जब अभियोजक ने जवाब दिया कि विरोध के लिए अनुमति लेनी होगी, तो न्यायाधीश ने कहा, "क्या अनुमति? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 144 का दोहराव इसकी शक्ति का दुरुपयोग है (हालिया कश्मीर मामले के फैसले का जिक्र)।" न्यायाधीश ने यह भी कहा कि उन्होंने कई लोगों को देखा है जिन्होंने संसद के बाहर विरोध किया था और बाद में नेता और मंत्री बन गए।

न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि आज़ाद एक "नवोदित राजनीतिज्ञ" हैं, जिन्हें विरोध करने का अधिकार है।

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