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कॉन्ट्रैक्ट और कार्य राज्य के बाहर होने के बाद भी मध्यस्थता समझौता स्टाम्प शुल्क की देनदारी से बच नहीं सकता : बॉम्बे हाइकोर्ट

LiveLaw News Network
1 Dec 2019 3:10 PM GMT
कॉन्ट्रैक्ट और कार्य राज्य के बाहर होने के बाद भी मध्यस्थता समझौता स्टाम्प शुल्क की देनदारी से बच नहीं सकता : बॉम्बे हाइकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर कोई कॉन्ट्रैक्ट महाराष्ट्र के बाहर पूरा होता है और उसका काम भी राज्य के बाहर होता है, इसके बाद भी ठेके के बारे में अगर कोई विवाद होता है तो उसका फैसला राज्य में ही होगा और इस पर स्टाम्प शुल्क भी महाराष्ट्र स्टाम्प अधिनियम, 1958 के अधीन ही होगा।

विशाखापत्तनम की एक साझेदारी वाली कंपनी एस सत्यनारायण एंड कंपनी ने मध्यस्थता की एक याचिका दायर की है, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जीएस अटल ने यह बात कही। इस मामले में मुंबई की वेस्ट क्वे मल्टीपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड प्रतिवादी है।

मामला क्या है

विशाखापत्तनम पोर्ट ट्रस्ट ने वेस्ट क्वे को बंदरगाह में स्थान निर्माण कार्य का ठेका दिया। प्रतिवादी ने आवेदक एस सत्यनारायण को 5 दिसंबर 2012 को इस कार्य को पूरा करने के लिए सब कांट्रेक्टर नियुक्त किया। इसके तहत एस्सार पैलेट प्लांट, विशाखापत्तनम बंदरगाह के पश्चिम में मजदूरों की आपूर्ति और परिसर के दीवार निर्माण के लिए था।

ठेके के ये सभी काम विशाखापत्तनम में होने थे विवाद सुलझाने के लिए जिस भू-भाग का चुनाव क्लाज़ 55.2 के तहत किया गया वह मुंबई, महाराष्ट्र था और यह निर्धारित किया गया कि सभी दस्तावेजों पर स्टाम्प शुल्क विशाखापत्तनम के स्थानीय नियमानुसार देय होगा।

विवाद हुआ और आवेदक ने 2 और 3 नवंबर 2015 को एक पत्र के माध्यम से मध्यस्थता के लिए नामांकन दायर किया। वेस्ट क्वे ने इसका विरोध किया कि उसे पता नहीं है किस समझौते के तहत यह विवाद है। इसके बाद आवेदक ने प्रतिवादी से कहा कि वह अपना मध्यस्थ नामित करे और चूंकि प्रतिवादी यह करने में विफल रहा, याचिकाकर्ता ने धारा 11 के तहत आवेदन दायर कर दिया।

दलील

अंकिता सिंघानिया ने प्रतिवादी की पैरवी की जबकि केतन चोटानी ने वेस्ट क्वे की पैरवी की। सिंघानिया ने कहा कि इस समझौते को महाराष्ट्र स्टाम्प अधिनियम, 1958 के तहत रखकर देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद कि ठेके का काम महाराष्ट्र के बाहर होना था, इस समझौते को अन्य सभी कारणों से महाराष्ट्र में लाया जाना चाहिए।

सिंघानिया ने इस संबंध में गरवारे वाल रोप्स लिमिटेड बनाम कोस्टल मरीन कंस्ट्रक्शन एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड मामले का हवाला दिया जिसके फैसले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुद्दा था कि मध्यस्थता समझौता पर धारा 11 के उद्देश्य से बिना स्टाम्प के काम चल सकता है जबकि एग्रीमेंट पर स्टाम्प होना चाहिए, यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिसका हवाला नहीं है।

सिंघानिया ने इस मामले में ब्लैक पर्ल होटल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम प्लेनेट एम रिटेल लिमिटेड मामले का हवाला भी दिया।

वकील चोटानी का कहना था कि इस एग्रीमेंट पर महाराष्ट्र में स्टाम्प शुल्क नहीं लग सकता है। उन्होंने कहा कि इसका कारण है महाराष्ट्र स्टाम्प एक्ट की धारा 3 और विशेषकर धारा 3(b)। चोटानी ने कहा कि धारा 3(b) में ऐसे सभी करारों की चर्चा है जो महाराष्ट्र के बाहर किये गए और जो इस अधिनियम के लागू होने के बाद पूर हुए।

फैसला

न्यायमूर्ति पटेल ने कहा,

"धारा 19 एग्रीमेंट पर स्टाम्प लगाने के समय से संबंधित है। धारा 17 ऐसे करार के बारे में है जिसे राज्य में किया गया। धारा 18 ऐसे करार के बारे में है जो राज्य के बाहर हुआ है और जिस पर शुल्क देय है। इन पर राज्य में इनके आने के तीन महीने के भीतर शुल्क अदा की जानी है। पर धारा 19 में धारा 3b की बातें ध्वनित होती हैं और इसमें ऐसे करार की बात है जिसकी परिसंपत्ति राज्य में होती है पर जो करार राज्य के बाहर होता है और इस वजह से यह करार राज्य के तहत आता है।"

न्यायमूर्ति पटेल ने सिंघानिया की दलील से सहमति जताई और कहा,

"...चूंकि शेष करार पर स्टाम्प लगाने की जरूरत है, चूंकि करार के उस हिस्से को राज्य में नहीं लाया गया है, और शेष हिस्से में कुछ भी नहीं किया जा रहा है, और फिर मध्यस्थता समझौतों पर स्टाम्प नहीं लग सकता, इसलिए इन पर कोई स्टाम्प शुल्क देय नहीं है।"

ज़रूरत के हिसाब से, मध्यस्थता क्लाज़ को शेष एग्रीमेंट से अलग करने की जरूरत होगी। मुझे लगता है कि अब इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है और ऐसा नहीं किया जा सकता है। अगर अपीलकर्ता ने स्थानीय राज्य में स्टाम्प शुल्क चुकाया है तो इसको एडजस्ट करना होगा और जो राशि चुकाई जा चुकी है उसके लिए क्रेडिट देना होगा पर इससे दस्तावेज पर स्टाम्प शुल्क की देनदारी महाराष्ट्र स्टाम्प अधिनियम के तहत ख़त्म नहीं होगी।"

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं



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