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अभियुक्त किसी भी समाज में रहने लायक नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने बलात्कार और हत्या के तीन अभियुक्तों की मौत की सजा की पुष्टि की

LiveLaw News Network
27 Oct 2019 7:10 AM GMT
अभियुक्त किसी भी समाज में रहने लायक नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने बलात्कार और हत्या के तीन अभियुक्तों की मौत की सजा की पुष्टि की
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बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद खंड पीठ ने अहमदनगर जिले में स्कूल से वापस घर लौट रही 16 साल की लड़की से बलात्कार करने और उसकी हत्या करने के लिए दोषी ठहराए गए तीन लोगों को मौत की सजा की पुष्टि की है।

न्यायमूर्ति टी.वी नलवाडे और न्यायमूर्ति केके सोनवणे की खंडपीठ ने मामले के तीनों आरोपियों संतोष लोनकर, मंगेश लोनकर और दत्तात्रय शिंदे की ओर से दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया। उन्हें यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम की धारा 3,4,5,6 और भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 376 ए, 376 डी और 376 (1) (2) (एम) के तहत दोषी ठहराया गया था।

क्या था मामला

पीड़ित लड़की की उम्र लगभग 16 वर्ष थी और वह जिला अहमदनगर के गांव हनुमानवाड़ी की रहने वाली थी। वह अलकुटी नामक एक अन्य गांव में स्थित एक स्कूल में 10 वीं कक्षा में पढ़ रही थी। हर दिन वह गांव लोनी-मावला तक पैदल जाती और वहां से वह अलकुटी गांव जाने के लिए बस लेती थी। घटना के दिन 22 अगस्त 2014 को स्कूल में यूनिट टेस्ट चल रहे थे, इसलिए उस दिन पीड़िता सुबह 9: 30 बजे घर से चली गई थी।

जब उसका यूनिट टेस्ट खत्म हो गया , तो वह बस से शाम 5 बजे लोनी-मावला पहुंच गई। जब वह पैदल अपने गांव हनुमानवाड़ी की ओर जा रही थी, तभी बारिश होने लगी और इसलिए वह एक पेड़ के नीचे रुक गई। शाम को 5:15 बजे लड़की के चचेरे भाई अमोल ने उसे पेड़ के नीचे खड़ा देखा था। अमोल अपने दोस्त सागर के साथ मोटरसाइकिल पर पडवाल माला की तरफ जा रहा था।

कुछ दूरी पर जाने के बाद अमोल ने आरोपी व्यक्तियों के साथ थोड़ी बातचीत की क्योंकि वे विपरीत दिशा से मोटर साइकिल पर आ रहे थे। अमोल ने देखा कि पीड़िता ने हनुमानवाड़ी की ओर पैदल चलना शुरू कर दिया था और उसके पीछे कुछ दूरी पर आरोपी व्यक्तियों की मोटर साइकल धीमी गति से उसी दिशा में आगे बढ़ रही थी।

जब लड़की शाम 6 बजे तक घर नहीं पहुंच पाई तो उसके पिता और अन्य रिश्तेदारों ने उसकी तलाश शुरू कर दी। तलाशी के दौरान पीड़िता लड़की की चप्पलें हनुमानवाड़ी की ओर जाने वाली सड़क पर पड़ी मिलीं और इन चप्पल की पहचान पीड़िता की मां ने की थी। फिर इसी के आधार पर उस स्थान के आसपास के क्षेत्र की अच्छी तरह से खोजबीन की गई और उनको शाम के करीब सात बजे एक नहर के पास पीड़िता का शव मिला, जिसके बाद रात 10 बजे तक एफआईआर दर्ज करवाई गई।

अगले दिन यानी 23 अगस्त, 2014 को सुबह लगभग 9 बजे, लोनी मावला की रहने वाली मृतक की सहेली ऐश्वर्या अपने पिता के साथ पुलिस के पास गई। वह गांव अलकुटी के उसी स्कूल में पढ़ती थी, जिसमें मृतका पढ़ती थी और उसी के साथ बस से आती-जाती थी।

ऐश्वर्या ने बताया कि 21 अगस्त, 2014 को मृतका ने उसे बताया था कि आरोपी नंबर 1- संतोष उसे लगभग 2-3 दिनों से तंग कर रहा है और वह घर जाते हुए उसका रास्ता भी रोक रहा था। इतना ही नहीं आरोपी ने पीड़िता को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाने के लिए भी जोर ड़ाला था।

मृतका ने यह भी बताया था कि संतोष ने उसे धमकी दी थी कि वह किसी को उसके आचरण के बारे में न बताए। मृतका को लग रहा था कि अगर उसने उक्त घटना का खुलासा किया तो उसके माता-पिता उसे स्कूल भेजना बंद कर देंगे, क्योंकि संतोष ''गुंडा प्रकृति''का व्यक्ति था।

अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति

सुपारी की दुकान के मालिक गनी पठान ने पुलिस को बताया कि 22 अगस्त 2014 की शाम को संतोष ने उसे बताया था कि उसकी इच्छा पूरी हो गई है। संतोष ने पठान को बताया कि उसने आरोपी मंगेश और दत्तात्रय के साथ मिलकर पीड़ित लड़की का बलात्कार किया और फिर उसे मार ड़ाला। पठान ने बताया कि उसके बाद संतोष ने उसके समक्ष पूरी घटना के बारे में बताया। संतोष ने बताया कि उसने मृतका के मुंह और नाक में कीचड़ डाला था और उसने मृतका के सिर पर पेचकस से वार किए थे। फिर उसके सिर पर पत्थर से भी वार भी किए थे।

कोर्ट का फैसला

फैसले की शुरुआत में कोर्ट ने इस मामले में ऐश्वर्या के व्यवहार की सराहना की और कहा कि-

''यहाँ पर यह न्यायालय चाहता है कि ऐश्वर्या और उसके पिता दोनों के दृष्टिकोण की सराहना की जानी चाहिए। यह कहा जा सकता है कि नाजुक उम्र या इतनी कम आयु की लड़की द्वारा किए गए खुलासे के कारण ही, पुलिस व अन्य को इस मामले में कोई सुराग मिला और वह दोनों अधिक जानकारी देने के लिए आगे भी आए।

यह कहा जा सकता है कि मृतक के चचेरे भाई अमोल (गवाह नंबर-2) ने शुरू में तीनों आरोपियों के खिलाफ संदेह व्यक्त नहीं किया था, यहां तक कि उसने उन्हें घटना के समय उसी सड़क पर जाते हुए भी देखा था,जिस पर पीड़िता जा रही थी। परंतु बाद में यह महसूस किया गया कि उक्त परिस्थिति प्रासंगिक थी और तीनों आरोपियों की इसमें संलिप्तता थी।''

इसके बाद, पीठ ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच की और कहा कि-

''सबूत और रिकॉर्ड बताते हैं कि अभियुक्त नंबर एक,दो व तीन के कपड़ों पर जो मिट्टी या कीचड़ मिला था,वो अपराध के स्थान से एकत्र किए गए कीचड़ के समान था या उससे मिलता था।

चिकित्सा साक्ष्यों से पता चलता है कि मृतका के साथ बार-बार बलात्कार किया गया था। कीचड़ को जबरन उसके मुंह में डाला गया था और उसकी आवाज को दबाने के लिए कीचड़ का इस्तेमाल किया गया था ताकि वह मदद के लिए चिल्ला ना पाए। ये सभी परिस्थितियां समय, जगह और स्थान के संबंध में निकटता स्थापित करने के लिए पर्याप्त हैं। जैसा कि पहले से ही बताया जा चुका है कि इन दोनों परिस्थितियों के अलावा अन्य सबूत भी उपलब्ध हैं। यह न्यायालय मानता है कि अभियोजन पक्ष तीनों आरोपियों के खिलाफ इन परिस्थितियों को संतोषजनक रूप से स्थापित करने में कामयाब रहा है।''

पीठ ने यह भी कहा कि, अभियोजन पक्ष द्वारा स्थापित या पेश परिस्थितियों को यदि एक साथ देखा जाए तो वह आरोपी व्यक्तियों को ही दोषी व्यक्ति साबित करने की तरफ इशारा करते हैं और इसके लिए परिस्थितियों की श्रृंखला को पूरा भी करते हैं।

''प्रत्येक प्रासंगिक तथ्य को अभियोजन पक्ष द्वारा स्थापित किया गया है और सबूतों पर विचार करने के लिए, साक्ष्य अधिनियम की धारा 3 में 'प्रमाण' की परिभाषा में वर्णित दोनों एंगल का उपयोग किया जा सकता है। आरोपी नंबर 1 की अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति भी पूरी तरह साबित हो गई है। यह स्वैच्छिक साबित होती है और मामले में पेश परिस्थितियों से पता चलता है कि इस स्वैच्छिक बयान के तथ्य सही थे। इस प्रकार, अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति पर अगर सहयोगी परिस्थितियों के साथ अलग से विचार किया जाए तो भी यह सबूत आरोपी नंबर 1 के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त है।

अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति का इस्तेमाल आरोपी नंबर 2 और 3 के खिलाफ भी साक्ष्य अधिनियम की धारा 30 के तहत किया जा सकता है। वहीं आरोपी नंबर 2 और 3 के खिलाफ अन्य परिस्थितियों के साथ इन परिस्थितियों पर विचार किया जा सकता है। इन सभी सबूतों से केवल एक ही निष्कर्ष निकलता है कि आरोपी नंबर 2 और 3 भी आरोपी नंबर 1 के साथ अपराध करने में शामिल थे।''

इसके बाद, न्यायालय ने उक्त मामले में आरोपी द्वारा बताई कई क्रूरता को स्पष्ट किया और बताया कि क्यों यह मामला दुर्लभ मामलों के लिए तय टेस्ट को पूरा करता है-

''उसे खत्म करने के लिए तेज हथियार का इस्तेमाल किया गया था और हथियार भी ऐसा था कि जिसके एक वार के कारण मृतक की मौत नहीं हुई होगी। ऐसे में उसने धारदार हथियार से किए गए लगभग सभी वार को देखा होगा और अपनी आखिरी सांस तक उस दर्द सहा होगा। वह आरोपी के इस तरह के व्यवहार के कारण भयभीत रही होगी और इससे पैदा हुआ आतंक कल्पना से परे रहा होगा।

यहां तक कि जब आरोपी नंबर-1 खुद एक पिता है और वह एक शादी-शुदा व्यक्ति था। अन्य आरोपी भी बड़ी उम्र के व्यक्ति थे, फिर भी उन्होंने लगभग 16 वर्ष की आयु की लड़की के साथ ऐसा जघन्य कृत्य किया।

उपर्युक्त परिस्थितियों से पता चलता है कि यह चरम प्रकृति की दुष्टता है। आरोपियों के आचरण से पता चलता है कि उनमें सुधार की कोई संभावना नहीं है और वे किसी भी समाज में रहने के लायक नहीं हैं। समाज ऐसे लोगों को पसंद नहीं करेगा और इसीलिए गांव के लोगों ने इस घटना के बाद 24-8-2014 को आंदोलन किया था, ताकि घटना के संबंध में शीघ्र और उचित कार्रवाई हो सके। इस न्यायालय को यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह मामला दुर्लभ मामले के परीक्षण पर मेल खाता है।

इस प्रकार, ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में हस्तक्षेप करना संभव नहीं है और मौत की सजा की पुष्टि की जानी चाहिए।''


फैसले की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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