उपभोक्ता संरक्षण मंचों के ग़लत फ़ैसले के कारण शिकायतकर्ता से भेदभाव नहीं किया जा सकता : एनसीडीआरसी

LiveLaw News Network

3 Jan 2020 5:08 AM GMT

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  • उपभोक्ता संरक्षण मंचों के ग़लत फ़ैसले के कारण शिकायतकर्ता से भेदभाव नहीं किया जा सकता : एनसीडीआरसी

    ग़लत फ़ैसले के कारण एक मामले को दुबारा ज़िला मंच को भेजने के आग्रह को अस्वीकार करते हुए एनसीडीआरसी ने कहा, "उपभोक्ता संरक्षण मंचों के ग़लत फ़ैसले के कारण शिकायतकर्ता से भेदभाव नहीं किया जा सकता।"

    अदालत ने कहा कि फ़ैसले पर पुनर्विचार चाहने वाले याचिकाकर्ता अपनी कार के निर्माण में हुई गड़बड़ी से पीड़ित है और उसने ज़िला मंच में इस बारे में 2005 में शिकायत की थी। मंच ने उसके मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया आर टाटा मोटर्स को इस कार को बदलने का आदेश दिया था पर एनसीडीआरसी ने कहा कि ज़िला मंच यह देखने में विफल रहा कि यह कार एक फ़र्म के नाम पर ख़रीदी गई थी, इसलिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(1) के तहत यह निर्धारित करना ज़रूरी था कि याचिकाकर्ता वास्तव में 'शिकायतकर्ता'है।

    न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल (अध्यक्ष) और दिनेश सिंह (सदस्य) की पीठ ने कहा कि सबसे पहले यह निर्धारित करना ज़रूरी है कि याचिकाकर्ता वाकई 'शिकायतकर्ता' है कि नहीं। कोर्ट ने कहा कि इस कार की प्रयोगशाला में जांच करना और गड़बड़ी का निर्धारण करने की बात ने मामले को और ज़्यादा बिगाड़ दिया।

    राज्य मंच ने टाटा की अपील सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली जिसमें कंपनी ने कहा था कि अगर कोई गड़बड़ी है तो वह उसे दूर कर देगा। एनसीडीआरसी ने कहा कि दिया गया आदेश 'अनुचित' था। इसमें आंतरिक ख़ामियां हैं -

    यह कहने के बाद कि ज़िला मंच ने 'निर्माण में गड़बड़ी' का निर्धारण करने में ग़लती की है, राज्य आयोग ने एक फ़ैसला दिया जिसमें उसने ख़ुद 'गड़बड़ी', अगर कोई है, तो उसको दूर करने का आदेश दिया। अदालत ने इस मामले की दुबारा ज़िला मंच को नहीं भेजा ताकि उस पर ताज़ा निर्णय लिया जा सके।

    पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका के निस्तारण का उचित तरीक़ा यह होता कि इस मामले को दुबारा ज़िला मंच को निर्णय के लिए भेजा जाता। पर यह देखते हुए कि इस मामले को 14 साल हो गए हैं, और अब अगर ऐसा किया जाता है तो यह याचिकाकर्ता के साथ अन्याय होगा।

    पीठ ने कहा, "साफ़ है कि अब इस कार की 'उचित प्रयोगशाला' में जांच नहीं कराई जा सकती कि इसमें किस तरह की गड़बड़ी थी। यह मामला ज़िला मंच के पास 28.04.2005 को आया।

    इस मामले के फ़ैसले में अनावश्यक 14 साल का समय लगा और नियमतः जिस तहक़ीक़ात की बात की गई है वैसी जांच अब संभव नहीं है और यह भी ठीक नहीं लगता कि इस तरह के मामले को 14 सालों के बाद दुबारा ज़िला मंच को वापस किया जाए। ज़िला मंच समय को पीछे नहीं ले जा सकता और 'गड़बड़ी' का विश्वसनीय निर्धारण के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं कर सकता।"

    पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका के लंबित रहने के दौरान कंपनी ने राज्य आयोग के आदेश का पालन किया और गड़बड़ी को दूर कर दिया था और न्याय के हित में इसे नहीं छेड़ा जाना चाहिए।

    "निर्माता या डीलर ने राज्य आयोग के फ़ैसले को चुनौती नहीं दी है और न ही राज्य आयोग के आदेश पर आयोग ने कोई अंतरिम रोक लगाया और राज्य आयोग के आदेश का जो पालन हुआ …उसको देखते हुए अगर अब इसको छेड़ा गया तो यह न्याय के ख़िलाफ़ होगा।"

    आयोग ने स्पष्ट किया कि इस मामले को संदर्भ के रूप में पेश नहीं किया जाएगा।




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