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केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली धर्म आधारित प्रार्थना को चुनौती देने वाली याचिका को SC ने संविधान पीठ को भेजा

Rashid MA
28 Jan 2019 8:31 AM GMT
केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली धर्म आधारित प्रार्थना को चुनौती देने वाली याचिका को SC ने संविधान पीठ को भेजा
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क्या देश के केंद्रीय विद्यालयों में सुबह के वक्त होने वाली संस्कृत और हिंदी की प्रार्थना असंवैधानिक है? सुप्रीम कोर्ट की 2 जजों की पीठ ने बड़ी पीठ के पास इस मामले को रिफर कर दिया है।

सोमवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की पीठ ने कहा कि ये मुद्दा धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है और इसकी सुनवाई संविधान पीठ को करनी चाहिए। इसलिए इस मामले को चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा जा रहा है।

वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इस मामले को बड़ी पीठ को भेजे जाने से पहले उनकी बात सुनी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सुबह की प्रार्थना भले ही संस्कृत में होती है, लेकिन ये भाषा किसी धर्म से नहीं जुड़ी हुई है। अदालत में भी संस्कृत का श्लोक लिखा रहता है।

लेकिन पीठ ने कहा कि ये प्रार्थना उपनिषद से ली गई है। जिसको जो कहना है वो बड़ी पीठ के सामने कह सकता है।

इससे पहले 10 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस याचिका पर नोटिस जारी किया था, जिसमें देश भर में 1,125 केन्द्रीय विद्यालय (KV ) में सुबह की प्रार्थना के रूप में एक हिन्दू धर्म आधारित गीत पर रोक लगाने की मांग की गई है।

याचिका में कहा गया है कि ये धार्मिक निर्देश है जो "छात्रों के बीच एक वैज्ञानिक स्वभाव को विकसित करने में बाधाएं उत्पन्न करेगा।" याचिका में जोर देकर कहा गया है कि राज्य द्वारा वित्त पोषित एक विद्यालय या शैक्षणिक संस्थान किसी भी विशिष्ट धर्म का प्रचार नहीं कर सकते।

वकील विनायक शाह द्वारा दायर की गई याचिका, जिनके बच्चे KV से पास हुए थे, की सुनवाई करते हुए जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन और जस्टिस नवीन सिन्हा ने कहा था कि याचिकाकर्ता ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। बेंच ने केद्र सरकार से 4 हफ्ते में जवाब मांगा था।

याचिका में उत्तरदायकों को किसी भी प्रकार की प्रार्थना को बंद करने या केन्द्रीय विद्यालय संगठन में विद्यार्थियों के बीच वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उत्तरदायकों को किसी भी अन्य उपयुक्त रिट, आदेश या निर्देश जारी करने की मांग की गई है।

दरअसल अनुच्छेद 28 (1) को इस याचिका में शामिल करते हुए कहा गया है कि "पूरी तरह राज्य की निधि से चलने वाले" किसी भी शैक्षणिक संस्था में कोई भी धार्मिक शिक्षा नहीं होगी। शाह ने तर्क दिया कि "धार्मिक निर्देश की अभिव्यक्ति एक प्रतिबंधित अर्थ है। यह बताता है कि पूरी तरह से राज्य निधियों से चलने वाले शैक्षिक संस्थानों में रीति रिवाजों, पूजा के तरीकों, प्रथाओं या अनुष्ठानों के शिक्षण की अनुमति नहीं दी जा सकती।

याचिकाकर्ता इस बात से सहमत है कि उपरोक्त सामान्य प्रार्थना भारत के संविधान के अनुच्छेद 28 के अर्थ के भीतर एक "धार्मिक अनुदेश" है और इसलिए इसे निषिद्ध होना चाहिए।

शाह ने तर्क दिया कि सभी छात्रों को आम प्रार्थना का पाठ करके अपना दिन शुरू करना होगा। इस अभ्यास में छात्रों के बीच एक वैज्ञानिक स्वभाव विकसित करने में कई बाधाएं पैदा होती हैं क्योंकि परमेश्वर और धार्मिक विश्वास के पूरे विचार को इस प्रक्रिया में बहुत प्राथमिकता दी जाती है और इसी तरह छात्रों के बीच एक विचार प्रक्रिया के रूप में भी इसे डाला जाता है।

इसके परिणामस्वरूप छात्र रोजमर्रा की जिंदगी और जांच की भावना में सुधार के बावजूद, व्यावहारिक परिणाम विकसित करने के बजाय सर्वशक्तिमान से शरण लेने की दिशा में एक झुकाव विकसित करना सीखते हैं और कहीं ऐसा लगता है कि सुधार खो गया है।

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