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राजनीतिक पार्टियों को RTI अधिनियम के दायरे में लाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया

Live Law Hindi
15 April 2019 1:51 PM GMT
राजनीतिक पार्टियों को RTI अधिनियम के दायरे में लाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों - भाजपा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई, सीपीआई (एम) और बीएसपी को उस याचिका पर नोटिस जारी कर उनकी ओर से जवाब मांगा है जिसमें कहा गया है कि राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया जाए।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने बीजेपी नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर यह नोटिस जारी किया और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष सी. अग्रवाल द्वारा पहले से दायर याचिकाओं के साथ मामले को टैग करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत किया कि राजनीतिक दल एक महत्वपूर्ण शक्ति रखते हैं और विधायिका व कार्यपालिका के साथ-साथ अपने स्वयं के उम्मीदवारों पर पकड़ रखते हैं। संविधान के तहत चुने गए सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराने की राजनीतिक दलों की शक्ति के कारण यह पकड़ संपूर्ण हो जाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों को जनता से चंदे के रूप में एक बड़ी रकम मिलती है और वे किसी भी कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। इसलिए उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों ने कई वर्षों से CIC के आदेश की अवहेलना की है।

याचिकाकर्ता ने याचिका के जरिये देश के सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के कामकाज में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है। याचिका में सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक आय और उनके चुनावी ट्रस्टों को दान देने वाले दानदाताओं के विवरण सहित उनकी आय, व्यय, दान और धन के सार्वजनिक विवरण की पूरी जांच करने के लिए दिशा निर्देश मांगे गए हैं।

कहा गया है कि राजनीतिक व्यवस्था और राजनीतिक दलों में पारदर्शिता की कमी के कारण जनता के हितों को भारी नुकसान हो रहा है क्योंकि चुनावी प्रणाली से भारी काला धन पैदा हो रहा है और हर चुनाव में एक बड़ी रकम खर्च की जा रही है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (ए) और 21 के तहत गारंटीकृत नागरिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

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