Top
Begin typing your search above and press return to search.
ताजा खबरें

चुनाव के आसपास डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजनाएं भ्रष्ट प्रथा के समान: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर ECI से जवाब मांगा

Live Law Hindi
3 July 2019 6:28 AM GMT
चुनाव के आसपास डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजनाएं भ्रष्ट प्रथा के समान: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर ECI से जवाब मांगा
x

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है, जिसमें चुनाव के आसपास सरकारों द्वारा नकद हस्तांतरण (डायरेक्ट कैश ट्रांसफर) योजनाओं को असंवैधानिक और भ्रष्ट चुनावी प्रथाओं के रूप में घोषित करने की मांग की गई है। ये नोटिस चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने जारी किया।

चुनाव आयोग द्वारा दिशा-निर्देश तैयार करे जानी की मांग

याचिका में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग, चुनाव के समय के आसपास सरकारों द्वारा मुफ्त, कल्याणकारी योजनाओं आदि की घोषणा के बारे में दिशा-निर्देश तैयार करे।

याचिका में दिया गया कुछ प्रमुख योजनाओं का हवाला

जनप्रतिनिधि पार्टी के उम्मीदवार के रूप में हाल के आम चुनावों में आंध्र प्रदेश के एलुरु सीट से चुनाव लड़ने वाले डॉ. पीतापति पुल्ला राव द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र सरकार की पीएम किसान सम्मान निधि योजना और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल आदि सरकारों की घोषित योजनाओं का हवाला दिया गया जिन्होंने कथित रूप से सत्तारूढ़ दल को अनुचित लाभ दिया।

याचिका में पीएम किसान सम्मान निधि योजना का दिया गया उदाहरण

जेएनयू दिल्ली और शिकागो विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने वाले अर्थशास्त्री याचिकाकर्ता ने यह कहा कि पीएम किसान सम्मान निधि योजना ने 3 समान किस्तों में लगभग 12 करोड़ किसानों को रु .6000 का हस्तांतरण करने का प्रस्ताव दिया।

यह चुनावों की घोषणा के 3 महीने पहले 1 दिसंबर, 2018 से लागू हुई और आम चुनाव के बीच में अप्रैल में 2000 रुपये की दूसरी किस्त हस्तांतरित की गई थी। इसी तरह आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा घोषित विभिन्न योजनाओं में भी किस्तों का भुगतान लाभार्थियों को किया गया जबकि चुनाव चल रहे थे।

आंध्र प्रदेश में पासुपु कुमकुमा योजना का भी दिया गया हवाला

निर्वाचन आयोग द्वारा दिशानिर्देशों की कमी के कारण आंध्र प्रदेश ने पासुपु कुमकुमा योजना के नाम पर स्वयं सहायता समूह की 94 लाख महिला सदस्यों को 10 हजार रुपये यानी 9400 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए। इस कार्यक्रम को जनवरी, 2019 में चुनाव प्रक्रिया के दौरान लॉन्च किया गया था। याचिका में यह कहा गया है कि पश्चिम बंगाल, झारखंड और तेलंगाना की सरकारों ने भी इसी तरह की योजनाओं को अंजाम दिया है।

"नकद हस्तांतरण आदर्श आचार संहिता को करते हैं दरकिनार"

याचिकाकर्ता के अनुसार ऐसे नकद हस्तांतरण चुनाव की आदर्श आचार संहिता को दरकिनार करते हैं। एक उम्मीदवार या उसके एजेंट द्वारा किसी मतदाता को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित करने के लिए उपहार, प्रस्ताव या वादा करना जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 की धारा 123 (1) के तहत रिश्वत के समान होगा। याचिकाकर्ता ने कहा कि नकद हस्तांतरण योजनाएं, चुनावों के दौरान इस अधिनियम के तहत 'भ्रष्ट' प्रथा की परिभाषा के तहत आती हैं।

SC के पूर्व निर्णयों का दिया गया संदर्भ

याचिका में के. एस. सुब्रह्मण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य में सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के फैसले का उल्लेख किया गया है जिसमें चुनाव के अासपास सरकारों द्वारा चुनावों के लिए 'मुफ्त' उपहारों को विनियमित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया गया था।

याचिका में भारतीय चुनाव आयोग बनाम राजाजी मैथ्यू थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी को भी संदर्भित किया गया है कि आदर्श आचार संहिता का इरादा था कि "किसी पार्टी द्वारा सत्ता में रहने पर चुनाव की तिथि की निकटता पर किसी लाभ को प्राप्त करने या चुनावी प्रक्रिया में शामिल सभी राजनीतिक दलों के लिए खेल के मैदान को मुश्किल करने के लिए कदम नहीं उठाना चाहिए।

"इस माननीय न्यायालय के निर्णय/आदेशों को लागू नहीं करने के कारण सत्ता में रहने वाले दलों ने मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के माध्यम से सरकारी खजाने से नकदी का वितरण शुरू किया है। प्रत्यक्ष नकद अंतरण योजनाएं चुनाव की पूर्व संध्या पर लागू होती हैं। यहां तक कि चुनाव की घोषणा के बाद भी मतदाताओं को प्रभावित किया जाता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गारंटीकृत चुनाव की प्रक्रिया में भाग लेने में समान अवसर का उल्लंघन है," पुला राव ने अपनी इस याचिका में कहा है जिसे वकील श्रवण कुमार द्वारा ड्राफ्ट और हितेंद्र नाथ रथ के माध्यम से दाखिल किया गया है।

"बजटीय आवंटन के बिना किया गया फंड ट्रांसफर"

याचिका में आगे यह भी आरोप लगाया गया है कि आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा बिना किसी बजटीय आवंटन के नकद हस्तांतरण किए गए थे और इसके परिणामस्वरूप अनुबंध के कर्मचारियों को वेतन और आंध्र प्रदेश में अन्य आवश्यक खर्चों के लिए रुपयों की रिलीज को अवरुद्ध कर दिया गया है।

"भारत के संविधान के अनुच्छेद 112 और 202 केवल सार्वजनिक प्रयोजन के लिए राज्य के समेकित कोष से धन की निकासी की अनुमति देते हैं, लेकिन प्रतिवादी संख्या 2 से 7 में सत्ता में रहने वाली पार्टियों ने जनता का पैसा चुनावी लाभ पाने के लिए अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए खर्च किया है। भारत के संविधान के जनादेश के विपरीत विरोधियों पर लाभ पाने के लिए 2019-20 में बजट आवंटित किए बिना मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए चुनावों से पहले नाराज किसानों को शांत करने के लिए योजनाएं शुरू की गईं, " याचिका में यह आरोप लगाया गया है जिसमें केंद्र सरकार, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना और कर्नाटक को उत्तरदाता बनाया गया है।

अंत में इस याचिका में चुनावों की घोषणा से पहले सत्ता में रहने वाले राजनीतिक दलों द्वारा सही और निष्पक्ष चुनावों पर प्रभाव डालने वाली योजनाओं के लिए से कम से कम 6 महीने पहले का समय निर्धारित करने के दिशा-निर्देश देने की मांग की गई है।

Next Story