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लोकपाल : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 10 दिनों में बताने को कहा, कब होगी चयन समिति की बैठक

Live Law Hindi
7 March 2019 3:25 PM GMT
लोकपाल : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 10 दिनों में बताने को कहा, कब होगी चयन समिति की बैठक
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लोकपाल की नियुक्ति को लेकर दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा है कि वो 10 दिनों के भीतर पीठ को यह सूचित करे कि लोकपाल की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली चयन समिति कब बैठक करेगी।

वहीं मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 3 जजों की पीठ ने पीएम की अध्यक्षता वाली चयन समिति को सर्च पैनल द्वारा भेजे गए नामों को सार्वजनिक करने की प्रशांत भूषण की अर्जी ठुकरा दी।

इस दौरान केंद्र की ओर से पेश AG के. के. वेणुगोपाल ने पीठ को बताया कि सुप्रीम कोर्ट की रिटायर जज जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाले सर्च पैनल ने कोर्ट के आदेश के अनुसार लोकपाल, इसके न्यायिक सदस्य व गैर- न्यायिक सदस्यों के लिए 3-3 नामों का पैनल चयन समिति के लिए 28 फरवरी को भेजा गया है। AG ने कहा कि अब पीएम की अध्यक्षता वाला पैनल लोकपाल और उसके सदस्यों का चयन करेगा।

वहीं वकील प्रशांत भूषण चाहते थे कि इस खोज पैनल द्वारा चुने गए नामों को सार्वजनिक किया जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस मांग को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस ने कहा, "पारदर्शिता एक व्यक्तिपरक शब्द है। आपने अच्छा काम किया है, लेकिन कहीं न कहीं एक सीमा भी होनी चाहिए। आपको रुकना होगा। हमें नहीं लगता कि नामों को सार्वजनिक करने की कोई आवश्यकता है।"

वहीं पीठ ने चयन समिति में प्रमुख विपक्षी दल के नेता को 'विशेष आमंत्रित' के तौर पर बुलाने पर भी सवाल किया। चीफ जस्टिस ने कहा कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए कानून में बदलाव हो चुका है लेकिन लोकपाल के लिए नहीं। ऐसे में मल्लिकार्जुन खड़गे को यही शिकायत है कि उन्हें समिति में 'विशेष आमंत्रित' के तौर पर बुलाया गया।

खड़गे का कहना है कि "भागीदारी, राय देने एवं वोटिंग के अधिकार के बिना 'विशेष आमंत्रित' के रूप में निमंत्रण दिया जाना, छलावा है।" दरअसल, लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 के अनुसार, लोकसभा में विपक्ष का नेता चयन समिति का सदस्य होता है। चूंकि श्री खड़गे के पास वह दर्जा नहीं है, इसलिए उन्हें चयन पैनल का हिस्सा नहीं बनाया गया और उन्हें केवल 'विशेष आमंत्रित' के रूप में पैनल में रखा गया है।

17 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सर्च कमेटी से यह आग्रह किया था कि वो लोकपाल व इसके सदस्यों के नामों को शार्टलिस्ट कर 6 हफ्ते के भीतर चयन समिति को भेजे।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने कहा था कि ये सूची फरवरी के अंत तक भेजी जानी चाहिए। पीठ ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया कि वो सर्च कमेटी को ढांचागत संसाधन उपलब्ध कराए।

5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को यह निर्देश दिया था कि वह सितंबर 2018 से अभी तक सर्च कमेटी के कदम पर एक हलफनामा दाखिल करे।

इधर गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि सरकार ने सर्च कमेटी के सदस्यों के नाम तक अपनी वेबसाइट के जरिये सार्वजनिक नहीं किये हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई में लोकपाल की नियुक्ति के मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के हलफनामे को असंतोषजनक करार देते हुए 4 हफ्ते में फिर से नया हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए थे।

पीठ ने केंद्र की उन दलीलों को मानने से इनकार किया था जिसमें कहा गया कि 19 जुलाई 2018 को प्रधानमंत्री की हाई पॉवर सेलेक्शन कमेटी की मीटिंग हुई जिसमें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और भारत के तत्कालीन अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने हिस्सा लिया जबकि विशेष रूप से आमंत्रित मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाग लेने से इनकार कर दिया। वहीं केंद्र की ओर से पक्ष रख रहे अटार्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा था कि सर्च पैनल के लिए जल्द ही फिर से मीटिंग की जाएगी।

वहीं याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि कानून बने 4.5 साल बीत चुके हैं। इसे लेकर केंद्र सरकार गंभीर नहीं है। अब या तो अदालत अवमानना की कार्रवाई करे या फिर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार का प्रयोग कर लोकपाल की नियुक्ति करे। हालांकि बेंच ने कहा था कि वो समय अभी नहीं आया है।

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