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सुप्रीम कोर्ट ने क्षेत्रीय भाषाओं में भी फैसले अपलोड करने शुरू किए

Live Law Hindi
18 July 2019 5:23 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने क्षेत्रीय भाषाओं में भी फैसले अपलोड करने शुरू किए
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बुधवार से सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्षेत्रीय भाषाओं में भी मिलने शुरू हो गए हैं। भारत की सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक वेब पोर्टल में क्षेत्रीय भाषाओं में निर्णय अपलोड होना शुरू हो गए हैं।

न्यायमूर्ति एसए बोबडे ने आधिकारिक तौर पर की शुरुआत
बुधवार को आयोजित एक समारोह में न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे ने उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के अनुवाद को क्षेत्रीय भाषाओं में जारी किया। उन्होंने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को इसकी पहली प्रति भेंट की। जस्टिस बोबडे ने आधिकारिक तौर पर इसे सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर भी जारी किया।

अब तक 6 भाषाओं में हुआ है अनुवाद

अब सुप्रीम कोर्ट पोर्टल के मुख पृष्ठ में 'वर्नाक्युलर जजमेंट्स' नामक एक अलग टैब देखा जा सकता है। अब तक फैसले का अनुवाद 6 स्थानीय भाषाओं में किया गया है: असमिया, हिंदी, कन्नड़, मराठी, उड़िया और तेलुगु। किसी विशेष राज्य से संबंधित मामले का निर्णय उस राज्य की भाषा में अनुवादित किया जा रहा है। मसलन अगर कर्नाटक का मामला है तो फैसला कन्नड़ भाषा में भी मिलेगा।

CJI ने दी थी इन-हाउस सॉफ्टवेयर को मंजूरी

भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के इलेक्ट्रॉनिक सॉफ्टवेयर विंग द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित सॉफ्टवेयर को मंजूरी दी थी। रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अंग्रेजी में लिखे गए आदेशों को जिस दिन उन्हें पारित किया जाएगा उसी दिन वेबसाइट पर अनुवाद किए गए संस्करणों को भी अपलोड किया जाएगा।

राष्ट्रपति ने वर्ष 2017 में इस विचार का किया था अनुमोदन

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अक्टूबर 2017 में इस विचार को सामने रखा था और यह कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में ऐसी प्रणाली विकसित की जा सकती है जैसी प्रणाली द्वारा निर्णय की अनुवादित प्रतियाँ स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में कई उच्च न्यायालयों द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं।

राष्ट्रपति ने क्या कहा था१
केरल उच्च न्यायालय के डायमंड जुबली समारोह में बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा था: "न केवल लोगों को न्याय दिलाना महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी कि उनको उस भाषा में फैसला मिले जिसे वो जानते हैं। उच्च न्यायालय अंग्रेजी में निर्णय देते हैं लेकिन हम विविध भाषाओं वाला देश हैं। मुकदमे के सभी पक्षकार अंग्रेजी में बातचीत नहीं कर सकते और निर्णय के महीन बिंदु उनसे छूट सकते हैं। इस प्रकार मुकदमेबाजी पक्ष निर्णय का अनुवाद करने के लिए वकील या किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर होंगे। यह उनके समय और लागत को बढ़ा सकता है। "

उन्होंने आगे यह सुझाव दिया था, "शायद एक ऐसी प्रणाली विकसित की जा सकती है जिसके द्वारा निर्णयों की प्रमाणित प्रतियाँ स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में माननीय उच्च न्यायालयों द्वारा उपलब्ध कराई जा सकती हैं। यह फैसला सुनाए जाने के 24 या 36 घंटे बाद की अवधि में हो सकता है। इसमें केरल उच्च न्यायालय में मलयालम या पटना उच्च न्यायालय में हिंदी भाषा हो सकती है, जैसा भी मामला हो।"

निर्णय यहाँ पढ़े

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