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चुनावी बॉन्ड : केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में फिर योजना को सही ठहराया, चुनाव आयोग के रुख को गलत बताया

Live Law Hindi
4 April 2019 1:55 PM GMT
चुनावी बॉन्ड : केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में फिर  योजना को सही ठहराया, चुनाव आयोग के रुख को गलत बताया
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चुनावी बॉन्ड के मामले को लेकर केंद्र सरकार ने एक बार फिर कहा है कि राजनीतिक दलों को चंदे को लेकर पुरानी प्रणाली "पूरी तरह से अपारदर्शी" थी जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों को मिले चंदे के खर्च को लेकर कोई जवाबदेही नहीं थी और दलों को काला धन के जरिए बेहिसाब नकदी दी जाती थी।

पुरानी व्यवस्था में काले धन का होता था उपयोग

केंद्र सरकार ने दूसरा हलफनामा चुनाव आयोग के हलफनामे के बाद किया है जिसमें चुनावी बॉन्ड पर सवाल उठाए गए हैं। अपने ताजा जवाब में वित्त मंत्रालय में निदेशक अखिलेश कुमार मिश्रा ने कहा है कि पुरानी व्यवस्था के तहत राजनीतिक दलों को भारी मात्रा में व्यक्तियों/कॉर्पोरेट द्वारा अवैध साधनों का उपयोग करके नकद धन चंदे के तौर पर दिया जा रहा था। पूर्व में यह सुनिश्चित किया गया था कि बेहिसाब आपराधिक धन/काला धन चुनावों के वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल हो।

नई व्यवस्था में किये गए हैं परिवर्तन

चुनाव आयोग के इस रुख के बारे में कि पुरानी व्यवस्था पारदर्शी थी, केंद्र ने यह तर्क दिया कि राजनीतिक दल बेहिसाब नकदी से निपटने के लिए वाहनों को इस्तेमाल करते थे। अधिकांश दान नकद में होता था और 20 हज़ार रुपये से नीचे के किसी भी नकद दान को खाते की आवश्यकता नहीं थी। इस पर अंकुश लगाने के लिए दान की नकद सीमा अब 2 हज़ार रुपये कर दी गई है और इससे ऊपर की कोई भी राशि चुनावी बॉन्ड के माध्यम से होगी जहां धन के स्त्रोत की पहचान की जा सकती है क्योंकि धन का हस्तांतरण चेक, ड्राफ्ट या डिजिटल स्थानांतरण द्वारा किया जाता है।

इसके अलावा ये बॉन्ड अधिकृत बैंकों द्वारा जारी किए जाते हैं और ये 15 दिनों की समाप्ति अवधि के होते हैं। इस परिवर्तन का प्रमाण देते हुए केंद्र ने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा तैयार किए गए एक वैश्विक अध्ययन का हवाला दिया जिसमें भ्रष्टाचार के मामले में वर्ष 2018 में 180 देशों के बीच भारत को 78वें नंबर पर रखा गया जबकि वर्ष 2012 में भारत 94वें पायदान पर था।

चुनाव आयोग ने जताई असहमति

28 मार्च को चुनावी बॉन्ड मामले में चुनाव आयोग ने कहा है कि इससे राजनीतिक दलों को शेल कंपनियों के माध्यम से बेनामी कॉरपोरेट चंदे के लिए काले धन का उपयोग बढ़ सकता है। केंद्र सरकार से असहमति जताते हुए भारतीय चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि 'इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम' का राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट में चुनावी बॉन्ड को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दायर जवाबी हलफनामे में चुनाव आयोग द्वारा खुलासा किया गया है कि उसने इस योजना के लिए आधारशिला रखने के लिए विधायी संशोधन वित्त अधिनियम 2017 के पारित होने के तुरंत बाद मई 2017 में ही इस अधिनियम पर अपनी चिंता व्यक्त कर दी थी।

आयोग ने यह कहा कि यदि योगदान की रिपोर्ट नहीं की जाती है तो यह पता लगाना संभव नहीं होगा कि राजनीतिक दलों ने सरकारी कंपनियों और विदेशी स्रोतों से चंदा तो नहीं लिया है जो कि जनप्रतिनिधि अधिनियम की धारा 29 बी के तहत निषिद्ध है।

2013 का अधिनियम शेल कंपनियों को देगा बढ़ावा
आयोग द्वारा कंपनी अधिनियम 2013 में किए गए संशोधनों पर भी सवाल उठाए गए। अधिनियम की धारा 182 में संशोधन ने यह प्रतिबंध हटा दिया कि योगदान केवल 3 पूर्ववर्ती वित्तीय वर्षों के शुद्ध औसत लाभ का 7.5% की सीमा तक ही किया जा सकता है। यहां तक ​​कि नई कंपनियों को भी चुनावी बॉन्ड के माध्यम से चंदा देने में सक्षम बनाया गया है। हलफनामे में कहा गया है कि इससे राजनीतिक दलों को चंदा देने के एकमात्र उद्देश्य के लिए शेल कंपनियों के स्थापित होने की संभावना है।

साथ ही धारा 182 (3) में संशोधन ने इस प्रावधान को समाप्त कर दिया कि कंपनियों को अपने लाभ और हानि खातों में अपने राजनीतिक योगदान की घोषणा करनी चाहिए। इसके अलावा यह कदम "पारदर्शिता से समझौता करेगा" और शेल कंपनियों के माध्यम से "राजनीतिक फंडिंग के लिए काले धन के बढ़ते उपयोग" को जन्म दे सकता है।

आयोग का सुझाव, केवल लाभदायक कंपनियां ही दे सकें राजनीतिक दान
आयोग ने मंत्रालय से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया था कि केवल साबित ट्रैक रिकॉर्ड वाली लाभदायक कंपनियों को ही राजनीतिक दान करने की अनुमति दी जाए। आयोग के निदेशक (कानून) विजय कुमार पांडे द्वारा पुष्टि किए गए जवाबी हलफनामे में यह कहा गया है कि चुनाव आयोग ने पत्र के माध्यम से मंत्रालय को सूचित किया था कि इन संशोधनों से राजनीतिक दलों के "राजनीतिक वित्त/वित्त पोषण के पारदर्शी पहलू पर गंभीर परिणाम/प्रभाव" होंगे।

आयोग ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन के खिलाफ भी सवाल उठाया है जिसमें भूतलक्षी प्रभाव वाली विदेशी कंपनियों से चंदा लेने की अनुमति दी गई है। चुनाव आयोग ने कहा है कि यह भारत में राजनीतिक दलों के अनियंत्रित विदेशी फंडिंग की अनुमति देगा जो भारतीय कंपनियों को विदेशी कंपनियों के जरिये प्रभावित कर सकता है।

चुनाव आयोग ने यह कहा है कि उसने आरपीए एक्ट में संशोधन का सुझाव दिया था कि 20 हज़ार रुपये की मौजूदा सीमा से कम नकद दान के लिए भी रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाया जाए अगर कुल नकद योगदान 20 करोड़ या कुल योगदान के 20 प्रतिशत से अधिक हो, जो भी कम हो।

उसने आगे यह भी सुझाव दिया कि राजनैतिक दलों के योगदान की रिपोर्ट आयोग की वेबसाइट में अपलोड की जानी चाहिए। आयोग ने यह भी सुझाव दिया था कि 2 हज़ार रुपये की वर्तमान सीमा के बजाय इससे ऊपर या उसके बराबर का अनाम योगदान भी निषिद्ध होना चाहिए।

ECI का ये रुख केंद्र सरकार के उन दावों से अलग है जिसमें सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में यह कहा गया कि चुनावी बॉन्ड की योजना राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त धन और दान में पारदर्शिता को बढ़ावा देती है।

राजनीतिक बॉन्ड के फीचर
2 जनवरी, 2018 को केंद्र ने चुनावी बॉन्ड के लिए योजना को अधिसूचित किया था जो कि एक भारतीय नागरिक या भारत में निगमित निकाय द्वारा खरीदे जा सकते हैं। ये बॉन्ड एक अधिकृत बैंक से ही खरीदे जा सकते हैं और राजनीतिक पार्टी को जारी किए जा सकते हैं। पार्टी 15 दिनों के भीतर प्राप्त बॉन्ड को भुना सकती है। दान दाता की पहचान केवल उसी बैंक को होगी जिसे गुमनाम रखा जाएगा।

केंद्र का कहना है कि "यह योजना वैध केवाईसी और ऑडिट ट्रेल के साथ बॉन्ड प्राप्त करने की एक पारदर्शी प्रणाली बनाने की परिकल्पना करती है। जो इन बॉन्डों को खरीदते हैं, वे बैलेंस शीट में किए गए ऐसे दान के बारे में बताएंगे। चुनावी बॉन्ड दानकर्ताओं को बैंकिंग मार्ग से दान करने के लिए प्रेरित करेगा।यह पारदर्शिता, जवाबदेही और चुनावी सुधार की दिशा में एक अहम कदम होगा।

योजना के बारे में बताते हुए केंद्र का कहना है कि ये बॉन्ड केवल भारतीय स्टेट बैंक से खरीदे जा सकते हैं क्योंकि इसमें खरीदार केवाईसी मानदंडों का अनुपालन करता है। बॉन्ड जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के महीनों के दौरान केवल 10 दिनों के लिए खरीद के लिए उपलब्ध होंगे। उन्हें 1 हज़ार रुपये, 10 हज़ार रुपये, 1 लाख रुपये, 10 लाख रुपये या 1 करोड़ रुपये के गुणकों में खरीदा जा सकता है। दान दाता का नाम बताया नहीं जाएगा। बॉन्ड जारी होने की तारीख से यह अगले 15 दिनों के लिए वैध होगा जिसके भीतर उसे भुगतानकर्ता-राजनीतिक पार्टी द्वारा भुनाना होगा।

बॉन्ड के अंकित मूल्य को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13 ए के तहत आयकर से छूट के उद्देश्य से योग्य राजनीतिक दल द्वारा प्राप्त स्वैच्छिक योगदान के माध्यम से आय के रूप में गिना जाएगा। केंद्र ने कहा है कि उक्त पार्टी को भारत निर्वाचन आयोग के समक्ष रिटर्न दाखिल करना होगा कि चुनावी बॉन्ड के माध्यम से उसे कितना पैसा प्राप्त हुआ है, जो जवाबदेही प्रदान करेगा। हलफनामे में कहा गया है कि निजता को सुरक्षित रखने के लिए पहचान गोपनीय रखी गई है।

आगे यह भी कहा गया कि बॉन्ड के खरीदार की पहचान को गुप्त रखना भी गुप्त मतदान में उसके मतदान के अधिकार का विस्तार है। पिछले अनुभव से पता चला है कि अगर दाताओं का खुलासा हो जाता है तो उन्हें ये योजना आकर्षक नहीं लगेगी और वो नकदी द्वारा दान करने के कम-वांछनीय विकल्प पर वापस चले जाएंगे।

केंद्र ने कहा है कि बॉन्ड खरीदार द्वारा दी गई जानकारी को अधिकृत बैंक द्वारा गोपनीय माना जाएगा और किसी के सामने प्रकट नहीं किया जाएगा। राज्य व व्यक्ति के हितों को संतुलित करने के लिए किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा आपराधिक मामले के पंजीकरण की मांग को छोड़कर, किसी भी अन्य उद्देश्य के लिए इसे गोपनीय ही रखा जाएगा।

चुनावी बॉन्ड की वैधता को दी गयी है चुनौती
दरअसल 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को चंदे के लिए जारी चुनावी बॉन्ड की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को अपना जवाब दाखिल करने को कहा था। यह हलफनामा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स व अन्य द्वारा दायर की गई याचिका पर दाखिल किया गया है।

इस मुद्दे पर दाखिल याचिकाओं में केंद्र सरकार द्वारा वित्त अधिनियम 2017, कंपनी अधिनियम, विदेशी अंशदान विनियम अधिनियम और आयकर अधिनियम के माध्यम से पेश संशोधनों को भी चुनौती दी गई है।

चुनौती के आधार
याचिकाकर्ता ने राजनीतिक दलों से नकद चंदे को स्वीकार करने पर रोक लगाने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की भी मांग की है। यहां तर्क दिया गया है कि नए संशोधन राज्य सभा की मंजूरी को दरकिनार करने का एक कुत्सित प्रयास है जो कानून-निर्माण के संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढांचे में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

इन संशोधनों का परिणाम यह है कि कॉरपोरेट राजनीतिक दलों को असीमित दान कर सकते हैं और उन्हें ऐसे चंदे का विवरण देने की भी आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा अब भारत के चुनाव आयोग को दी जाने वाली राजनीतिक दलों की वार्षिक रिपोर्ट में चुनावी बॉन्ड के माध्यम से योगदान करने वालों के नाम और पते का उल्लेख करने की भी जरूरत नहीं है। यह राजनीतिक दलों के अवैध और विदेशी धन के माध्यम से लोकतंत्र में भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर बड़ा प्रभाव डालता है।

याचिकाकर्ताओं ने ये भी कहा है कि इस बात की आशंका है कि अगर यह संशोधन रद्द नहीं किए गए तो इन कॉरपोरेट घरानों और अत्यंत धनी लॉबी के चलते चुनावी प्रक्रिया और शासन व्यवस्था में गड़बड़ी हो सकती है। इस तरह की गतिविधियों को अगर अनुमति दी जाती है तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है कि देश के आम नागरिकों की कीमत पर इन कॉरपोरेट्स और लॉबी समूहों के पक्ष में कानून लाए जा सकते हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि अब तक बेचे गए चुनावी बॉन्ड में से 95% एक ही राजनीतिक पार्टी के पक्ष में हैं जो कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2018 के बाद से खरीदे गए अधिकांश बॉन्ड 10 लाख और 1 करोड़ के मूल्यवर्ग के हैं और यह दर्शाता है कि आम नागरिक नहीं बल्कि कॉरपोरेट इन बॉन्ड की खरीद कर रहे हैं और वे इस योजना के तहत पूरी तरह से गोपनीयता का आनंद ले रहे हैं।

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