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सुप्रीम कोर्ट ने जमानत शर्तों का उल्लंघन करने पर झारखंड के पूर्व मंत्री की जमानत रद्द की, ट्रायल रांची ट्रांसफर

Live Law Hindi
4 April 2019 12:51 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत शर्तों का उल्लंघन करने पर झारखंड के पूर्व मंत्री की जमानत रद्द की, ट्रायल रांची ट्रांसफर
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दंगा और भीड़ को उकसाने के आरोपी झारखंड के पूर्व मंत्री योगेंद्र साव की मुश्किलें बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उनकी जमानत रद्द कर दी है।

जस्टिस एस. ए. बोबड़े, जस्टिस एस. अब्दुल नजीर और जस्टिस इंदिरा बैनर्जी की पीठ ने उनकी जमानत रद्द करते हुए कहा कि साव ने जमानत की उस शर्त का उल्लंघन किया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो भोपाल में रहेंगे और अदालती कार्रवाही में हिस्सा लेने के अलावा झारखंड नहीं जाएंगे। पीठ ने कहा कि वो अनधिकृत रूप से झारखंड में पाए गए इसलिए उनकी जमानत रद्द की जाती है।

इसके साथ ही पीठ ने योगेंद्र साव और उनकी विधायक पत्नी निर्मला देवी के ख़िलाफ़ चल रहे 18 मामलों के ट्रायल को हजारीबाग से रांची ट्रांसफर कर दिया है।

वर्ष 2017 में मिली थी सशर्त जमानत
दरअसल झारखंड के पूर्व मंत्री योगेंद्र साव और उनकी पत्नी कांग्रेस विधायक निर्मला देवी को दिसंबर, 2017 में सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत मिली थी। जस्टिस बोबड़े और जस्टिस एल. नागेश्वर राव की पीठ ने कहा था कि दोनों झारखंड से बाहर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहेंगे।

उनकी जमानत की यह भी शर्त थी कि वो गवाहों से किसी सूरत में संपर्क करने की कोशिश नहीं करेंगे और वो अपने पासपोर्ट भी जमा करेंगे। हालांकि कोर्ट ने कहा था कि वो कोर्ट कार्यवाही के लिए झारखंड जा सकते हैं।

झारखंड सरकार उनके ख़िलाफ़ पहुँची थी अदालत
लेकिन झारखंड सरकार पिछले वर्ष इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी और कहा था कि साव सुप्रीम कोर्ट के जमानत को लेकर दिए गए आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं। पिछले साल अगस्त तक वो 255 दिनों में सिर्फ 25 दिन ही भोपाल में रहे।

इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने साव को नोटिस जारी कर उनकी ओर से जवाब मांगा था। हालांकि साव की ओर से वरिष्ठ वकील के. टी. एस. तुलसी ने झारखंड सरकार के आरोपों को बेबुनियाद बताया। लेकिन पीठ ने कहा कि साव ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है इसलिए उनकी जमानत याचिका रद्द की जाती है।

दरअसल योगेंद्र और निर्मला देवी पर हजारीबाग जिला के बड़कागांव में NTPC के प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध करने, सरकारी काम में बाधा पहुंचाने और भीड़ को उकसाने का आरोप है।

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