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मायावती ने स्मारक में अपनी मूर्तियों और हाथी प्रतीकों को सुप्रीम कोर्ट में सही ठहराया, कहा ये जनता की इच्छा

Live Law Hindi
2 April 2019 3:57 PM GMT
मायावती ने स्मारक में अपनी मूर्तियों और हाथी प्रतीकों को सुप्रीम कोर्ट में सही ठहराया, कहा ये जनता की इच्छा
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बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश के कई शहरों में उनकी प्रतिमाओं की स्थापना को सही ठहराया है और कहा है कि ये मूर्तियां "लोगों की इच्छा" का प्रतिनिधित्व करती हैं।

मायावती ने भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा की गई उस टिप्पणी के जवाब में अपना यह हलफनामा दायर किया है कि उन्हें खुद की प्रतिमाओं और बसपा के पार्टी चिन्ह हाथियों की मूर्तियों की स्थापना पर खर्च किए गए सार्वजनिक धन को वापस करना चाहिए।

प्रतिमा करती है उनके अथक परिश्रम को सम्मानित
मायावती ने अपने हलफनामे में कहा कि जब वह मुख्यमंत्री थीं, तब राज्य की विधायिका ने उनकी प्रतिमाओं को स्थापित करवाकर दलितों के कल्याण के लिए उनके अथक परिश्रम के लिए उनका सम्मान किया।

"लोगों की इच्छा को राज्य विधायिका द्वारा समकालीन महिला दलित नेता के सम्मान में प्रतिवादी उत्तरदाता की प्रतिमाओं को स्थापित करने के प्रस्ताव के साथ व्यक्त किया गया था, जिन्होंने वंचित समुदाय के भले के लिए अपने जीवन का बलिदान करने का फैसला किया है," हलफनामे में मायावती द्वारा कहा गया।

प्रतिमा पर बहस केवल विधानमंडल में हो
उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने खुद फैसला सुनाया है कि राज्य विधानमंडल द्वारा अनुमोदित व्यय बेवजह हो सकता है लेकिन इसे अदालतों द्वारा स्थगित नहीं किया जा सकता और इस पर केवल विधानमंडल में ही बहस होनी चाहिए। उन्होंने अदालत से मूर्तियों के मुद्दे पर फैसला नहीं करने का आग्रह भी किया।

हाथी की मूर्ति का पार्टी प्रतीक से लेना देना नहीं
उन्होंने कहा कि स्मारक में हाथी की मूर्तियों के निर्माण का उनकी पार्टी के प्रतीक से कोई लेना-देना नहीं है और यह एक मात्र संयोग है। बीएसपी के प्रतीक के साथ स्मारक पर स्थापित हाथियों की मूर्तियों का संबंध बताना गलत और भ्रामक है। स्वागत मुद्रा में खड़े हाथी भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा हैं और हाथियों और पार्टी के प्रतीक के बीच कोई समानांतर नहीं खींचा जा सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि हाथी की मूर्तियाँ राष्ट्रपति भवन, मंदिरों को सुशोभित करती हैं और उन्हें भारतीय पौराणिक कथाओं में एक स्वागत योग्य प्रतीक के तौर पर माना जाता है।

उन्होंने कहा, "निश्चित रूप से मैं कांशी राम की प्रतिमा के पास अपनी मूर्तियों को स्थापित करने में राज्य के विधायकों की इच्छा के विपरीत नहीं जा सकती थी, जिनके लिए देश ने मरणोपरांत भारत रत्न देने की भी मांग उठाई है।"

मूर्तियों पर जनहित याचिका है राजनीति से प्रेरित
प्रतिमाओं की स्थापना पर जनहित याचिका के जरिये उठाये गए सवाल पर उन्होंने कहा कि यह राजनीति से प्रेरित याचिका है और याचिका दलित महिला नेता को दिखाए जाने वाले सम्मान के खिलाफ असहमति का परिणाम है। उन्होंने बताया कि एक बजटीय आवंटन किया गया था और स्मारकों और मूर्तियों के निर्माण के लिए एक विनियोग अधिनियम पारित किया गया था।

अन्य दलों और उनके नेताओं का दिया उदाहरण
मायावती के हलफनामे के अनुसार इन स्मारकों ने लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत के रूप में कार्य किया है। मायावती ने जनता के पैसे की कीमत पर अपने नेताओं की मूर्तियों को खड़ा करने में कांग्रेस, भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों द्वारा किए गए समान अभ्यास का भी हवाला दिया।

उन्होंने इंदिरा और राजीव गांधी की प्रतिमाओं, गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमाओं, अविभाजित आंध्र प्रदेश में वाई. एस. राजशेखर रेड्डी, अयोध्या में भगवान राम की मूर्तियों को स्थापित करने के प्रस्तावों के अलावा लखनऊ में लोक भवन में अटल बिहारी वाजपेयी की मूर्ति स्थापित करने का उदाहरण दिया।

सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिपण्णी से बढ़ी थी मुश्किल


8 फरवरी को बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती के लिए मुश्किलें बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह मौखिक टिप्पणी की थी कि उन्हें सार्वजनिक जगहों पर सरकारी खर्च से लगाई गईं हाथियों की प्रतिमा पर खर्च रुपयों को वापस करना चाहिए।

भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने मायावती के वकील राकेश खन्ना से कहा था, "मैडम मायावती, हमारा प्रारंभिक विचार ये है कि हाथियों की प्रतिमाओं पर खर्च जनता के पैसे का भुगतान आप अपनी जेब से करें।" पीठ ने बसपा की ओर से पेश सतीश मिश्रा के उस अनुरोध को खारिज कर दिया था कि मामले की सुनवाई मई के लिए टाल दी जाए।

वकील रविकांत द्वारा दायर की गई है यह याचिका
दरअसल अदालत वकील रविकांत द्वारा नोएडा में एक पार्क सहित सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियों को स्थापित करने के लिए करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

वर्ष 2009 में दायर की गई इस जनहित याचिका में मायावती को सरकारी खजाने की कीमत पर सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमाएं स्थापित करने से रोकने की मांग की गई थी और इस मामले की सीबीआई जांच की मांग भी की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि जनता के सैकड़ों करोड़ रुपये मुख्यमंत्री की झूठी गरिमा दिेखाने के लिए खर्च किए गए थे।

इस गतिविधि को राज्य की नीति के रूप में किया जा गया जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना और उक्त अनुच्छेद का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि सार्वजनिक स्थानों पर हाथी यानी बसपा के पार्टी चिन्ह 52.20 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित किए गए थे।

राज्य के धन का उपयोग करके ऐसा किया गया। याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार को सार्वजनिक भूमि से मायावती और उनकी पार्टी के प्रतीक की मूर्तियों को हटाने का निर्देश दिया जाए।

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