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सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक आयोग को तीन महीने में ' अल्पसंख्यक' की परिभाषा वाले प्रतिनिधित्व पर फैसला करने को कहा

Live Law Hindi
11 Feb 2019 12:33 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक आयोग को तीन महीने में  अल्पसंख्यक की परिभाषा वाले प्रतिनिधित्व पर फैसला करने को कहा
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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) को किसी समुदाय की राज्य-वार जनसंख्या के संदर्भ में 'अल्पसंख्यक' शब्द को परिभाषित करने के लिए दिशानिर्देशों की मांग करने वाले एक प्रतिनिधित्व पर 3 महीने के भीतर एक फैसला लेने का निर्देश दिया है।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने सोमवार को भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय को अल्पसंख्यक पैनल में अपना प्रतिनिधित्व फिर से दाखिल करने के लिए कहा है। पीठ ने कहा कि पैनल सोमवार से 3 महीने के भीतर इस पर फैसला लेगा।

दरअसल उपाध्याय ने वर्ष 2017 में याचिका दाखिल कर 23 अक्तूबर 1993 को जारी अधिसूचना को मनमाना, अनुचित और संविधान के खिलाफ बताया था। हालांकि बाद में उन्होंने इस याचिका को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से संपर्क करने की स्वतंत्रता के साथ वापस ले लिया और फिर 17.11.2017 को एक प्रतिनिधत्व आयोग को सौंपा।

उनके अनुसार NCM ने पिछले 15 महीनों में कुछ कार्य नहीं किया इसलिए उन्होंने एनसीएम अधिनियम, 1992 की धारा 2 (सी) और 23.10.1993 की अधिसूचना को रद्द करने के लिए ये यह रिट याचिका दाखिल की है। याचिका में इसे मनमाना, अनुचित, अपमानजनक होने के साथ साथ भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के खिलाफ होने की वजह से शून्य और असंवैधानिक बताया है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि जो लोग संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत अल्पसंख्यक सुरक्षा के हकदार नहीं हैं, वो संविधान के अनुच्छेद 15 (5) और (6) के तहत छूट, शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधान और सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रम का लाभ उठा रहे हैं। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का स्पष्ट उल्लंघन है।

याचिका में कहा गया है कि वास्तविक अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक अधिकारों से वंचित करना और बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक लाभ प्रदान करना और धर्म, जाति, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव होना, मनमाना और अनुचित होने के अलावा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

याचिका में सरकार को "अल्पसंख्यकों" को परिभाषित करने और उनकी पहचान के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग भी की गई है। अर्जी में ये भी कहा गया है कि जो धार्मिक या अन्य समूह सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक रूप से उक्त राज्य में जनसंख्या का 1 फीसदी तक ही हैं, उन्हें ही इसका लाभ दिया जा सकता है।

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