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नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के ख़िलाफ़ चुनौतियां : बुनियादी बहसों से आगे की बात

Gautam Bhatia
25 Jan 2020 4:15 AM GMT
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के ख़िलाफ़ चुनौतियां : बुनियादी बहसों से आगे की बात
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अभी तक नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के ख़िलाफ़ बहस इन दलीलों के इर्द गिर्द रही है :

(a) क्या सिर्फ़ कुछ चुनिंदा आप्रवासियों को नागरिकता देना और जिन व्यक्तियों और समूहों को बाहर रखा गया है उसकी वजह से यह अनुच्छेद 14 के तहत "वाजिब वर्गीकरण" के सिद्धांत का उल्लंघन करता है या नहीं?;

(b) क्या किसी समूह को चुनना "निर्धारण के सिद्धांत"को नज़रंदाज़ करता है, और इस वजह से क्या यह असंवैधानिक रूप से मनमाना है?; और

(c) नागरिकता के दावे के लिए धार्मिक उत्पीड़न को अन्य किसी भी तरह के उत्पीड़न पर वरीयता देने से क्या सीएए "धर्मिरपेक्षता" की मौलिक विशेषता का उल्लंघन करता है?

मैं इस आलेख में इन आधारभूत दलीलों से ज़रा आगे जाने की कोशिश कर रहा हूं, जिन पर सार्वजनिक दायरे में बहस अब लगभग बंद हो चुकी है। वाजिब वर्गीकरण, मनमानी, और धर्मनिरपेक्षता के आगे, मैं कहूंगा कि सीएए को असंवैधानिक माने जाने के दूसरे भी बड़े कारण हैं।

इन कारणों की पड़ताल के लिए हमें संवैधानिक क़ानूनों के बारे में अपनी पूर्व धारणा पर पुनर्विचार करना होगा, लेकिन ये दलील रैडिकल नहीं हैं और न ही नए हैं बल्कि संवैधानिक चलन का हिस्सा हैं।

सर्वप्रथम, मेरे विचार में, भारतीय संविधान के तहत समानता का सिद्धांत वर्गीकरण और मनमानेपन की जांच से आगे निकल चुका है (जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं)।

दूसरा, यह कि हमारे क़ानूनी संस्कृति में व्याप्त इस व्यापक धारणा के विपरीत, न्यायिक सम्मान के बदले नागरिकता क़ानून की न्यायिक पड़ताल होनी चाहिए और तीसरा, संविधान के अनुच्छेद 11 की भाषा चाहे जो हो, नागरिकता देने और लेने के बारे में संसद के अधिकार सीमित हैं - उसकी यह सीमा उतने ही महत्त्वपूर्ण और मौलिक संवैधानिक सिद्धांतों से आता है।

समानता का विकसित होता विचार

अमेरिकी न्यायविधान से प्रभावित होकर भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1950 के दशक में अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार की गारंटी के उल्लंघन के निर्धारण के लिए "वर्गीकरण जांच" को अपनाया। इस "वर्गीकरण जांच" के तहत, जैसा कि सब जानते हैं, यह ज़रूरी है कि पास हुआ क़ानून अनुच्छेद 14 के तहत जांच पर खड़ा उतरे। इसके लिए आवश्यक है कि (a) उस व्यक्ति या समूह, जिसके साथ भेदभाव हो रहा है, के बीच व्यवहार में भेदभाव और (b) इन अंतरों और क़ानून बनाने के राज्य के उद्देश्य के बीच तर्कसंगत मिलीभगत हो। शुरू से ही, सुप्रीम कोर्ट में इस दृष्टिकोण के बारे में असहमति की परंपरा रही है जिसने इसे औपचारिक और बाधित बताया।

उदाहरण के लिए अनवर अली सरकार मामले में विवीयन बोस जे ने पूछा "हमने ख़ुद को जिस तरह का लोकतंत्र घोषित किया है" उसमें "व्यापक समानता का व्यवहार" का क्या अर्थ हो सकता है। जैसा कि बोस जे ने उस समय समझा, समानता को लोकतंत्र और गणतंत्रवाद के ज़्यादा मौलिक विचारों से अलग नहीं किया जा सकता।

आने वाले वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्गीकरण के ढांचे की सीमा से बाहर आने की कई कोशिशें की। उदाहरण के लिए, उसने "मनमानेपन" के मानदंड का विकास किया जिसे अब जाकर मूर्त रूप दिया जा रहा है और जो नरीमन जे के हाल के कुछ फ़ैसलों में दिखाई पड़ता है। इसने या भी कहा कि राज्य के "उद्देश्य" का "वैध" होना ज़रूरी है - जैसे उसने इस वर्गीकरण जांच में एक तीसरा ज़्यादा व्यापक वर्ग जोड़ा। पर इस बारे में वास्तविक सफलता 2018 में नवतेज जौहर और जोसेफ़ शाइन के मामले में आए फ़ैसलों से मिले।

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 और 499 को हटाकर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठों ने समानता के एक बहुत ही व्यापक दृष्टि को आगे बढ़ाया और जो सर्वोत्तम वैश्विक सोच के अनुरूप था। संक्षेप में, सुप्रीम कोर्ट ने "तार्किक वर्गीकरण" से अपना ध्यान हटाकर अब "हानि" के विचार पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। सच्ची समानता से मतलब है हानि की पहचान करना, हानि की कुल्हारियों का पता लगाना और तब जाकर इसका निदान ढूंढने पर काम करना है।

हानि को जानना और उसकी पहचान के लिए क़ानून को मुख़्तारी की ज़रूरत होती है। यहीं पर न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा के विचार महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। हानि की पहचान के संक्षिप्त तरीक़े के रूप में दुनिया भर की संवैधानिक अदालतों ने पूछा है कि क्या क़ानून बनाने में लोगों को उनके "निजी विशेषताओं" के कारण छोड़ दिया जाता है कि उनका (a) उन पर कोई नियंत्रण नहीं है, (b) उनमें बदलाव नहीं आ सकता या फिर उनमें बदलाव के लिए भारी निजी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।

उदाहरण के लिए "नृवंश" के विचार को लीजिए : कोई व्यक्ति किस नृवंश में जन्म लेता है इसका चुनाव वह ख़ुद नहीं कर सकता, और जैसा कि स्वाभाविक है, अपना नृवंश किसी सार्थक रूप में बदल नहीं सकता। ऐसा क़ानून जो लोगों को नृवंश के आधार पर भेदभाव के लिए चुनाव से बाहर कर देता है, अनुमानित रूप में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है (बशर्ते कि सकारात्मक कार्य योजनाओं के द्वारा इसमें नृवंशीय हानि के उपचार की व्यवस्था की गई है)।

समानता और समान व्यवहार की यह वो व्यापक दृष्टि है जो सीधे-सीधे यह बताता है कि सीएए असंवैधानिक है। सीएए के तहत सभी तीन "शर्तें" - पैदाइश का देश, धर्म और भारत में प्रवेश की तिथि - ये सब प्रभावी रूप से ऐसे हैं जिन पर ऐसे किसी व्यक्ति का ख़ुद का कोई नियंत्रण नहीं है जिसको क़ानून अपना निशाना बनाता है।

कोई व्यक्ति इस बात का चुनाव नहीं कर सकता कि वह किस देश में जन्म लेता है, किस धार्मिक समुदाय में उसका जन्म होता है और कब उसके ख़िलाफ़ धार्मिक उत्पीड़न उसे भारत जाने कि लिए बाध्य करता है। पर सीएए भारत में रह रहे प्रवासियों की श्रेणियों का चुनाव करता है और उनका इन तीन आधारों पर वर्गीकरण करता है। यही वजह है कि यह समानता के मौलिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

नागरिकता क़ानून और समीक्षा का स्तर

सीएए के समर्थकों की एक आम दलील यह रही है कि नागरिकता और प्रवासन संप्रभु देश के अधिकारक्षेत्र में आने वाले मुद्दे हैं और इस बारे में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा काफ़ी सीमित है। यह दलील दी जाती है कि नागरिकता किसको और कैसे दी जाती है इस बारे में सारी बातें अदालत को अवश्य ही सरकार पर छोड़ देनी चाहिए। पिछले वर्षों में इस दलील को इतनी बार इतना जल्दी-जल्दी दुहराया गया है कि यह दलील अब नहीं डिगने वाले पहाड़ की तरह हो गई है। पर आप अगर इस पर ग़ौर करें तो आपको लगेगा कि यह पहाड़ वास्तव में तिनकों से बना है।

अब हम मूल बात की ओर लौटें। एक लोकतांत्रिक समाज में न्यायिक समीक्षा का भला क्या औचित्य हो सकता है? लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई विधायिका जिस क़ानून को पास करती है उसको अनिर्वाचित प्रतिनिधियों वाली अदालत द्वारा ख़ारिज कर देने का औचित्य क्या है? इसका उत्तर यह है कि अदालत की प्राथमिक भूमिका एक बहुलता-विरोधी संस्था के रूप में है।

इसका अस्तित्व बहुसंख्यावाद की ज़्यादतियों पर अंकुश लगाना है जो इस समझ पर आधारित है कि सच्चा लोकतंत्र का मतलब बहुमत के कठोर शासन से ज़्यादा और बहुत कुछ है। इस वजह से, प्रसिद्ध कैरोलिनी प्रॉडक्ट्स के फ़ुट्नोट मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत की भूमिका उन मामलों में ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाती है जिनमें "अलग-थलग और घिरे हुए अल्पसंख्यक" शामिल हैं।

क्यों? क्योंकि ये ऐसे अल्पसंख्यक हैं जिन्हें (बहुसंख्यावादी) लोकतांत्रिक प्रशासन में सामान्य माध्यमों से अपने हितों की बात करने में सबसे ज़्यादा मुश्किल होती है। आवश्यक रूप से, अदालत का काम ऐसे लोगों को राहत पहुँचाना है जिनको राजनीतिक प्रक्रिया औपचारिक और प्रभावी रूप से समान भागीदारी से बाहर कर दिया है। इस तरह, उदाहरण के लिए, अगर ऐसा कोई देश है जहाँ समलैंगिक संबंधों को जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग बहुत बड़ा कलंक मानता है, इतना तक कि एलजीबीटीक्यू और अन्य समुदाय को राजनीतिक सत्ता तक उनकी पहुँच से स्थाई रूप से बाहर कर दिया जाता है और कोई भी उनसे किसी तरह का सरोकार नहीं रख सकता है - उस स्थिति में इस समुदाय को लक्ष्य करनेवाले क़ानून की गहन पड़ताल करना अदालत कि लिए उचित था।

यह स्पष्ट है कि प्रवासी या शरणार्थी, जैसा भी मामला हो, पूरी तरह से इस श्रेणी में आते हैं। चूँकि वे मतदान में हिस्सा नहीं ले सकते, वे राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर कर दिए जाते हैं। देश में समस्याग्रस्त या हाशिए के किसी भी अन्य समूह की तुलना में, उनको प्रभावित करनेवाले क़ानून और नीतियों में उनका ही कोई दख़ल नहीं होता।इस वजह से, ऐसे क़ानून जो नारिकता कि स्थिति को प्रभावित करता है, जैसा कि सीएए करता है, तो इस देश के शीर्ष अदालत को उसकी समीक्षा अवश्य ही करनी चाहिए न कि निचली अदालत को।

संवैधानिक सिद्धांतों को सुसंगत बनाना : संप्रभु सत्ता और प्रवेश की शर्तें

संवैधानिक लोकतंत्र में, कोई भी अधिकार असीम नहीं होता। संवैधानिक अथॉरिटीज की स्थापना संविधान करता है और उनका अस्तित्व संविधान की वजह से होता है और उनके अधिकारों की धारा संविधान से ही प्रवाहित होती है। कुछ मामलों में, उनके ये अधिकार सीधे तौर पर सीमित हैं। उदाहरण के लिए, संविधान का अनुच्छेद 13 क़ानून बनाने के संसद के अधिकार को मौलिक अधिकार के अध्याय से जोड़कर उसे सीधे तौर पर सीमित कर देता है।

संविधान का अनुच्छेद 11 :

यह नागरिकता से संबद्ध है - पर इस में इस तरह कि किसी प्रत्यक्ष प्रतिबंध की बात नहीं की गई है। यह संसद को यह अधिकार देता है कि वह 'क़ानून द्वारा नागरिकता का विनियमन' करे और यह संसद को नागरिकता देने और लेने और नागरिकता के बारे में "अन्य सभी मामले" से संबंधित "कोई" प्रावधान बनाने का अधिकार देता है। टिप्पणीकारों ने इन प्रावधानों की चर्चा करते हुए यह तक कह दिया है कि नागरिकता के मामले में संसद को (मौलिक अधिकारोंके अध्याय के अलावा) असीमित अधिकार प्राप्त है।

पर यह दलील जिस बात को नज़रंदाज़ करती है वह है प्रत्यक्ष प्रतिबंध एकमात्र तरीक़ा नहीं है, जिसके द्वारा संवैधानिक अथॉरिटीज़ पर पाबंदियां लगी हैं। जैसा कि केशवानंद भारती मामले में कहा गया, अंतर्निहित पाबंदियां भी हैं जिनके स्रोत संविधान की संरचना हैं।

हम इस अंतर्निहित सीमाओं को कब और कैसे समझ पाते हैं? इस आलेख के उद्देश्य से इसका एक संक्षिप्त उत्तर ही पर्याप्त होगा। संविधान के तहत "x" कार्य करने का अधिकार ऐसे बिंदु पर सीमित है जिस बिंदु पर "x" कार्य करने से संविधान की नज़र में समान रूप से महत्त्वपूर्ण किसी सिद्धांत को निष्फल या नष्ट करता है।

इस सिद्धांत को यूके के सुप्रीम कोर्ट में मिलर बनाम प्रधानमंत्री मामले में दुहराया गया कि संसद के सत्र को समय से पूर्व समाप्त कर देने का ब्रिटिश प्रधानमंत्री का अधिकार प्रतिनिधित्व पर आधारित लोकतंत्र के संवैधानिक सिद्धांत से सीमित कर दिए गए हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, महत्त्वपूर्ण क़ानूनों की पड़ताल और उस पर बहस का अधिकार संसद को प्राप्त है। यह पाया गया कि ब्रेक्सिट की समय सीमा से ठीक पहले प्रधानमंत्री का संसद का सत्रावसान कर देने का मतलब यह था कि संसद को ईयू से वापसी के विधेयक पर बहस का पर्याप्त समय देने से इंकार कर दिया गया और इसलिए यह असंवैधानिक था।

वर्तमान मामले में अंतर्निहित सीमा क्या है? इसका उत्तर है धर्मनिरपेक्षता का संवैधानिक सिद्धांत। धर्मनिरपेक्षता - जैसा कि केशवानंद भारती मामले में कहा गया है, भारतीय संविधान की एक मौलिक विशेषता है (इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान इसको संविधान की प्रस्तावना में शामिल किए जाने से स्वतंत्र)।

भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष बने रहने की प्रतिबद्धता हमसे लेता है। इस स्थिति में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या नागरिकता द्वारा निर्धारित हुकूमत में शामिल होने की शर्त ऐसा होना चाहिए कि वह हूकूमत के चरित्र को ही निष्फल कर दे। जैसा कि ज़ाहिर है इसका उत्तर है नहीं। दूसरे शब्दों में, अनुच्छेद 11 के तहत नागरिकता देने और वापस लेने के अधिकार पर अंतर्निहित पाबंदी है और जो संसद को ऐसा क़ानून पास करने की इजाज़त नहीं देता जो हुकूमत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को नकार सकता है जैसा कि इस मामले में पिछले दरवाज़े से ऐसी स्थिति पैदा की गई है कि धार्मिक दावों को नागरिकता का निर्धारक बना दिया गया है।

अगर इसे एक वाक्य में कहें : धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत नागरिकता पर क़ानून बनाने के संसद के अधिकार पर अंतर्निहित पाबंदी लगाता है। संसद किस स्थिति में नारिकता दे सकता है इसका उल्लेख को तो वह कर सकता है पर अगर इस तरह की स्थिति धर्मनिपेक्ष हुकूमत के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता को निष्फल करता है तो वह ऐसा नहीं कर सकता।

निष्कर्ष

"वाजिब वर्गीकरण", "तर्कसंगत मिलीभगत" और "संप्रभु सत्ता" पर हो रही बासी बहस हमें इससे आगे नहीं ले जा सकते। फिर, ये वैचारिक जेल की तरह काम करता है जो हमें समानता के विचार के बारे में और गहरा सोचने से रोकता है। समानता का विचार समानता और लोकतंत्र के बीच सेतु की तरह है और यह संविधान की मांग के अनुरूप है।

हाल के वर्षों में, भारतीय संवैधानिक न्यायविधान ख़ुद को उस वैचारिक जेल से आज़ाद करने की कोशिश करता दीख रहा है और समानता और लोकतंत्र को लेकर कई अहम फ़ैसले किए हैं। सीएए ने सुप्रीम कोर्ट के सामने जो चुनौती उपस्थित की है वह सुप्रीम कोर्ट को अपने न्यायविधान को और ज़्यादा विकसित होने और खुलने का मौक़ा देता है।

गौतम भाटिया दिल्ली स्थित वक़ील हैं। यह आलेख सबसे पहले Indian Constitutional Law and Philosophy ब्लॉग में प्रकाशित हुआ। आप मूल आलेख यहाँ पढ़ सकते हैं।

[डिस्क्लेमर: लेखक सीएए की संवैधानिकता के ख़िलाफ़ दायर दो याचिकाओं से संबद्ध हैं]

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