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26 जनवरी - गण के अधिकारों से कर्तव्यों तक

अभिनव चौहान
26 Jan 2020 4:13 PM GMT
26 जनवरी - गण के अधिकारों से कर्तव्यों तक

किसी देश का संविधान उसके नागरिकों का गौरव होता है। आप कल्पना करें यदि किसी राष्ट्र का संविधान न हो तो वहां का शासन कितना उच्छृंखल हो सकता है। जब हम भारतीय संविधान की बात करते हैं तो हम केवल वर्तमान संविधान का जिक्र नहीं कर रहे होते बल्कि भारतीय परम्पराओं, उसकी आस्था और व्यवस्थाओं तक की चर्चा करते हैं।

संविधान किसी देश का सर्वोच्च विधान या संहिता है। इन दोनों शब्दों को यदि समझ लें तो संविधान को समझना कठिन न होगा। संस्कृत शब्द विधि से विधान बना है, विधि यानी कानून। कुछ नियम जिनके दायरों में रहकर हमें किसी क्षेत्र विशेष या भौगोलिक सीमाओं में बंधे राष्ट्र में जीना है। यह विधि ही विधान है।

सम, यानी समान या संस्कृत के सम् को मानें तो संस्कारित, ऐसा अर्थ निकलता है। जब इस सम् शब्द को विधान के साथ प्रयोग करते हैं तो वह संविधान हो जाता है। यानी ऐसी विधि जो संस्कारित हो और सभी के लिए समान हो। यही स्थिति संहिता शब्द की भी है। इस शब्द में ही हित छिपा है। जो सभी के लिए समान हितों की बात करे, जिसके संस्कारित रूप से सबका हित होता हो वह संहिता है। संहिता को ही अंग्रेजी में कोड कहते हैं।

अर्थ के आधार पर ये तो स्पष्ट है की संविधान या संहिता नागरिकों और राष्ट्र के हित की बात करता है। भारत के संविधान को बनाते समय संविधान सभा के सदस्यों ने ब्रिटिशों की ओर से लगाए गए अनुबंधों का ध्यान रखा है। उन्होंने अधिकांश तौर पर भारतीय परिषद अधिनियम 1919, भारत सरकार अधिनियम 1935, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 को ही आधार बनाया है। लेकिन इसके विपरीत भारत की सदियों पुरानी परम्परा, आस्थाओं, रीतियों को भी ध्यान में रखा है।

आप संविधान की मूल प्रति को देखें। उसकी प्रस्तावना के मुख्य पृष्ठ पर किसी व्यक्ति, ईश्वर के प्रतिरूप का चित्र नहीं है। बल्कि पुष्प हैं, चारों कोनों पर बैल, घोडा, शेर, हाथी का चित्र है। बीच में कमल बना है। मानों सन्देश दे रहा हो कि सरकार और नागरिकों का पहला कर्तव्य देश की प्रकृति, वन सम्पदा और पशु सम्पदा का संरक्षण और संवर्द्धन करना है। इससे आप आगे बढ़ें तो पाएंगे की संघ का परिचय जहां से प्रारम्भ होता है उस भाग के प्रारम्भ पर तथागत बुद्ध का चित्र है।

यहीं से राष्टपति के कर्तव्यों का प्रारम्भ भी है। लगता है जैसे आचार्य नंदलाल बोस ने राष्ट्रपति को यह बताने का प्रयास किया हो की देश के लिए हर निर्णय तथागत होकर लेना है। समाधिस्त रूप में, बिना किसी पक्षपात के। इससे आगे बढ़ें तो पाएंगे की राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अध्याय के प्रारम्भ पर भगवान कृष्ण का चित्र है। ये चित्र भी कुरुक्षेत्र का है। राज्य एक कुरुक्षेत्र ही है और नीतियों के बिना इसका सञ्चालन असंभव है। यहां आचार्य बोस ने शायद यह समझाया है कि राज्य को अपना, पराया, ऊंच, नीच सब भूलकर धर्मयुक्त (धर्म जो धारण करने योग्य हो) और निष्पक्ष भाव से नीतियों को बनाना है। इसके बाद मौलिक अधिकारों के अध्याय पर राम, सीता और लक्ष्मण का पंचवटी का प्रतिरूप बनाया गया है। सभी जानते हैं कि अपने और दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ने में भगवान राम से बड़ा उदहारण कोई दूसरा नहीं है। लेकिन अधिकारों को पाने में मर्यादापुरुषोत्तम कभी धर्म पथ से विमुख नहीं हुए। शायद यही सन्देश देने का प्रयास यहां आचार्य बोस ने दिया है। प्रत्येक नागरिक अपने और दूसरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करे लेकिन मर्यादा में रहकर।

एक और उदहारण देखें, संपत्ति, संविदाएं, अधिकार, दायित्व और वाद के अध्याय पर शिव के नटराज रूप की प्रतिकृति है। शिव ने माता सती के वियोग में तांडव किया था। नटराज रूप उसी समय का है। शिव का अर्थ है कल्याण। सम्पत्ति से ही सभी का कल्याण है। उसके वाद को लेकर कोई कभी भी तांडव कर सकता है। नागरिकता के अध्याय पर एक गांव का चित्र बनाया गया है। जो असली भारत को परिलक्षित करता है।

मुझे लगता है कि इतनी दूरदर्शिता से बने संविधान की व्याख्या हर कोई अपनी तरह से कर सकता है। मैंने इन चित्रों में यही सन्देश निकाला। कोई ये भी कह सकता है कि यह साम्प्रदायिक भाव को झलकाती है, तो बता दूं कि इसमें ह्वेनश्वांग, शाहजहां, टीपू सुलतान, महाराणा प्रताप, अजंता एलोरा के प्रतिरूप भी बने हैं। आज पूरे दिन गणतंत्र का जश्न देखने, शाहीन बाग़ की तस्वीर देखने, फेसबुक पर तमाम समर्थन-विरोध के पोस्ट, अधिकारों की बात और अभिव्यक्ति की आज़ादी का शोर सुनने के बाद सोच रहा हूं, क्या कभी हम कर्तव्यों की बात करेंगे?

हर नागरिक के लिए पहली प्राथमिकता अधिकार हैं। इसलिए संविधान निर्माताओं ने मौलिक अधिकारों का अध्याय पहले रखा है। लेकिन हम क्यों भूल जाते हैं कि इसी संविधान में मूल कर्तव्यों का भी एक अनुच्छेद है। अनुच्छेद 51ए में वर्णित बातों को केवल राज्य ही नहीं पूरा करेगा बल्कि हर नागरिक उनके प्रति उत्तरदायी है। इसी संविधान में समान नागरिक संहिता की बात भी अनुछेद 44 करता है। राज्य जब तक इस समान नागरिक संहिता के लिए प्रस्ताव लाता है, तब तक देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह किसी को बड़ा, छोटा, अस्पृश्य न समझे।

ये देश आपका है। 364 दिनों तक हम अधिकारों की बात करते हैं। एक दिन कर्तव्यों को दें। गीतकार कुंवर बेचैन के गीत की एक पंक्ति है - जिसने मरना सीखा उसको ही जीने का अधिकार मिला। यानी साफ़ है हर जीवन मृत्यु के आचरण का प्रतिफल है। हर अधिकार कर्तव्यों के निर्वहन की स्वीकृति है। हम गणतंत्र की आस्था को और मज़बूत करें। अपने अधिकारों के लिए लड़ें, मरें, लेकिन कर्तव्यों को प्राथमिकता दें।

लेखक अमर उजाला में उप संपादक हैं. IBEI की और से 17वें ग्लोबल पीस अवार्ड से सम्मानित हैं. इंटरनेशनल बुद्धा एजुकेशन इंस्टिट्यूट में निदेशक हैं.लेखक के विचार व्यक्तिगत है

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