समझिये IPC की धारा 85 एवं 86 के अंतर्गत Intoxication (मत्तता) का बचाव क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 4]

समझिये IPC की धारा 85 एवं 86 के अंतर्गत Intoxication (मत्तता) का बचाव क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? [

पिछले लेख में हमने समझा कि क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में विकृत-चित्त व्यक्ति का कार्य (धारा 84), किसी भी अपराध के लिए कब अपवाद बन सकता है। इस धारा के अंतर्गत हमने विभिन्न वादों की मदद से यह समझा कि अभियुक्त के इरादे और इच्छाशक्ति की अनुपस्थिति उसे आपराधिक दायित्व से छूट देती है। लेकिन यह अनुपस्थिति महज़ मानसिक विकार, या सामान्य आचरण से विचलन, या किसी भी प्रकार का विचलन नहीं है, जो आपराधिक दायित्व से प्रतिरक्षा को प्रभावित करता है।

इस श्रृंखला के भाग 1 में हमने भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत 'साधारण अपवाद' (General Exceptions) क्या हैं, यह समझा और यह जाना कि कैसे यह अध्याय ऐसे कुछ अपवाद प्रदान करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का आपराधिक दायित्व खत्म हो जाता है। इसी भाग में हम भारतीय दंड संहिता की धारा 76 और 79 के अंतर्गत 'तथ्य की भूल' को भी समझ चुके हैं। मौजूदा लेख में हम क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत धारा 85 एवं 86 को समझेंगे। आगामी लेखों में हम 'साधारण अपवाद' अध्याय एवं इसके अंतर्गत आने वाली धाराओं को, तर्कसंगत कृत्य (Justifiable act) वर्गीकरण के आधार पर समझेंगे।

मत्तता (Intoxication) में व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य (धारा 85 एवं 86)

जैसा कि हम जानते हैं कि कानून उन चीजों के लिए एक व्यक्ति को दंडित करने का इरादा नहीं करता है, जिस चीज़ पर वह व्यक्ति संभवतः कोई नियंत्रण नहीं रख सकता था। 'Actus non facit reum nisi mens sit rea' (एक कृत्य आपराधिक मनोवृत्ति के बिना किसी व्यक्ति को दोषी नहीं बनाता है) का सिद्धांत, केवल एक अनुस्मारक के रूप में काम करता है, जो यह बताता है कि आपराधिक कानून किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए उस व्यक्ति में किसी प्रकार के दोषी मानसिक तत्व (guilty mental element/guilty mind) को ढूंढता है। और यह जाहिर है कि दोषी मानसिक तत्व की अनुपस्थिति में व्यक्ति को किसी प्रकार की कोई सजा दी नहीं जा सकती है।

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 85 कहती है, "कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो उसे करते समय मत्तता के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ है, परन्तु यह तब जब वह चीज़, जिससे उसकी मत्तता हुई थी, उसे अपने ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दी गयी थी"

इसी क्रम में हम भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 86 को भी समझते हैं। यह धारा यह कहती है कि, "उन दशाओं में, जहाँ कि कोई किया गया कार्य अपराध नहीं होता जब तक कि वह किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय से न किया गया हो, कोई व्यक्ति जो वह कार्य मत्तता की हालत में करता है, इस प्रकार बरते जाने के दायित्व के अधीन होगा मानो उसे वही ज्ञान था जो उसे होता यदि वह मत्तता में न होता जब तक कि वह चीज़, जिससे उसे मत्तता हुई थी, उसे उसके ज्ञान के बिना या उसके इच्छा के विरुद्ध न दी गयी हो।"

इससे पहले कि हम इन दोनों धाराओं को बेहतर ढंग से समझ सकें, हमे यह ध्यान में रखना होगा कि यह दोनों धाराएँ एक दूसरे की पूरक के रूप में समझी जा सकती हैं, और इन्हें एक साथ पढना अधिक उचित होगा जिससे हमे इनके सम्बन्ध में एक समग्र जानकारी हासिल हो सकेगी।

गौरतलब है कि जहाँ धारा 85 के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति द्वारा कोई कार्य किया जाता है, जो उस कार्य को करते वक़्त मत्तता (intoxicated) या आम भाषा में अगर कहें तो, किसी पदार्थ के नशे में था, और अगर वह चीज़, जिससे मत्तता की स्थिति उत्पन्न हुई थी, उसे उसके ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दी गयी थी, तब वह किये गए कार्य (जो कि अपराध था) के लिए दोषी ठहराया नहीं जा सकेगा। वहीँ, धारा 86 उन दशाओं को स्पष्ट करती है कि जहाँ वह चीज़, जिससे एक व्यक्ति के लिए मत्तता की स्थिति उत्पन्न हुई, उस व्यक्ति द्वारा स्वयं ली गयी थी।

धारा 85 एवं 86 एवं दंड संहिता में अपवाद के रूप में 'मत्तता'

यदि हम धारा 85 एवं 86 को एक साथ पढ़ें तो हमे यह मालूम चलेगा कि दंड संहिता में 'मत्तता' के कारण किये गए कार्य, उस दशा में अपराध होंगे जहाँ व्यक्ति द्वारा नशीला पदार्थ अपनी इच्छा से लिया गया था, भले ही वह व्यक्ति मत्तता के चलते अपराध के स्वभाव को नहीं समझता था, या वह नहीं समझता था कि वह जो कुछ कर रहा है वह विधि के विरूद्ध है या ग़लत है।

दूसरे शब्दों में, यदि मत्तता (Intoxication) की स्थिति व्यक्ति के स्वयं के कारण है, और भले ही मत्तता से उस व्यक्ति के चित्त पर असर पड़ता है और वह अपनी तर्कशक्ति खो देता है और यह समझने में अक्षम हो जाता है कि उसके द्वारा किया जा रहा कार्य विधि के विरूद्ध है या ग़लत है, फिर भी उस व्यक्ति को उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है (हालाँकि ऐसे मामलों में दोषी ठहराए जाने की सीमाओं को हम लेख में आगे समझेंगे) जोजो @ जोजोमोन बनाम केरल राज्य [(2011) ILR 2 Kerala 789]

धारा 86, ऐच्छिक मत्तता के मामलों में कुछ छूट प्रदान करती है और इसे एक प्रकार से धारा 85 के अपवाद के रूप में समझा जा सकता है। धारा 86, ऐसे व्यक्ति को लाभ देती है जिसने ऐच्छिक मत्तता के कारण ऐसे अपराध को किया किया है जिसकी आवश्यकता, अभियुक्त का अपराध कारित करने हेतु 'विशिष्ट ज्ञान अथवा आशय' (particular knowledge or intention) है।

दूसरे शब्दों में, यदि किसी अपराध की आवश्यकता, ऐसा 'ज्ञान' अथवा 'आशय' है, और जब किसी व्यक्ति द्वारा ऐच्छिक मत्तता के कारण वह कार्य किया जाता है, तो केवल उस व्यक्ति में उस अपराध का ज्ञान (न कि आशय) होना माना जायेगा। और यदि वही कार्य ऐसे व्यक्ति द्वारा मत्तता की स्थिति में किया गया जो न तो उसकी इच्छा और न ही उसके ज्ञान के चलते कारित हुई तो न ही उस व्यक्ति को उस अपराध के होने के ज्ञान और न ही उसके आशय के पक्ष में उपधारणा (presumption) का निर्माण किया जायेगा।

जहाँ धारा 85 के अंतर्गत सभी अपराध आते हैं, वहीँ धारा 86 के अंतर्गत वह अपराध आते हैं जिनकी आवश्यकता, ऐसा 'ज्ञान' अथवा 'आशय' है। इसके अलावा इन दोनों धाराओं में कोई अंतर नहीं है, मसलन मत्तता की गंभीरता दोनों धाराओं के लिए समान है, दासा कन्धा बनाम उड़ीसा राज्य [(1976) Cr LJ 2010 (Ori)]

धारा 85 के अंतर्गत मत्तता

धारा 85, जिसे हमने अभी ऊपर समझा है वह इच्छा के विरुद्ध अथवा ज्ञान के बिना हुई मत्तता की दशा के बारे में बात करता है। दूसरे शब्दों में, जहाँ एक व्यक्ति द्वारा एक अपराध किया जाता है, और उस दौरान वह अपनी इच्छा के विरुद्ध अथवा जानकारी के बिना लिए गए किसी पदार्थ के चलते नशे में थे, और वह नशा ऐसा था जिसके चलते या तो वह उस किये गए अपराध के स्वभाव को नहीं समझता था, या वह नहीं समझता था कि वह जो कुछ कर रहा है वह विधि के विरूद्ध है या ग़लत हो, तो उस अपराध के लिए उस व्यक्ति को दोषी ठहराया नहीं जा सकता है।

इस सम्बन्ध में बबलू @ मुबारक हुसैन बनाम राजस्थान राज्य [(2006) 13 SCC 116] के मामले में अदालत द्वारा यह निर्णय सुनाया गया था कि धारा 85 का बचाव प्राप्त करने के लिए, निम्नलिखित चीज़ों का सिद्ध होना जरुरी है:-

(a) किये गए अपराध का स्वाभाव न समझ सकना, या (b) यह न समझना कि किया जा रहा कार्य या तो विधि के विरुद्ध है या ग़लत है, और (c) वह चीज़ जिससे मत्तता की स्थिति उत्पन्न हुई, वह उस व्यक्ति की इच्छा के विरूद्ध उसे दी गयी, या उसके ज्ञान के बिना उसे वह चीज़ दी गयी।

मत्तता के कारण कार्य की प्रकृति न समझ सकना

यह कहना गैर जरुरी है कि इस धारा का लाभ लेने के लिए सर्वप्रथम मत्तता का सिद्ध होना आवश्यक है, अगर ऐसा नहीं सिद्ध किया गया तो इस धारा एवं धारा 86 के अंतर्गत कोई लाभ लिया नहीं जा सकता है सोहोन मनिही बनाम बिहार राज्य (AIR 1970 Pat 303)। इसके अलावा वह मत्तता इस प्रकार की होनी आवश्यक है जो व्यक्ति को यह समझने में असमर्थ बना दे कि उसके द्वारा किया जा रहा कार्य (या अपराध) का स्वाभाव क्या है एवं वह कार्य या तो विधि के विरुद्ध है या ग़लत है।

मत्तता का बचाव्, जैसा भारतीय दण्ड संहिता में मौजूद है उसके लिए यह आवश्यक है कि मत्तता (जिसके प्रभाव में आकर कोई कार्य किया गया) के कारण, व्यक्ति अपने कार्य के स्वाभाव को समझ पाने में असमर्थ हो जाता है और एक अपराध कर बैठता है।

इच्छा एवं ज्ञान के विरूद्ध मत्तता (Intoxication)

इस सम्बन्ध में ऊपर हमने समझा कि मत्तता (Intoxication) की स्थिति, व्यक्ति की इच्छा एवं ज्ञान के विरूद्ध उत्पन्न होनी चाहिए। 'ज्ञान के बिना' (without his knowledge) के सीधा अर्थ यह है कि व्यक्ति को यह जानकारी नहीं थी कि उसके द्वारा लिया गया पदार्थ नशीला पदार्थ था, अथवा वह नशीला पदार्थ किसी चीज़ में मिला कर उसे दिया गया (जिसकी जानकारी उसे नहीं थी) जेठूराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य (AIR 1960 MP 242)। दूसरे शब्दों में व्यक्ति को इसका ज्ञान नहीं होना आवश्यक है कि उसके द्वारा लिया जा रहा पदार्थ, मत्तता (Intoxication) की स्थिति कारित करेगा।

स्वैच्छिक मत्तता एवं ज्ञान (धारा 86)

बासदेव बनाम पेप्सू राज्य (AIR 1956 SC 488) के प्रसिद्ध वाद में यह अभिनिर्णित किया गया था कि वह व्यक्ति जो मत्तता की स्थिति में स्वेच्छा से पहुँचता है, उसके लिए यह माना जायेगा कि उसे अपराध के सम्बन्ध में उतना ही ज्ञान था जितना कि एक ऐसे व्यक्ति को ज्ञान होता, जो मत्तता की स्थिति में नहीं है।

इसे हम एक उदाहरण से समझते हैं, जहाँ एक व्यक्ति ने किसी मादक पदार्थ का सेवन किया जिसके चलते वह मत्तता की स्थिति में पहुँच गया, अब उसने किसी को डराने के लिए हवा में गोली चलायी लेकिन वह गोली किसी अन्य व्यक्ति को लगी जिसके चलते उसकी मृत्यु हो गयी, मामला अदालत में पंहुचा और स्वेच्छा से मत्तता की स्थिति में पहुंचे व्यक्ति को मानव वध कारित करने के लिए दोषी ठहराया गया [आमेर सिंह बनाम राज्य (AIR 1955 Punj 13)]।

इसी क्रम में एनरीक एफ रिओ बनाम राज्य (1975) Cr LJ 1337 (Goa) के वाद में एक व्यक्ति ने धुत नशे में अपने मित्र के पेट पर वार किया, जिसके चलते उसकी मृत्यु हो गयी और अदालत ने उस व्यक्ति को धारा 304 के II भाग के लिए दोषी माना कि उसे ऐसा होने का ज्ञान था।

दूसरे शब्दों में, अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से मत्तता की स्थिति में पहुँचता है (उसने स्वेच्छा से किसी पदार्थ का सेवन किया जिससे मत्तता कारित हुई) और किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करता है तो कानून की नजर में यह माना जायेगा कि उसे यह पता रहा होगा कि ऐसा करना कितना खतरनाक है और हर संभव हालात में व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी और इसलिए उसे मृत्यु कारित करने के लिए दोषी ठहराया जायेगा भले ही उसका आशय ऐसा न करने का रहा हो।

हालाँकि Re सुरुताय्याँ उर्फ़ वय्यापुरी गौन्दन (AIR 1954 Mad 523) में अदालत ने यह माना था कि धारा 86 के अंतर्गत, कानून अभियुक्त के प्रति इस उपधारणा (presumption) का निर्माण करता है कि व्यक्ति को स्वेच्छा से मत्तता की स्थिति में पहुँचने के बाद अपने द्वारा किये गए कृत्यों के बारे में ज्ञान रहा होगा। और इसलिए, यह एक निराकरणीय अनुमान (rebuttable presumption) है जिसे अभियुक्त द्वारा असत्य साबित किया जा सकता है। इसलिए जहाँ स्वेच्छा से मत्तता की स्थिति को कारित किया जाता है वहां, अदालत यह मानेगी कि उस व्यक्ति को ऐसे अपराध (जिसकी आवश्यकता विशिष्ट ज्ञान या आशय है) कारित करने का वैसा ज्ञान रहा होगा, जैसा ज्ञान उसे तब होता जहाँ वह मत्तता की स्थिति में नहीं होता।

और चूँकि अभियुक्त के सम्बन्ध में यह उपधारणा बना ली जाती है इसलिए अब यह अभियुक्त की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने खिलाफ इस उपधारणा (presumption) को असत्य साबित करे। वह यह साबित कर सकता है कि मत्तता की स्थिति के चलते वह उसके पास उस अपराध के सम्बन्ध में वह 'विशिष्ट ज्ञान' (particular knowledge) नहीं था।

स्वैच्छिक मत्तता एवं आशय

जैसा कि हम समझ चुके हैं कि धारा 86 के अंतर्गत अभियुक्त द्वारा किये गए अपराध के लिए उस अपराध को कारित करने का अभियुक्त को ज्ञान होने के पक्ष में उपधारणा (presumption) बनायीं जाती है, हालाँकि इस धारा में उस व्यक्ति द्वारा उस अपराध को कारित करने के आशय के सम्बन्ध में कोई उपधारणा का निर्माण नहीं किया जाता है। हालाँकि यह गौर करने योग्य है कि जहाँ तथ्यों से यह मालूम चले कि अभियुक्त का उस अपराध को कारित करने का आशय रहा होगा, वहां उसे इस धारा के अंतर्गत बचाव नहीं दिया जा सकता है।

शंकर जैसवारा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2007 9 SCC 360) के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त को धारा 86 का लाभ देने से मना कर दिया था। इस मामले में, शंकर जैसवारा ने तारक जायसवाड़ा (मृतक) को अश्लील और गंदी भाषा में गाली देना शुरू कर दिया। जब मृतक तारक ने अपीलकर्ता-अभियुक्त से यह अपील की कि वह उसे अकेला छोड़ दे तो अपीलकर्ता-अभियुक्त उग्र हो गया और उसने तेज धार वाले हथियार से तारक को मारना शुरू कर दिया और उसे तबतक मारा जबतक वह मर नहीं गया।

अदालत ने रिकॉर्ड पर लाये गए सबूतों को देखते हुए यह कहा कि, "हम इस बात से सहमत नहीं हैं कि अपीलकर्ता-अभियुक्त अपनी वास्तविक इंद्रियों से रहित था और वह अपने द्वारा किये गए कार्य को समझने में असमर्थ था। दूसरी ओर, जिस तरह से अपीलकर्ता ने मृतक पर हमला किया, जिसके परिणामस्वरूप मृतक को 7 गंभीर चोटें आईं, इससे पता चलता है कि अपीलकर्ता-अभियुक्त अपने कृत्य के परिणामों के प्रति काफी सचेत था। साक्ष्य से स्पष्ट है कि, अपीलकर्ता का अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण था और उसने तर्कशक्ति का उपयोग करते हुए घटना के बाद वहां से भागने की कोशिश की। पीडब्लू -9 के साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि वह घटना के तुरंत बाद अपने पहने हुए कपड़ों और अपराध के हथियार को छिपाने के लिए आया था। और इसलिए हम यह स्वीकार नहीं सकते कि नशे के कारण अपीलकर्ता ने अपनी इंद्रियों पर और आत्म नियंत्रण खो दिया। अपीलकर्ता की ओर से अपराध कारित करने का आशय, सबूत और सभी उपस्थित परिस्थितियों से स्पष्ट है।"

धारा 86 के सम्बन्ध में बासदेव बनाम पेप्सू राज्य (AIR 1956 SC 488) के मामले में अदालत ने यह देखा था कि, जहां तक अपराध करने के आशय की बात है, तो इसे नशे की डिग्री एवं सामान्य परिस्थितियों के सम्बन्ध में देखा जाना चाहिए। सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उस अपराध को कारित करते समय व्यक्ति अपने दिमाग का उपयोग कर पा रहा था? यदि ऐसा नहीं है तो अपराध के सम्बन्ध में अपेक्षित आशय उसपर थोपना संभव नहीं होगा। लेकिन अगर वह नशे में इतना गहरा नहीं गया है, और तथ्यों से यह पता लगाया जा सकता है कि वह जानता था कि वह क्या कर रहा है, तो यह माना जा सकता है कि एक आदमी को उसके कृत्यों के प्राकृतिक परिणामों का पता है।

दरअसल बासदेव के वाद में, हरिगढ गाँव के रहने वाले अपीलार्थी-अभियुक्त बासदेव एक सेवानिवृत्त सैनिक था। उस पर मगहर सिंह नाम के एक युवा लड़के की हत्या का आरोप था, जिसकी उम्र लगभग 15 या 16 थी। वे दोनों एक ही गाँव के थे और वे दूसरे गाँव में एक शादी में शामिल होने गए थे। वे सभी 12 मार्च, 1954 को दोपहर का भोजन लेने के लिए दुल्हन के घर गए। चूँकि वहां ख़ुशी का माहौल था तो अपीलार्थी-अभियुक्त ने मदिरा ली थी और वह बहुत नशे में था। वहां पहुंचकर कुछ लोग अपनी सीटों पर बैठ गए थे और कुछ नहीं बैठे थे। अपीलकर्ता-अभियुक्त ने मगहर सिंह (मृतक) से कहा कि वह थोड़ा दूर हट जाये जिससे वह (अपीलकर्ता-अभियुक्त) सुविधाजनक रूप से अपना स्थान ग्रहण कर सके। लेकिन मगहर सिंह ने अपीलकर्ता-अभियुक्त की बात नहीं सुनी। अपीलकर्ता-अभियुक्त ने गुस्से में पिस्तौल निकालकर उस लड़के को पेट में गोली मार दी। चोट घातक साबित हुई और उसकी मृत्यु हो गयी।

इस मामले में अदालत ने यह देखा कि, यद्यपि अभियुक्त शराब पीने के प्रभाव में था, परन्तु वह उसके प्रभाव में इतना अधिक नहीं था कि उसका मन उसके चलते इतना अधिक प्रभावित हो गया कि अपराध कारित करने हेतु आवश्यक आशय बनाने के लिए अक्षम हो गया हो।

साधारण अपवाद के रूप में मत्तता: निष्कर्ष

इस लेख में हमने विस्तार से समझा कि आखिर क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में मत्तता (Intoxication) के दौरान किये गए कृत्य (धारा 85-86) किसी भी अपराध के लिए कब अपवाद बन सकते हैं। जहाँ धारा 85, मत्तता के दौरान किये गए कार्य के लिए, अपराध से पूर्ण बचाव प्रदान करती है, वहीँ धारा 86 के अंतर्गत स्वैच्छिक मत्तता की स्थिति कारित करने में व्यक्ति द्वारा किये गए अपराध के लिए ज्ञान के पक्ष में उपधारणा (presumption) का निर्माण किया जाता है। इसी के साथ हम 'साधारण अपवाद' (General exception) श्रृंखला के चौथे लेख को विराम देते हैं। इस लेख में हमने 'मत्तता में किया गए कार्य' को क्षम्य कृत्य (Excusable act) के अंतर्गत समझा। हम उम्मीद करते हैं कि आपको यह लेख उपयोगी लगा होगा, श्रृंखला के अगले लेख में हम 'तर्कसंगत कृत्य' के अंतर्गत न्यायिकतः कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य (धारा 77) एवं न्यायालय के निर्णय का आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य (धारा 78) को समझेंगे। आप इस श्रृंखला से जुड़े रहें क्यूंकि इस श्रृंखला में हम साधारण अपवाद को पूर्ण रूप से समझ सकेंगे।

इस श्रृंखला का भाग दो यहाँ पढ़े