IPC की धारा 80, 82 एवं 83 के अंतर्गत क्षम्य कृत्य क्या हैं?: दुर्घटनावश हुए कृत्य एवं इन्फैन्सी का प्रतिवाद विशेष ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 2]

IPC की धारा 80, 82 एवं 83 के अंतर्गत क्षम्य कृत्य क्या हैं?: दुर्घटनावश हुए कृत्य एवं इन्फैन्सी का प्रतिवाद विशेष [

पिछले लेख में हमने समझा कि भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत 'साधारण अपवाद' (General Exceptions) क्या हैं और हमने यह भी समझा कि कैसे यह अध्याय ऐसे कुछ अपवाद प्रदान करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का आपराधिक दायित्व खत्म हो जाता है। इस लेख में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया कि इन बचाव का आधार यह है कि यद्यपि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, परन्तु उसे उसके लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

इसी क्रम में हमने जाना कि कैसे यह बचाव आम तौर पर 2 भागों के अंतर्गत वर्गीकृत किये जाते हैं- तर्कसंगत (Justifiable) और क्षम्य (Excusable)। संक्षिप्त में, हम यह कह सकते हैं कि क्षम्य (Excusable) कृत्य वह कृत्य हैं, जो इस समझ और तर्क के अभाव में किये जाते हैं कि वो किसी अपराध का गठन करेंगे (या अगर अपराध का गठन कर भी रहे हैं तो वे कृत्य कानूनी रूप से किये जाने जरुरी हैं या तर्कसंगत हैं, पर वो किये किसी तथ्य की भूल में गए)। वहीँ तर्कसंगत कृत्य (Justifiable act) के अंतर्गत, अमूमन वे कृत्य आते हैं जो इस समझ के साथ किये जा सकते हैं कि वे अपराध का गठन कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करना कानूनी रूप से उचित माना जाता है।
इसको और विस्तार से समझने के लिए आप इस श्रृंख्ला के भाग 1 को पढ़ सकते हैं और दंड संहिता की धारा 76 और 79 के अंतर्गत 'तथ्य की भूल' को भी समझ सकते हैं। मौजूदा लेख में हम क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत धारा 80 और 82 एवं 83 को समझेंगे। आगामी लेखों में हम 'साधारण अपवाद' अध्याय एवं इसके अंतर्गत आने वाली धाराओं को, क्षम्य कृत्य (Excusable act) एवं तर्कसंगत कृत्य (Justifiable act) वर्गीकरण के आधार पर समझेंगे।
विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना (धारा 80)

जैसा कि हम जानते हैं कि कानून उन चीजों के एक व्यक्ति को दंडित करने का इरादा नहीं करता है, जिस चीज़ पर वह व्यक्ति संभवतः कोई नियंत्रण नहीं रख सकता था। 'Actus non facit reum nisi mens sit rea' (एक कृत्य आपराधिक मनोवृत्ति के बिना किसी व्यक्ति को दोषी नहीं बनाता है) का सिद्धांत, केवल एक अनुस्मारक के रूप में काम करता है, जो यह बताता है कि आपराधिक कानून किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए उस व्यक्ति में किसी प्रकार के दोषी मानसिक तत्व (guilty mental element/guilty mind) को ढूंढता है।
भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 80 कहती है, "कोई बात अपराध नहीं है, जो दुर्घटना या दुर्भाग्य से और किसी आपराधिक आशय या ज्ञान के बिना विधिपूर्ण प्रकार से विधिपूर्ण साधनों द्वारा उचित सतर्कता और सावधानी के साथ, विधिपूर्ण कार्य करने में हो जाती है।"
दूसरे शब्दों में, धारा 80 एक व्यक्ति को आपराधिक दायित्वों (Criminal liability) से उस परिस्थिति में मुक्त करती है, जहाँ उसके द्वारा कोई कार्य दुर्घटना स्वरुप (accidentally) या दुर्भाग्यवश (due to misfortune) किया गया हो, जहाँ ऐसा कार्य करने का उसका कोई आराधिक आशय या ज्ञान (Criminal intention or Knowledge) न रहा हो और वह कार्य एक विधिपूर्ण कार्य (Lawful act) को विधिपूर्ण ढंग (Lawful manner) से एवं विधिपूर्ण साधनों (Lawful means) से किया जा रहा हो, जहाँ उस व्यक्ति द्वारा उचित सावधानी बरती गयी हो।
अब इसे क्षम्य कृत्य (Excusable act) के सापेक्ष समझने की कोशिश करिये। धारा 80 के अंतर्गत एक व्यक्ति को यह नहीं पता है कि वह जो करने जा रहा है, वह एक आपराधिक कार्य का गठन करेगा, परन्तु दुर्घटनावश या दुर्भाग्यवश वह कार्य करते हुए उससे एक अपराध हो जाता है। लेकिन इसके साथ शर्त यह भी है कि वह कार्य एक विधिपूर्ण कार्य रहा हो, जिसका विधिपूर्ण उद्देश्य रहा हो, वह कार्य विधिपूर्ण ढंग से विधिपूर्ण साधनों द्वारा किया गया हो और उस व्यक्ति द्वारा उस कार्य को करने में उम्मीद जनक सावधानी बरती गयी हो।
अब इसे एक उदहारण से समझते हैं, मान लीजिये कोई व्यक्ति बिजली विभाग में कार्य करता हो और वह शहर के किसी इलाके में बिजली चली जाने की शिकायत पर उस जगह पंहुचता है। वहां पहुँच कर वह यह देखता है कि कुछ तारों का आपस में सम्बन्ध समाप्त हो गया, जिसके चलते उस इलाके की बिजली चली गयी है। वह व्यक्ति वहीँ भीड़ भाड़ वाले इलाके में उन तारों को जोड़ने लगता है, और कोई व्यक्ति उस तार की चपेट में आ जाता है, अब यहाँ पर बिजली विभाग का कर्मचारी दुर्घटना या दुर्भाग्य का डिफेंस नहीं मांग सकता क्यूंकि उसके द्वारा एक विधिपूर्ण कार्य को करते हुए उचित रूप से सावधानी नहीं बरती गयी। हम विभिन्न वादों के माध्यम से आगे भी इसके अंतर्गत उदहारण को समझेंगे।
इससे पहले कि हम 'दुर्घटना' एवं 'दुर्भाग्य' को बेहतर ढंग से समझें, हमारे लिए यह समझ लेना आवश्यक है कि भारतीय दंड संहिता में धारा 80 के अंतर्गत दुर्घटना का प्रतिवाद, 'असावधानी' को दण्ड्यता (Culpability) से मुक्त करता है।
दुर्घटना या दुर्भाग्य के महत्वपूर्ण भाग

दुर्घटना या दुर्भाग्य का होना

किसी भी दशा में धारा 80 का प्रतिवाद केवल तभी अदालत में ठहर सकता है जहाँ किसी कार्य (जो आपराधिक प्रवृति का था) में व्यक्ति विशेष की चूक या गलती का कोई योगदान न हो। यहाँ न केवल व्यक्ति द्वारा उस कार्य का किया जाना सोचा नहीं गया था, बल्कि वह कार्य उस व्यक्ति के लिए इस हद तक असम्भाव्य था कि उस कार्य का होना अपने आप में चौंकाने वाला था। दूसरे शब्दों में वह कार्य इतना असम्भाव्य ज्ञात हो रहा था कि एक व्यक्ति द्वारा उस कार्य को रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाये जा सकते थे।
टुंडा बनाम रेक्स (AIR 1950 All 95) के मामले में अदालत ने यह स्पष्ट किया था कि 'दुर्भाग्य' का मतलब 'दुर्घटना' ही है, बस 'दुर्भाग्य' के अंतर्गत वह 'दुर्घटना' का होना चौंकाने वाला था यानि जिसके बारे में पहले से सोचा नहीं जा सकता था। यह भी ध्यान दिया जाना जरुरी है कि 'दुर्घटना' या 'दुर्भाग्य' के जरिये किसी व्यक्ति को क्षति, चोट या नुकसान पहुँचता है।

उदाहरण के लिए, मान लीजिये आप एक ऐसे मैदान में (जहाँ आम लोगों की आवाजाही बिलकुल भी नहीं है) में जाते हैं, जो निशानेबाजी के लिए सरकार से स्वीकृति प्राप्त है। वहां अच्छी तरह से यह देख लेने के बाद कि वहां कोई व्यक्ति पहले से मौजूद नहीं है, आप अपनी परमिट प्राप्त पिस्तौल से कुछ तय निशानों पर निशाना लगाते हैं। इसी बीच उस पिस्तौल से चली एक गोली, वहां आये एक बच्चे को लग जाती है, जो अज्ञानता-वश अपनी माँ से बिछड़कर वहां आ गया था।

उस बच्चे की तत्काल प्रभाव से मृत्यु हो जाती है। यहाँ आपको आपराधिक दायित्वों से दंड संहिता की धारा 80 के सापेक्ष राहत मिल सकती है, क्यूंकि उस बच्चे का वहां होना अपने आप में असम्भाव्य था, आपने पिस्तौल से निशाना लगाने से पहले उस मैदान को अच्छी तरह से तलाशा भी था। चूँकि आप एक परमिट प्राप्त पिस्तौल से निशाना, एक ऐसे मैदान में लगा रहे थे जो उस कार्य के लिए ही प्रयुक्त होता है, और आपने एक विधिपूर्ण कार्य, विधिपूर्ण उद्देश्य के लिए विधिपूर्ण ढंग से किया इसलिए आपको उस बच्चे की आकस्मिक एवं दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
आपराधिक मनोवृति या ज्ञान का अभाव

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस धारा के अंतर्गत, व्यक्ति में आपराधिक मनोवृति अथवा ज्ञान का अभाव होना जरुरी है। जाहिर है कोई अपराध अगर व्यक्ति द्वारा सोचा समझा गया है, तो उसके लिए उसे आपराधिक दायित्व से किसी प्रकार से राहत नहीं मिल सकती है।
फिरसे अगर हम टुंडा बनाम रेक्स (AIR 1950 All 95) के मामले की ओर लौटें, तो हमे आपराधिक मनोवृति या ज्ञान के अभाव का एक और अच्छा उदहारण मिलता है। इस वाद में स्थिति यह थी कि अपीलकर्ता (टुंडा) और मृतक (मुंशी) मित्र थे, दोनों कुश्ती के शौकीन थे, और एक कुश्ती के खेल के दौरान दी गयी चोट से मुंशी की दुर्भाग्यापूर्वक मृत्यु हो जाती है और टुंडा पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304A के तहत मुंशी की मृत्यु कारित करने का आरोप लगाया जाता है।
अदालत ने इस मामले में अपना निर्णय सुनाते हुए कहा था कि, जब वे (टुंडा एवं मुंशी) एक दूसरे के साथ कुश्ती करने के लिए सहमत हुए, तो आकस्मिक चोटों को झेलने के लिए एक दूसरे की ओर से निहित सहमति थी। अदालत ने इस मामले को धारा 80 और धारा 87 का मामला माना था और टुंडा को आरोप से बरी करदिया था।
मध्य प्रदेश राज्य सरकार बनाम रंगास्वामी (AIR 1962 Nag 268) के मामले में, आरोपी जेमादार मेनन ने 152 फीट की दूरी से बंदूक से एक वस्तु पर गोली चलायी। वह गोली सीधे जाकर मृतक (कचरा) को लगी। अदालत के समक्ष उसने कहा कि वह यह सोच रहा था कि वह वस्तु एक हाइना था, जो पिछले दिन उसने अपने क्वार्टर के आसपास के क्षेत्र में देखा था। उसने यह भी कहा कि उक्त समय वर्षा हो रही थी, और इसलिए उसने यह नहीं सोचा कि वहां एक व्यक्ति हो सकता है। अदालत ने इस मामले को दुर्घटना (धारा 80 के अंतर्गत) मानते हुए, जेमादार मेनन को बरी करदिया।

ऐसे ही, उड़ीसा राज्य बनाम खोरा घासी [(1978) Cr LJ 1305 (Ori)] मामले में, आरोपी, जो उस समय अपने मक्का के खेत को देख रहा था, उसने अपने खेत में कुछ आवाज सुनी, और यह सोचकर कि एक भालू उसके मक्का के खेत में घुस गया है, उसने उस स्थान की ओर तीर चलाया, जहां से उक्त ध्वनि सुनाई दे रही थी। वह तीर मृतक को उसके पेट के दाहिनी ओर लगा, जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गयी।
उड़ीसा हाई-कोर्ट ने लाहौर हाई-कोर्ट के निर्णय [वरयाम सिंह बनाम एम्परर (AIR 1926 Lah 554)] से सहमति जताते हुए कहा,
"बेहतर न्यायिक राय यह है कि यदि अभियुक्त को हमले के समय अच्छे से विश्वास है कि उसके द्वारा किये गए हमले की विषय-वस्तु एक जीवित इंसान नहीं है, बल्कि एक भूत या कोई अन्य वस्तु है तो उसे भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 या धारा 304 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इस तरह की राय के लिए आधार यह है कि आपराधिक मनोवृति या गलत करने या अपराध करने का इरादा उस व्यक्ति का इरादा नहीं है, और 'मानव वध' की विषय वास्तु केवल एक 'जीवित इंसान' हो सकता है।"
वहीँ, आत्मेंद्र बनाम कर्णाटक राज्य (AIR 1998 SC 1985) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्त को धारा 80 का लाभ देने से मना करदिया था। इस मामले में, अभियुक्त ने मृतक पर गोली चलायी और अदालत के सामने अपने बचाव में कहा कि, मृतक ने अपीलकर्ता पर रीपर (फसल काटने वाला हथियार) को घुमाया और रिपर ने बंदूक के ट्रिगर को छुआ जिससे गोली मृतक को लगी। अदालत ने पाया कि, उक्त स्थान पर कोई रीपर नहीं पाया गया था और गोली भी काफी नजदीक से चलायी गयी थी। इसके अलावा मृतक और अभियुक्त के बीच सम्बन्ध भी मधुर नहीं पाए गए थे।
विधिपूर्ण कार्य-विधिपूर्ण उद्देश्य-विधिपूर्ण ढंग

जैसा कि हमने ऊपर बताया, धारा 80 के अंतर्गत लाभ पाने के लिए किये गए कार्य का विधिपूर्ण होना आवश्यक है। इसके साथ ही वह कार्य, विधिपूर्ण उद्देश्य के लिए विधिपूर्ण ढंग से किया गया होना चाहिए। यह बात अपने आप में बहुत साफ़ है और इसको हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं।
एक पिता अपने 10 वर्षीय बेटे को उसके द्वारा की गयी किसी गलती के लिए लाठी से मार रहा है, और इसी बीच उसकी 2 वर्षीय बेटी वहां आ जाती और दुर्भाग्यवश पिता की लाठी उस बच्ची के सर पर लग जाती है, यहाँ पिता द्वारा धारा 80 का लाभ नहीं लिया जा सकता है, क्यूंकि उस व्यक्ति द्वारा विधिपूर्ण ढंग से कार्य नहीं किया जा रहा था।
उचित देखभाल और सावधानी

इस धारा के अंतर्गत लाभ पाने के लिए जरुरी है कि व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य, उचित सावधानी और देखभाल से किया गया हो। मध्य प्रदेश राज्य सरकार बनाम रंगास्वामी (AIR 1962 Nag 268) के मामले में यह कहा गया था कि 'उचित सावधानी और देखभाल' का पैमाना एक तार्किक व्यक्ति के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
भूपेन्द्रसिंह चुडासमा बनाम गुजरात राज्य (AIR 1997 SC 3790) के मामले में, विशेष आरक्षित पुलिस (एसआरपी) के एक सशस्त्र कांस्टेबल ने अपने तत्काल सुपीरियर (हेड कांस्टेबल) पर गोली चलाई, जो जुलाई 1983 में अत्यधिक वर्षा वाले दिन खम्पला डैम साइट (गुजरात राज्य में) के आसपास पेट्रोलिंग कर रहा था। अभियुक्त का कहना था कि उसने टॉवर के पास आग देखी और किसी को चलते देखा, उसे संदेह था कि कुछ बदमाश वाल्व टॉवर पर आग के साथ कुछ हरकत करने वाले थे।

अभियुक्त ने आगे कहा कि प्रकाश की गैरमौजूदगी के कारण वहां चलते व्यक्ति की पहचान उसके द्वारा नहीं की जा सकी, और अभियुक्त को रोकने के लिए वह चिल्लाया। लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया तब वह आगे बढ़ा और फिरसे चिल्लाया और फिर भी जब कोई जवाब नहीं दिया गया, तब उसे अपने कर्तव्यों के निर्वहन में गोली चलानी पड़ी।
अदालत ने पाया कि यह कार्य बिना किसी उचित देखभाल और सावधानी के किया गया। गोली काफी पास से और बिना व्यक्ति की पहचान किये बिना चलायी गयी। अदालत ने मृत्यु कारित करने की सजा को बरक़रार रखते हुए अभियुक्त को धारा 80 का लाभ देने से इनकार करदिया।
यहाँ हम दुर्घटना एवं दुर्भाग्य की धारा को समाप्त करते हैं, उम्मीद है यह धारा आपको अच्छे से समझ में आ गयी होगी। चलिए अब हम क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत आने वाली धारा (82-83) को समझते हैं जिसके अंतर्गत इनफैन्सी के मामले देखे जाते हैं।
इनफैन्सी (धारा 82-83)

धारा 82 - "कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर्ष से कम आयु के शिशु द्वारा की जाती है"

धारा 83 - "कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा की जा जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सके। "

यहाँ इन दोनों धाराओं को पढ़ने के बाद यह पता चलता है कि हमारा कानून उन मामलों में जहाँ किसी बच्चे द्वारा भूल वश कोई कार्य किया गया और यदि वह अपराध है, तो उसके लिए कोई सजा उस बच्चे को नहीं दी जाती है।
इसको भी दो वर्गों में बनता गया है। जहाँ 7 वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा किया गया कार्य, किसी भी हाल में अपराध का निर्माण नहीं करेगा, वहीँ 7-12 वर्ष के आयु के बच्चों द्वारा किये गए अपराध के मामले में यह देखा जायेगा कि क्या उस बच्चे का मानसिक स्तर उस कार्य को कारित करते वक्त इतना था की वह अपने द्वारा किये गए कृत्य की प्रकृति को समझ सके और उसके परिणामों के सम्बन्ध में निर्णय लेने की क्षमता रख सके।
धारा 82 एवं 83 के महत्वपूर्ण भाग

इससे पहले कि हम इन दोनों धाराओं के अंतर्गत किसी कार्य को लाने के लिए महत्वपूर्ण शर्तों को देखें एवं समझें, हमारा यह जान लेना आवश्यक है कि धारा 82 एवं 83 के अंतर्गत दिया गया यह बचाव किशोर न्याय के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 15 (3) एवं 39 (e) एवं (f) हैं। इन अनुच्छेदों के अंतर्गत, किशोरों के प्रति कुछ विशेष व्यवहार की बात की गयी है।
7 वर्ष से कम आयु के शिशु का मामला (धारा 82)

हमारा कानून 7 वर्ष से कम आयु के शिशु को doli incapax (असमर्थ) मानता है। इसका सीधा अर्थ है कि 7 वर्ष से कम आयु का शिशु न ही कोई अपराध कर सकता है, न उसे उसके लिए कोई सजा दी जा सकती है। यह प्रकल्पना (presumption) हर हाल में अंतिम (conclusive) है, क्यूंकि एक 7 वर्ष की आयु का शिशु 'मेंस रेया' (अपराधिक मनोवृति) का निर्माण करने में असमर्थ होता है।
7 वर्ष से अधिक एवं 12 वर्ष से कम आयु के शिशु का मामला (धारा 83)

इसके अंतर्गत 7 वर्ष से अधिक एवं 12 वर्ष से कम आयु के शिशु को doli capax (समर्थ) माना जाता है, अर्थात यदि वह शिशु अपने द्वारा किये गए कार्य की प्रकृति एवं उसके परिणाम का निर्णय करने में सक्षम है तो वह अपराध कारित कर सकता है।
इसके अंतर्गत शिशु की आयु मायने नहीं रखती, बल्कि उस आयु में उसके द्वारा किये गए कार्य की प्रकृति समझने और उसके परिणाम के सम्बन्ध में निर्णय ले सकने की क्षमता को देखा जाता है। इसके अंतर्गत प्रतिवादी (defence) को यह साबित करना होता है कि कथित अपराध करने के वक़्त न केवल वह शिशु 12 वर्ष से कम आयु का था बल्कि वह अपने द्वारा किये गए कार्य की प्रकृति समझने और उसके परिणाम के सम्बन्ध में निर्णय ले सकने की क्षमता नहीं रखता था। इसके अभाव में अदालत यह समझेगी कि वह शिशु परिपक्व था कि वह किसी गलती और अपराध में भेद कर सके [हीरालाल मालिक बनाम बिहार राज्य (AIR 1977 SC 2236) का मामला]।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि 12 वर्ष से अधिक आयु के किशोर को इस प्रकार का कोई लाभ कानून में नहीं मिलता है, हाँ यह जरुर है कि ऐसे किशोर की किशोरावस्था और आपराधिक मनोदशा को उसको सजा देते समय में ध्यान में रखा जाता है [हीरालाल मालिक बनाम बिहार राज्य (AIR 1977 SC 2236)का मामला]। गौरतलब है कि धारा 83 के अंतर्गत प्रकल्पना (presumption), खंडनीय (Rebuttable) होती है।
हालाँकि अब किशोरों (18 वर्ष की आयु तक) के लिए एक एक अलग कानून, 'किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015' अस्तित्व में आ चुका है जो ऐसे अपराधों से सम्बंधित है।
किशोर की परिपक्वता और समझ

जहाँ धारा 82 के अंतर्गत, 7 वर्ष से कम उम्र के शिशु के सम्बन्ध में कोई सवाल नहीं उठता, न ही यह साबित हो जाने के बाद कि शिशु 7 वर्ष से कम आयु का था, कोई अन्य सबूत उसकी आपराधिक मनोदशा को साबित करने के लिए दिया जा सकता है। वहीँ, धारा 83 के मामले में 7 से 12 वर्ष की आयु के शिशु की आपराधिक मनोदशा के सम्बन्ध में सबूत दिए जा सकते हैं और यह दर्शाया जा सकता है कि वह शिशु अपने द्वारा किये गए कार्य की प्रकृति और परिणाम समझता था।
हालाँकि वह परिणाम, सजा या अपराध से सम्बंधित नहीं होता है परन्तु ऐसे शिशु को यह पता होना चाहिए कि वह जो कर रहा है उसके क्या परिणाम हो सकते हैं और उसके बाद उसके द्वारा वह कार्य किया जाता है। वादी पक्ष द्वारा सकारात्मक सबूतों से यह साबित करना आवश्यक नहीं कि ऐसे शिशु की मनोदशा क्या है, बल्कि अदालत उसके बर्ताव, व्यवहार, प्रकृति एवं कार्य के ढंग से यह पता लगा सकता है कि वह शिशु अपने द्वारा किये गए कृत्य की प्रकृति और उसके परिणाम को समझता है अथवा नहीं [अब्दुल सत्तर बनाम क्राउन (AIR 1949 Lah 51) मामला]।
दुर्घटना-दुर्भाग्य एवं इन्फैन्सी: निष्कर्ष
इस लेख में हमने विस्तार से समझा कि आखिर क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में दुर्घटना (धारा 80) या इन्फैन्सी (धारा 82,83) किसी भी अपराध के लिए कब अपवाद बन सकती है। जहाँ दुर्घटना या दुर्भाग्य के अंतर्गत, कार्य का विधिपूर्ण होना जरुरी है (और भी तमाम शर्तों के साथ), वहीँ 7 से 12 वर्ष की आयु के शिशु में अपने कार्य के परिणाम और उसकी प्रकृति को न समझ पाना आवश्यक है (धारा 83)।
इसी के साथ हम 'साधारण अपवाद' (General exception) श्रृंखला के दूसरे लेख को विराम देते हैं। इस लेख में हमने 'दुर्घटना-दुर्भाग्य' एवं 'इन्फैन्सी' को क्षम्य कृत्य (Excusable act) के अंतर्गत समझा। हम उम्मीद करते हैं कि आपको यह लेख उपयोगी लगा होगा, श्रृंखला के अगले लेख में हम 'क्षम्य कृत्य' के अंतर्गत विकृत-चित्त व्यक्ति का कार्य (धारा 84) एवं इच्छा के विरुद्ध मत्तता में किये गए कार्य (धारा 85 एवं 86) को समझेंगे। आप इस श्रृंखला से जुड़े रहें क्यूंकि इस श्रृंखला में हम साधारण अपवाद को पूर्ण रूप से समझ सकेंगे।