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CBI Vs CBI मामले में CBI निदेशक आलोक वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुक्रवार तक टाल दी। इस दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन...

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या रामजन्मभूमि- बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया। सोमवार को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने...

‘नपुंसक’शब्द को जब उसके अपने सादे और व्याकरणिक अर्थ में समझा जाता है, तो यह किसी व्यक्ति के मनोदशा पर प्रतिकूल रूप से प्रतिबिंबित होता है और ऐसी स्थिति बन सकती है की उसव्यक्ति का दूसरे लोग उपहास करें। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि याचिका में पति को नपुंसक बताना ‘मानहानि’ हो सकती है। एक पति ने मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी जिसमें उसने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी ने उच्च न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में  उसे नपुंसक बताकर उसकी मर्दानगी पर ऊँगली उठाई है इस याचिका पर मजिस्ट्रेट ने पत्नी को सम्मन जारी किया जिसे उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने पत्नी के वकील की इस दलील को खारिज कर दिया कि जब भी मुकदमेबाजी में कोई आरोप सही साबित होता है, तो यह आईपीसी की धारा 499 के अर्थ में मानहानि के तहत नहींआता है। यह भी तर्क दिया गया था कि जब किसी दायर शिकायत का आधार सिविल कार्यवाही में दायर कोई शिकायत हो तो अगर यह गलत पाया गया, तो यह अपराध आईपीसी की धारा 500 केतहत दंडनीय मानहानि नहीं होगा, लेकिन झूठी गवाही देने का अपराध आईपीसी की धारा 193 के तहत दंडनीय है। इस बारे में दी गई दलील को अस्वीकार करते हुए, अदालत ने कहा : “…यदि गैर आवेदक यह कहता है कि इस शब्द का इस्तेमाल किसी अन्य अर्थ में किया गया है, तो भी यह गैर-आवेदक की गर्भधारणा की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली स्थिति की ओर इशारा करता है और इसे सबूत के साथ साबित करना होगा। पर इस स्तर पर, स्पष्ट रूप से शब्द द्वारा इंगित अर्थ को लेना होगा जैसा कि यहहै… इसलिए, यह अपराध आईपीसी की धारा 500 के तहत दंडनीय है।”...

हाल के एक फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 277 (लापरवाही से गाड़ी चलाने), धारा 337  और धारा 304A के तहत एक आरोपी को बरी किए जाने के फैसले पर नाराजगी जाहिर...

कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रोतिक प्रकाश बनर्जी की अवकाशकालीन पीठ को आज एक अजीबोग़रीब याचिका पर सुनवाई का मौक़ा मिला यह याचिका भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे एक पुलिस अधिकारी ने दायर किया था जिसे इससे पहले हाईकोर्ट की पीठ ने ज़मानत देने से मना कर दिया गया था। अक्टूबर 11 को सुजीत मंडल ने अग्रिम ज़मानत के लिए आवेदन दिया था जिसमें उसने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला दिया जिसमें उसके सह आरोपी को अंतरिम ज़मानत दी गई थीलेकिन कलकता हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अवकाश से पहले उसकी ज़मानत याचिका रद्द कर दी। अवकाशकालीनपीठ के समक्ष उसने दुबारा याचिका दायर की। याचिककर्ता के वक़ील संजय बनर्जी ने पीठ से कहा कि उनका मुवक्किल सुप्रीम कोर्ट में भी अपील करना चाहता है पर जब कोई याचिककर्ता अनुच्छेद 32 के अधीन सुप्रीम कोर्ट में अपील करना चाहता है तो उसे पूर्व शर्त के रूप में यह दिखाना पड़ता है कि उसने समान पूर्वक काम किया है चूँकि उसेअग्रिम ज़मानत देने से माना किया गया है, अब अगर वह सुप्रीम कोर्ट में अपील करता है, तो उसे ऐसा एक भगोड़े के रूप में ऐसा करना पड़ेगा अगर वह सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के पास जाता है तो और उसे यह आवेदन देने की अनुमति दी जाती है, और ऐसा उसको गिरफ़्तार किए बिना करने दिया जाताहै तो यह सार्वजनिक नीति के ख़िलाफ़ होगा। वक़ील ने कोर्ट से अपील किया कि उनके मुवक्किल को सुप्रीम कोर्ट में गिरफ़्तारी के डर के बिना आवेदन का एक मौक़ा दिया जाना चाहिए। इस दलील से प्रभावित पीठ ने कहा,“यह सच है की इस अदालत की एक खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को 10 अक्टूबर 2018 को अंतरिम ज़मानत देने से मना कर दिया…” इसके बाद पीठ ने याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ सभी तरह की सुनवाई को आठ सप्ताह के लिए फ़िलहाल स्थगित करने का आदेश दिया। हालाँकि, यह आदेश देने के कुछ देर बाद अभियोजन ने इस मामले को एक पीठ के समक्ष पेश किया और इस आदेश को वापस लिए जाने की माँग की क्योंकि इस मामले के बारे में कुछ संगत तथ्यों की जानकारी नहीं दी गई थी। इस पर जज ने जो आदेश दिया था उसमें इसको जोड़ते हुए कहा, “…इस मामले को मेरे सामने “15 नवम्बर 2018 को (सही करने/वापस लेने के लिए) अदालत के प्रथम सत्र में प्रथम मामले के रूप में सूचिबद्ध किया जाए और भले ही इसकी आंशिक सुनवाई क्यों न हुई है, ताकि किसी भी मामले से पहलेइसकी सुनवाई हो सके”।  ...

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने उस स्वर्ण अधिनियम 1968 के तहत एक अपील को खारिज कर दिया जिसकी सुनवाई के लंबित रहने के  दौरान उस अधिनियम को ही संसद ने...

 “हमारे समाज ने ‘गुरुओं’ में काफी विश्वास जताया है और लोग उन पर भगवान की तरह ही विश्वास करते हैं और आम तौर पर भक्त इन गुरुओं के प्रति खुद को बिना...

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है की कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत किसी कर्मचारी को मुआवजे के भुगतान पर ब्याज की अदायगी दुर्घटना की तारीख से होनी चाहिए। कोर्ट ने यह...

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी बड़े अपराध में आरोप निर्धारित किए बिना दोषी ठहराने के फैसले को तभी खारिज किया जा सकता है जब आरोपी यह साबित करे कि...

“हमारी राय में संबंधित मामले में कथित अपराध नृशंस तरीके से नहीं हुआ और इसलिए यह विरलों में विरल मामले मामला नहीं है जिसे लिए मौत की सजा दी जाए”।...

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