सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : लिविंग विल और पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत, कहा, जीने के अधिकार में गरिमापूर्ण तरीके से मरने का अधिकार भी शामिल [निर्णय पढ़ें]

सु्प्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु और पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत दे दी। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार में गरिमापूर्ण तरीके से मरने का अधिकार भी शामिल भी शामिल है।

इसके लिए कोर्ट ने गाइडलाइन भी जारी की हैं। कोर्ट ने साफ किया कि केंद्र सरकार के कानून लाने तक ये गाइलाइन प्रभावी रहेंगी।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस  ए के सीकरी, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं।

11 अक्तूबर 2017 को लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु और पैसिव यूथेनेशिया पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

वहीं केंद्र सरकार की ओर से ASG पी एस नरसिम्हा ने इस मुद्दे पर कहा कि ये ड्राफ्ट बिल है। इच्छा मृत्यु पर अभी सरकार सारे पहलुओं पर गौर कर रही है और इस मामले में सुझाव भी मांगे गए हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में इच्छामृत्यु यानी लिविंग विल का विरोध किया।

केंद्र की ओर से पेश ASG पी एस नरसिम्हा ने कहा कि हालांकि सरकार ने भी इच्छामृत्यु के नफे नुकसान पर शोध नहीं किया है लेकिन ये कोई अच्छा आइडिया नहीं होगा। भारत जैसे देश में लिविंग विल सही नहीं है क्योंकि इसके पीछे कानूनी, सामाजिक और धार्मिक कारण हैं।

उन्होंने कहा कि  पैसिव यूथेनेशिया के लिए कुछ सुरक्षा मानकों के साथ ड्राफ्ट बिल तैयार है।अरूणा शॉनबाग में सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के आधार पर पैसिव यूथेनेशिया को मंजूर करते हैं जो कि देश का कानून है। इसके तहत जिला और राज्य स्तर पर मेडिकल बोर्ड ऐसे मामलों में पैसिव यूथेनेशिया पर फैसला लेंगे लेकिन

केंद्र ने कहा इच्छा मृत्यु जिसमें मरीज कहे कि वो अब मेडिकल सपोर्ट नहीं चाहता, उसे मंजूर नहीं किया जा सकता। स्वस्थ रहने पर इच्छामृत्यु की वसीहत को मंजूरी नहीं दी जा सकती जब मरीज कहे कि ऐसे हालात हो जाएं कि कोमा जैसी स्थिति में हो और बचने के हालात ना हों तो उसे मेडिकल सपोर्ट ना दिया जाए।

इच्छामृत्यु को लेकर को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ये भी सवाल उठाया कि क्या किसी व्यक्ति को उसके मर्जी के खिलाफ कृत्रिम सपोर्ट सिस्टम पर जीने को मजूबर कर सकते है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने कहा  कि आजकल मध्यम वर्ग में वृद्ध लोगों को बोझ समझा जाता है ऐसे में इच्छाममृत्यु में कई दिक्कतें हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण वे कहा कि अगर ऐसी स्थिति आ गई कि व्यक्ति बिना सपोर्ट सिस्टम के नही रह सकता तो ऐसे में डॉक्टर की एक टीम का गठन किया जाना चाहिए जो ये तय करे कि क्या बिना कृत्रिम सपोर्ट सिस्टम वो बच सकता है या नही। क्योंकि ये मरीज का अधिकार है कि वो कृत्रिम सपोर्ट सिस्टम लेना चाहता है या नही।

प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि लॉ कमीशन में अपनी रिपोर्ट में कहा कि पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत तो दे सकते है लेकिन लिविंग विल की नही। ये किसी को उसकी इच्छा  बिना जीने के लिए मजबूर करना है।

फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की एक याचिका को संविधान पीठ में भेज दिया था जिसमें ऐसे व्यक्ति की बात की गई थी जो बीमार है और मेडिकल ऑपनियन के मुताबिक उसके बचने की संभावना नहीं है।

तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सदाशिवम की अगवाई वाली बेंच ने ये फैसला NGO कॉमन कॉज की याचिका पर लिया था जिसमें कहा गया था कि एक व्यक्ति मरणांतक बीमारी से पीडित हो तो उसे दिए गए मेडिकल स्पोर्ट को हटाकर पीडा से मुक्ति दी जानी चाहिए जिसे पैसिव यूथेनेशिया कहा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने ज्ञान कौर बनाम पंजाब में कहा था कि इच्छामृत्यु और खुदकुशी दोनों भारत में गैरकानूनी हैं और इसी के साथ दो जजों की बेंच के पी रतिनम बनाम केंद्र सरकार के फैसले को पलट दिया था। कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के जीने के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं है। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अरूणा रामचंद्र शॉनबाग बनाम केंद्र सरकार मामले में कहा कि कोर्ट की कडी निगरानी में आसाधारण परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया दिया जा सकता है।

एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया में अंतर ये होता है कि एक्टिव में मरीज की मृत्यु के लिए कुछ किया जाए जबकि पैसिव यूथेनेशिया में मरीज की जान बचाने के लिए कुछ ना किया जाए।

 

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