चोरी की घटना कैसे लूट बन जाती है? लूट कैसे डकैती बनती है? कानून की इन बारिकियों को समझें

चोरी की घटना कैसे लूट बन जाती है? लूट कैसे डकैती बनती है? कानून की इन बारिकियों को समझें

भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 378 से लेकर धारा 462 तक संपत्ति के विरुद्ध अपराध के संबंध में हैं। अगर कोई अन्य व्यक्ति किसी दूसरे की संपत्ति में किसी तरह का व्यवधान, अवरोध उत्पन्न करता है तो भारतीय दंड संहिता में इसके लिए दंड का प्रावधान है।

भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 378 से लेकर धारा 462 तक संपत्ति के विरुद्ध अपराध के संबंध में हैं। समाज में व्यक्ति अपनी संपत्ति का स्वतंत्र और बिना किसी रोक टोक के इस्तेमाल करना चाहता है। वह अपनी संपत्ति में किसी तरह के बाहरी हस्तक्षेप या रुकावट को पसंद नहीं करता। अगर कोई अन्य व्यक्ति किसी दूसरे की संपत्ति में किसी तरह का व्यवधान, अवरोध उत्पन्न करता है तो भारतीय दंड संंहिता में इसके लिए दंड का प्रावधान है।

किसी संपत्ति के उपयोग, उपभोग में व्यवधान या अवरोध उत्पन्न करने को संपत्ति के विरुद्ध अपराधों के रूप में जाना जाता है। चोरी, लूट, डकैती, आपराधिक न्यास भंग संपत्ति के विरुद्ध गंभीर अपराध के उदाहरण हैं।

हम अगर भारतीद दंड संहिता की धारा 378 से 462 का क्रमवार अध्ययन करें तो पाएंगे कि चोरी, लूट, डकैती जैसे अपराध अनुक्रम में चलते हैं। जैसे चोरी ही कुछ बातों के शामिल होने से लूट बन जाती है और लूट ही कुछ तत्वों के सम्मिलित होने से डकैती बन जाती है। हालांकि लूट और डकैती सीधे भी हो सकती है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 378 में चोरी को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के कब्ज़े में से कोई चल संपत्ति उसकी सम्मति के बिना बेईमानी से ले लेना का आशय रखते हुए हटा लेता है तो कहा जाता है कि उसने चोरी की।

चोरी के तीन आवश्यक तत्व हैं जैसे कि संपत्ति चल (Movable) होनी चाहिए। संपत्ति का उसके स्थान से हटाना आवश्यक है। तीसरा तत्व है कि संपत्ति पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्ज़ा हो।

धारा 378 में चोरी और उसके तत्व में कहीं भी मारपीट, धमकी, डर जैसा कोई तत्व नहीं है।

चोरी कैसे लूट बन जाती है

चोरी और लूट में अंतर है। भारतीय दंड संहिता की धारा 390 में कहा गया है कि सभी प्रकार की लूट में या तो चोरी है या उद्दापन होता है। चोरी कैसे लूट बन जाती है, इसके लिए हमें लूट को समझना होगा।

चोरी लूट है अगर उस चोरी को करने के लिए या उस चोरी से प्राप्त होने वाली संपत्ति को अपने साथ ले जाने के लिए या ले जाने के प्रयत्न में अपराधी उस उद्देशय से या स्वेच्छा से किसी व्यक्ति को मारने का या सदोष अवरोध का भय कारित करता है या ऐसा करने का प्रयास करता है।

याने कि चोरी में जहां धमकी, मारने का भय, जान से मारने का डर जैसे तत्व नहीं थे, वे यहां लूट में पाए जाते हैं। इस तरह चोरी में जब हिंसा के साथ धमकी, सदोष अवरोध और भय जैसे तत्व शामिल हों तो वह लूट बन जाती है।

कई बार ऐसे केस देखने में आते हैं कि पांच से कम लोग कहीं चोरी की नीयत से आए थे, लेकिन संपत्ति के मालिक के देख लेने के बाद चोरों ने मालिक को मारा पीटा और जान से मारने की धमकी दी। हालांकि अपराधियों की इस तरह हिंसा करने या धमकी देने की पूर्व योजना नहीं थी, लेकिन इस चोरी और संपत्ति के मालिक के साथ हिंसा, सदोष अवरोध और धमकी के कारण चोरी अब लूट में बदल जाती है।

डकैती :

इसी तरह जब पांच या पांच से अधिक लोग मिलकर लूट करते हैं तो यह डकैती होती है। डकैती को भारतीय दंड संहिता की धारा 391 में समझाया गया है। इस धारा में कहा गया है कि

जबकि पांच या पांच से अधिक लोग मिलकर लूट करते हैं या लूट करने का प्रयास करते हैं और वे व्यक्ति जो वहां उपस्थित हैं और ऐसी लूट करते हैं या ऐसा करने का प्रयत्न करता है या उसमें मदद करता और उनकी कुल संख्या पांच या अधिक है तो कहा जाता है कि ऐसा हर व्यक्ति डकैती करता है।

इससे स्पष्ट होता है कि पांच या अधिक लोग मिलकर लूट करते हैं तो इसे डकैती कहा जाता है। साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि लूट करने वाले समूह में जैसे ही पांच या पांच से अधिक लोग होते हैं, यह लूट डकैती में बदल जाती है।

कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं,जिनमें चोरी, लूट और डकैती में बदल जाती है। सम्पत्ति के विरुध्द ये अपराध एक अनुक्रम में चलते हैं और एक चोरी लूट में और लूट डकैती में बदल जाती है। हालांकि लूट और डकैती सीधे भी हो सकती है और यह आवश्यक नहीं कि चोरी ही लूट बने और लूट ही डकैती में बदले। दिनदहाड़े लूट की घटनाएं होती हैं। इसी तरह डाकुओं ने पांच या पांच से अधिक के समूह में सुनसान इलाके के घरों में,बस में और ट्रेन में डकैती की। ऐसी कई घटनाएंं सामने आई हैं।