फ्लोर टेस्ट क्या होता है एवं क्या है इसकी उपयोगिता: जानिए सरकार कैसे साबित करती है बहुमत

फ्लोर टेस्ट क्या होता है एवं क्या है इसकी उपयोगिता: जानिए सरकार कैसे साबित करती है बहुमत

महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन एवं उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी (MAV) सरकार, आज राज्य के विधानसभा में एक फ्लोर टेस्ट (Floor Test) का सामना करेगी। हालांकि, महाराष्ट्र के राज्यपाल, भगत सिंह कोश्यारी ने बहुमत साबित करने के लिए उद्धव ठाकरे को 3 दिसंबर तक का वक्त दिया था। गौरतलब है कि एनसीपी नेता दिलीप वालसे पाटिल, जिनके नाम की सिफारिश मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राज्यपाल से की, वे इस दौरान सदन के प्रो-टेम स्पीकर होंगे। प्रो-टेम स्पीकर के पद और कार्य के बारे में जानने के लिए आप यह लेख पढ़ सकते हैं।

फ्लोर टेस्ट क्या होता है?

एक फ्लोर टेस्ट, मुख्य रूप से यह जानने के लिए आयोजित किया जाता है कि क्या वाकई में कार्यपालिका (Executive) को विधायिका (Legislature) का विश्वास प्राप्त है। यह एक संवैधानिक व्यवस्था है, जिसके तहत राज्यपाल द्वारा नियुक्त किये जा चुके एक मुख्यमंत्री को, राज्य की विधान सभा के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए कहा जा सकता है। यह हम जानते हैं कि संविधान के अनुसार, राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है [भारत के संविधान का अनुच्छेद 164(1)]।

जब कोई भी पार्टी/गठबंधन, किसी राज्य के विधायिका सदन के लिए निर्धारित सीटों में से अधिकांश को सुरक्षित करती/करता है, तो राज्यपाल उस पार्टी/गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है। अब यदि उस बहुमत पर सवाल उठाया जाता है, तो बहुमत का दावा करने वाले पार्टी/गठबंधन के नेता को, विश्वास मत हासिल करना होता है (विधायिका का) और विधानसभा में उपस्थित और मतदान करने वालों के बीच अपना बहुमत साबित करना होता है। सदन में बहुमत साबित करने में विफल रहने पर मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है।

दूसरे शब्दों में, फ्लोर टेस्ट सदन में चलने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि क्या मुख्मंत्री की शपथ ले चुके व्यक्ति और उसकी पार्टी/गठबंधन की सरकार को, विधायिका का समर्थन है अथवा नहीं। यह एक पारदर्शी प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया में राज्यपाल की कोई भूमिका एवं हस्ताक्षेप नहीं होता है। सत्ता में बने रहने के लिए, सत्ता पर काबिज पार्टी/गठबंधन के लिए यह बेहद जरुरी होता है कि वह फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित करे। इस प्रक्रिया को ध्वनी मत के माध्यम से, या सदन में प्रत्येक विधायक के वोट को रिकॉर्ड करके अंजाम दिया जा सकता है। बहुमत का यह निर्धारण, विधानसभा की बैठक में किया जाता है, जिसके लिए विधानसभा बैठक बुलाई जाती है।

फ्लोर टेस्ट की अवधारणा एवं आवश्यकता

फ्लोर टेस्ट की अवधारणा प्रथम बार सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1994 में एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ 1994 AIR 1918 के ऐतिहासिक मामले में स्थापित की थी। इस मामले में, यह आरोप लगाया गया था कि बोम्मई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत प्राप्त नहीं है। अदालत ने कहा था कि, जहां भी यह संदेह पैदा होता है कि क्या मंत्रिपरिषद ने सदन का विश्वास खो दिया है, वहां परीक्षण का एकमात्र तरीका, सदन के पटल पर बहुमत प्राप्त करना होता है।

फ्लोर टेस्ट की अहमियत को समझते हुए, चंद्रकांत कावलेकर बनाम भारत संघ (2017) 3 SCC 758 के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिपण्णी थी कि, "फ्लोर टेस्ट के आयोजन से सभी संभावित अस्पष्टताएं दूर हो जाएंगी, और इसके परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आवश्यक विश्वसनीयता मिल जाएगी।" यह गोवा राज्य से जुड़ा मामला था। दरअसल भाजपा ने गोवा विधायिका में निर्धारित 40 में से 13 सीटें जीती थीं, जिसके बाद राज्यपाल द्वारा राज्य में सरकार बनाने के लिए भाजपा के मनोहर पर्रिकर को आमंत्रित किया गया था। उनकी ओर से सरकार बनाने के लिए छोटे दलों के समर्थन का दावा किया गया था।

व्हिप की भूमिका

फ्लोर टेस्ट के पहले, हर एक पार्टी अपने विधायकों को एक व्हिप जारी करती है, कि उन्हें किस पक्ष के लिए वोट करना है। यह निर्णय पार्टी के स्तर पर लिया जाता है, यह देखते हुए कि उसे मौजूदा सरकार का समर्थन करना है या नहीं। यदि कोई विधायक, पार्टी द्वारा जारी व्हिप के खिलाफ जाकर वोट करता है, तो वो अयोग्य करार दिया जा सकता है। दलबदल-विरोधी कानून यह कहता हैं कि एक पार्टी या तो खुद अपने विधायकों को व्हिप जारी कर सकती है या इस उद्देश्य के लिए किसी व्यक्ति या प्राधिकरण को अधिकृत कर सकती है।

कंपोजिट फ्लोर टेस्ट क्या है?

यह फ्लोर टेस्ट का एक प्रकार है। कम्पोजिट फ्लोर टेस्ट, केवल तब आयोजित किया जाता है जब एक से अधिक व्यक्ति सरकार बनाने का दावा करते हैं। जब बहुमत स्पष्ट नहीं होता है, तो राज्यपाल विशेष सत्र बुला सकता है, इस सत्र को बुलाने का उद्देश्य यह देखना होता है कि आखिर बहुमत किसके पास है। वर्तमान में मौजूद सदस्यों द्वारा किये गए मतदान के आधार पर बहुमत की गणना की जाती है। यह ध्वनी मत के माध्यम से भी किया जा सकता है, जहां सदस्य मौखिक रूप से या डिवीजन वोटिंग के माध्यम से जवाब दे सकते हैं।

इस प्रक्रिया में कुछ विधायक अनुपस्थित भी हो सकते हैं, या वोट नहीं देने का विकल्प चुन सकते हैं। डिवीजन वोट के मामले में, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, मतपत्र या पर्ची के माध्यम से मतदान किया जा सकता है। इसके अलावा बैलेट बॉक्स का उपयोग भी मतदान के लिए किया जा सकता है। आमतौर पर यह एक गुप्त वोट होता है - ठीक उसी तरह जैसे राज्य या संसदीय चुनावों के दौरान लोग वोट देते हैं। जाहिर है कि इस पूरी प्रक्रिया के बाद, जिसके पास बहुमत है वह सरकार बनाता है। टाई के मामले में, सदन का स्पीकर अपना निर्णायक वोट डालता है।

उदाहरण के लिए, 24 फरवरी, 1998 को, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में 48 घंटे के भीतर एक कंपोजिट फ्लोर टेस्ट आयोजित करने का आदेश दिया था। ऐसा आदेश यह निर्धारित करने के लिए दिया गया था कि उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा में जगदंबिका पाल या कल्याण सिंह में से आखिर बहुमत किसके पास था।

सदन में बहुमत, ध्वनिमत के अलावा संख्याबल के मुताबिक भी साबित किया जा सकता है, यानी सदन में विधायक, खड़े होकर अपना बहुमत दर्शाते हैं। इसके अलावा लॉबी बंटवारा भी एक तरीका है जिसके जरिये बहुमत दर्शाया जा सकता है, इसके अंतर्गत, सभी विधायक, सदन की लॉबी में आते हैं और रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर करते हैं। 'हां' के लिए अलग लॉबी और 'न' के लिए अलग लॉबी मौजूद होती है।

अंत में, हम फ्लोर टेस्ट की उपयोगिता को ऐसे समझ सकते हैं कि यह विधान सभा ही है जो लोगों की इच्छाओं/आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है, और इसलिए केवल सदन के पटल पर ही यह साबित किया जाना आवश्यक होता है कि बहुमत किसके पक्ष में है, अर्थात सरकार चलाने का अधिकार किसे दिया जाना चाहिए। फ्लोर टेस्ट, एकमात्र उचित तरीका है जिसके जरिये हम सत्ता के उचित हकदार की खोज करते हैं और इस प्रकार से नागरिकों के मतों के साथ, संख्या-बल के मुताबिक न्याय होता है।