चिकित्सा में लापरवाही : योग्यता नहीं होने के लिए कब डॉक्टर को ठहराया जा सकता है ज़िम्मेदार?

चिकित्सा में लापरवाही : योग्यता नहीं होने के लिए कब डॉक्टर को ठहराया जा सकता है ज़िम्मेदार?

विश्वजीत आनंद

दार्शनिक अन्दाज़ में कहें तो ग़लतियों को जीवन का एक अभिन्न हिस्सा कह सकते हैं। अपनी विफलताओं से हम कुछ नया समझते हैं पर जब कोई पेशेवर, ख़ासकर मेडिकल क्षेत्र में काम करने वाला, कोई ग़लती करता है तो बात कुछ और होती है। अगर डॉक्टर कोई ग़लती करता है जिससे मरीज़ को कुछ नुक़सान पहुँचता है तो डॉक्टरों की लापरवाही का मुद्दा उछल जाता है।

प्रसिद्ध न्यायविदों और अदालतों के फ़ैसलों में इस लापरवाही को कई बार बहुत ही अच्छी तरह परिभाषित किया जा चुका है। कुछ लोगों का यह कहना है कि 'यह मानसिक अवस्था है' लेकिन कुछ लोग इसे 'व्यवहार' की श्रेणी में रखते हैं। क्लार्क और लिंडसेल के अनुसार, "क़ानूनी रूप से अपने कर्तव्य से चूकना लापरवाही है। यह किसी भी तरह एक सकारात्मक बात नहीं है। और इसका मानसिक अवस्था से कोई लेना देना नहीं है"। लापरवाही नकारात्मक अवधारणा से कम नहीं है जिसे ग़लत माना गया है और यह पीड़ित व्यक्ति को नुक़सान पहुँचाने से जुड़ा है। पर जब इसका वास्ता मेडिकल प्रैक्टिस से पड़ता है तो यह लापरवाही सामान्य नहीं रह जाती है।

यह कहा जा सकता है कि डॉक्टरों की भूमिका के बारे में जो भ्रांतियाँ हैं उसकी वजह से मेडिकल लापरवाही के विवाद उठ खड़े होते हैं। भावनात्मक उबाल की वजह से कई बार पेशेवर लापरवाही दुखद मेडिकल परिणामों में बदल जाता है।

जेकब मैथ्यूज़ के मामले [(2005) 6 SCC 1] में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर गौर कीजिए :

"कोई मेडिकल प्रैक्टिशनर किसी आपातकालीन स्थिति में मरीज़ के दुखों को दूर करने का भरसक प्रयत्न करता है। लापरवाही बरतने से उसको कुछ प्राप्त नहीं होता है…इसलिए मेडिकल लापरवाही का आरोप शिकायतकर्ता लगाता है और फिर उस मेडिकल प्रैक्टिशनर के ख़िलाफ़ आपराधिक प्रक्रिया शुरू होती है। क़ानूनी कार्रवाई का डर मन में रखकर कोई सर्जन काँपते हाथों से कोई सफल ऑपरेशन नहीं कर सकता और डर से काँपता कोई डॉक्टर अपने मरीज़ को दवा की अंतिम खुराक नहीं पिला सकता।

किसी भी कारण से असफल रहने पर अगर आपराधिक सज़ा पाने का मन में डर हो…तो न एक सर्जन ज़रूरी ऑपरेशन कर किसी मरीज़ की जान बचा सकता है और न ही कोई डॉक्टर अपने मरीज़ की ज़िंदगी बचाने के लिए उसे दवा की खुराक ही दे सकता है…अगर सफलता की उम्मीद महज़ 10% या उसके आसपास है तो एक पेशेवर चिकित्सक को एक बेहद बीमार मरीज़ को अपने हाल पर छोड़ देने की सलाह दी जाएगी न कि अपने मरीज़ को बचाने के क्रम में विफल रहने पर आपराधिक दोषी बताए जाने के मुक़दमे का सामना करना वह पसंद करेगा। अगर डॉक्टरों पर इस तरह की बुज़दिली थोपी गई तो इससे समाज का काफ़ी नुक़सान हो जाएगा"।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संतुलित रुख अपनाया है जो न तो एक सर्जन के किसी मरीज़ के पेट में कैंची छोड़ देने जैसी लापरवाही की अनदेखी की है और न ही मामूली कुशलतावाले मेडिकल प्रैक्टिशनर की लापरवाही को उचित ठहराया है।

मरीज़ के प्रति डॉक्टरों का कर्तव्य

अगर कोई किसी व्यक्ति को मेडिकल सलाह देता है या उसका इलाज करता है तो इसका मतलब यह हुआ कि उसको इस बारे में जानकारी है और ज़रूरी कौशल रखता है। इस तरह के लोगों का मरीज़ों के प्रति कुछ कर्तव्य है - जैसे यह निर्णय लेना कि इलाज की ज़िम्मेदारी उठाई जाए या नहीं; क्या इलाज हो; और अपने देखरेख में उसके इलाज का ख़याल रखने का। इस तरह के किसी भी कर्तव्य का उल्लंघन होने पर मरीज़ लापरवाही की शिकायत के तहत कार्रवाई की माँग कर सकता है। (हाल्सबरीज लॉ ऑफ़ इंग्लैंड, चौथा संस्करण, वोल्यूम 26 एवं बाद में इसे कुसुम शर्मा एवं अन्य बनाम बत्रा अस्पताल एंड मेडिकल रीसर्च सेंटर एवं अन्य, (2010) 3 SCC 480.)

आम बोलचाल की भाषा में लापरवाही को असावधानी, ख़याल रखने में लापरवाही, अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करना आदि माना जाता है । लापरवाही अपना कर्तव्य पूरा नहीं करना है जिसमें अमूमन एक सामान्य व्यक्ति उन बातों को ध्यान में नहीं रखता है जो मानवीय व्यवहारों को निर्देशित करता है या ऐसा कुछ करेगा जो एक समझदार व्यक्ति नहीं करता है। (लॉ ऑफ़ टोर्ट्स, रतनलाल एवं धीरजलाल, सम्पादन जस्टिस जीपी सिंह)। मेडिकल प्रैक्टिसेज के क्षेत्र में जिस तरह की लापरवाहियाँ व्याप्त हैं वह किसी अन्य क्षेत्र से अलग नहीं है।

चिकित्सा लापरवाही के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने मार्टिन एफ डिसूज़ा बनाम मोहमद इशफाक,(AIR 2009 SC 2049) मामले में कहा,

"क़ानून चिकित्सा की तरह ही खरा विज्ञान नहीं है। किसी भी मामले में परिणाम क्या होगा इस बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। यह मामलों के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है और मामले की सुनवाई करने वाले जज की निजी राय पर भी। हालाँकि, मेडिकल लापरवाही के बारे में बोर्ड और सामान्य क़ानूनी सिद्धांत को समझने की ज़रूरत है"। यह मंतव्य मेडिकल लापरवाही से जुड़े ऐसे सभी व्यक्तियों के उत्तरदायित्व और इसके पीछे काम कर रहे क़ानून की प्रकृति को समझने का बोझ बढ़ाता है।

अतिविशिष्ट कौशल की ज़रूरत नहीं है

हुक्स बनाम कोल (1986) 118 New LJ 469 मामले में कहा गया :

"किसी मेडिकल प्रैक्टिशनर को सिर्फ़ इसलिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि मामला इलाज के एक तरीक़े को नहीं चुनकर दूसरे के चुनाव या फ़ैसले में चूक की वजह से बिगड़ गया। किसी मेडिकल प्रैक्टिशनर को तभी ज़िम्मेदार माना जाएगा जब उसका व्यवहार इस क्षेत्र में एक बुद्धि सम्पन्न सक्षम मेडिकल प्रैक्टिशनर के मानदंड से कहीं नीचे रहा है"।

पेशेवर ऐसे लोग होते हैं जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे विशेष कौशल का परिचय देंगे। यह कौशल बहुत ही उच्च कोटि का और दुनिया में सबसे बेहतर हो इसकी उम्मीद नहीं की जाती है। सिर्फ़ एक स्तर के उचित कौशल की उम्मीद की जाती है। एक मेडिकल पेशेवर में जिस हद के कौशल की ज़रूरत होती है वह है, "एक प्रैक्टिशनर का अपना काम अपेक्षाकृत बेहतर कौशल और ज्ञान से करना और आवश्यक रूप से अपेक्षाकृत ज़्यादा सावधानी बरतना"। (हाल्सबरीज लॉज़ ऑफ़ इंग्लैंड)

जब कोई पेशा इस बात को स्वीकार करता है कि व्यवहार का स्वीकृत मानदंड क्या होगा तो वादी के कौशल को इस अहर्ता के मुताबिक़ न्यूनतम रखना चाहिए और इसे मान्य माना जाए। (हाइड एंड असोसीयट्स बनाम जेडी विलियम्स एंड कं. लि., [2001]P.N.L.R).233, CA)

जेकब मैथ्यू के मामले में सुप्रीम कोर्ट के विचार काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं -

"लापरवाही के क़ानून में, वक़ील, डॉक्टर, आर्किटेक्ट और अन्य को ऐसी श्रेणी में रखा गया है जिनके पास विशेष कौशल होता है या जो आम तौर पर कुशल व्यक्ति होते हैं। अगर विशेष कौशल के साथ कोई काम किया जाना है तो इस तरह के काम की ज़िम्मेदारी अमूमन तभी हाथ में लिया जाता है जब वह व्यक्ति इस कार्य को संपादित करने का ज़रूरी कौशल रखता है। कोई भी व्यक्ति जो ऐसे किसी पेशे में प्रवेश करता है जिसमें एक ख़ास स्तर की शिक्षा की ज़रूरत है जिससे उसे उस काम के क्षेत्र का पेशेवर कहा जाएगा, जिसका काम उसने हाथ में लिया है उसको इस बात का आश्वासन देगा कि उसके पास जो कौशल है उसका प्रयोग वह अपेक्षाकृत सावधानी से करेगा। वह अपने क्लाइंट को परिणाम का आश्वासन नहीं देगा। एक वक़ील अपने मुवक्किल को यह आश्वासन नहीं देता कि वह हर हाल में मुक़दमा जीतेगा। एक चिकित्सक मरीज़ को यह आश्वासन नहीं देगा कि वह हर हाल में पूरी तरह ठीक हो जाएगा। एक सर्जन इस बात की गारंटी नहीं देता या दे सकता है कि सर्जरी से अंततः लाभ होगा ही…"।

बोलम के मामले (बोलम बनाम फ्रीएर्न हॉस्पिटल मैनज्मेंट कमिटी) (1957)2)All ER 118) के फ़ैसले में कहा गया कि अगर मेडिकल के लोगों की किसी संस्था के लोग जो इस तरह का कौशल रखते हैं, अगर यह कहते हैं कि डॉक्टर ने इलाज की जो प्रक्रिया अपनाई है वह प्रैक्टिस के अनुरूप और उचित है तो उस डॉक्टर को लापरवाह नहीं कहा जा सकता है भले ही कोई और संगठन इसके ख़िलाफ़ राय क्यों नहीं रखता है।

सामान्य प्रैक्टिस से अलग हटना और दायित्व :

एक डॉक्टर को इलाज के ग़ैर परंपरागत लेकिन स्टैंडर्ड प्रैक्टिस अपनाने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सामान्य प्रैक्टिस से अलग हटना आवश्यक रूप से लापरवाही नहीं है। दायित्व निर्धारण के लिए यह दिखाना ज़रूरी है कि -

(1) अपनाया गया प्रैक्टिस सामान्य है;[aj1]

(2) वादी ने इसे नहीं अपनाया है; और

(3) जो तरीक़ा अपनाया गया है वह ऐसा है जिसे कोई सामान्य रूप से कुशल पेशेवर नहीं अपनाता अगर वह सामान्य रूप से सावधान रहता। (मार्टिन एफ डिसूज़ा बनाम मोहमद इशफाक, AIR 2009 SC 2049)

जैसा कि हंटर बनाम हैन्ली (1955 SLT 213 at 217), में सही कहा गया है, "रोग-पहचान और इलाज के क्षेत्र में राय में वास्तविक अंतर होने की काफ़ी गुंजाइश होती है और कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए लापरवाह नहीं होता क्योंकि उसका निष्कर्ष दूसरे पेशेवर लोगों से अलग है। लापरवाही के निर्धारण की सबसे सच्ची जाँच यह पता करना है कि क्या उसने ऐसी कोई लापरवाही की है जो एक सामान्य कौशल वाला डॉक्टर भी नहीं करेगा अगर वह सामान्य रूप से भी सावधान होता"।

कुछ फ़ैसलों की चुनौतियाँ

कुसुम शर्मा के मामले में (2010) 3 SCC 480) जो क़ानून का निर्धारण हुआ उसके तहत समाज पर मेडिकल पेशेवरों की अनावश्यक रूप से परेशान और अपमानित किए जाने से बचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। मार्टिन एफ डिसूज़ा के मामले में दिए गए फ़ैसले की कुछ बातें हैं :

(1) जज मेडिकल विज्ञान के विशेषज्ञ नहीं होते, बल्कि वे इस बारे में कुछ नहीं जानते। इस वजह से उन्हें चिकित्सा लापरवाही के मामले के बारे में निर्णय लेने में कठिनाई होती है। फिर, जजों को दूसरे डॉक्टरों की राय पर निर्भर रहना पड़ता है और ज़रूरी नहीं कि यह राय हर समय उचित ही हो क्योंकि अन्य सभी पेशों की तरह ही डॉक्टरों में भी अपने पेशे के भाई-बंधुओं की तरफ़दारी की धारणा होती है जिनके ख़िलाफ़ आरोप है। फिर ये क्या कहते हैं उसको समझना भी मेडिकल के बारे में कुछ भी नहीं जानने वाले जज के लिए मुश्किल होता है; और

(2) इस तरह के मामलों में संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत होती है। अपनी लापरवाही से किसी की मौत के ज़िम्मेदार या उसे दुःख पहुँचाने वाले डॉक्टर को दंड मिलना ही चाहिए, पर यह भी अवश्य ही ध्यान रखा जाना चाहिए की हर पेशेवर की तरह डॉक्टर भी ग़लतियाँ कर सकते हैं पर अगर उन्हें इसके लिए दंड दिया गया तो कोई भी डॉक्टर धैर्य से अपना काम नहीं कर पाएगा। डॉक्टरों के ख़िलाफ़ विवेकहीन कार्यवाही और निर्णय का उलटा परिणाम हो सकता है और यह समाज के लिए अच्छा नहीं होगा।

किसी की देखभाल के स्तर को घटना के समय उपलब्ध जानकारी के आलोक में आँकना चाहिए न कि मुक़दमा के समय की स्थिति से। फिर, अगर आरोप यह है कि डॉक्टर ने एक विशेष तरह के उपकरण का प्रयोग नहीं किया तो इस आरोप का कोई मतलब नहीं है अगर यह उपकरण उस समय उपलब्ध नहीं था।

कुछ हालिया बातें

एनसीडीआरसी ने पंकज आर तोपरानी बनाम बॉम्बे हॉस्पिटल एंड रीसर्च एंड मेडिकलस के मामले में डॉक्टरों से मरीज़ को 31 लाख का हर्ज़ाना देने को कहा। आयोग ने कहा कि सर्जरी के बाद भी डॉक्टर की जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती। डॉक्टर और अस्पताल को हर स्तर पर स्पष्ट बताना चाहिए कि किस तरह का इलाज चल रहा है। (श्रीमती सविता गर्ग बनाम निदेशक, नेशनल हार्ट इंस्टिच्यूट (2004) 8 SCC 56)।

हाल ही में मोहन दई ओसवाल कैंसर ट्रीटमेंट एंड रीसर्च फ़ाउंडेशन बनाम प्रशांत सरीन मामले में एनसीडीआरसी ने कहा कि मेडिकल डॉक्टर अपने टीम के सदस्यों के कार्य के लिए ज़िम्मेदार होंगे। वह यह नहीं कह सकता कि वह इसका हिस्सा नहीं है और उसने मरीज़ को कभी कोई दवा नहीं दी।

हाल के एक अन्य फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट के जज एल नागेश्वर राव और संजय किशन कौल ने कहा कि "ग़लत रोग-पहचान मेडिकल लापरवाही का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा यह मामला ग़लत रोग-पहचान का हो सकता है; इसे निश्चित रूप से मेडिकल लापरवाही नहीं कहा जा सकता"।

डॉक्टर मीरा मलिक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मामूली कारणों से किसी डॉक्टर को आपराधिक लापरवाही की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए अगर वह मरीज़ के आश्वासनों को पूरा नहीं कर पाया।

मरीज़-हितैषी अप्रोच : न्यायिक धारणा

अरुण कुमार माँगलिक बनाम चिरायु हेल्थ एंड मेडिकेयर प्रा. लि. एवं अन्य, (2019 3 SCALE 333) के फ़ैसले में आग्रह किया गया कि मरीज़-हितैषी अप्रोच को अपनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि देखभाल के मानदंड को अपनाने के क्रम में भारतीय अदालतों को यह अवश्य ही याद रखना चाहिए कि हमारे देश में भारी संख्या में अस्पताल और मेडिकल यूनिट को, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, नवीनतम तकनीक तक पहुँच नहीं है।

जहाँ तक लापरवाही के बारे में क़ानून की बात है, तो यह पूरी तरह स्थापित है और जब यह मेडिकल लापरवाही की परिधि में आता है तो इसको लेकर अप्रोच विशिष्ट होना चाहिए। मेडिकल लापरवाही की स्थिति में डॉक्टर की निष्ठा विशिष्ट होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अपेक्षित और संतुलित कौशल एकमात्र मानदंड है। फिर, चिकित्सा में, इलाज के बारे में कई सोच हो सकते हैं। इस बारे में राय अलग हो सकती है। हालाँकि, इलाज करते हुए मेडिकल पेशेवर को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह अनुचित नहीं हो। अनुचित क्या है इसको चिकित्सकीय इलाज से जुड़े जोखिम को देखकर तय किया गया है जिसके तहत मेडिकल पेशेवर काम करते हैं। ऐसी स्थिति को टाला जाना चाहिए जहाँ डॉक्टर 'सुरक्षात्मक दवा' देने को बाध्य हो जाएँ ताकि उन पर लापरवाही का इल्ज़ाम न लगे और अमूमन इसका घाटा मरीज़ को होता है। इसलिए अगर किसी विशिष्ट मामले में पेशेवराना कार्य में मामले की परिस्थिति को देखते हुए असंगत होना उचित है, उस स्थिति में पेशेवर को चिकित्सकीय साक्ष्य के दायित्व से सिर्फ़ इसलिए बच नहीं सकता कि किसी संस्था की पेशेवर राय इस बारे में क्या है।