क्या मात्र पीड़ित महिला की गवाही के आधार पर बलात्कार का आरोप सिद्ध किया जा सकता है?

क्या मात्र पीड़ित महिला की गवाही के आधार पर बलात्कार का आरोप सिद्ध किया जा सकता है?

भारतीय कानून का यह स्थापित नियम है कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३७६ के तहत बलात्कार का अपराध, पीड़ित महिला की एकमात्र गवाही (sole testimony) के आधार पर साबित किया जा सकता है जब तक कि सम्पुष्टि (corroborative evidence) के लिए प्रभावशाली कारण न उपलब्ध हो. एक गवाह जिसे घटित घटना की वजह से क्षति पहुंची है, उसे एक मुनासिब गवाह माना जाता है, (बशर्ते वह क्षति उसने स्वयं ना पहुंचायी हो) क्योंकि ऐसा गवाह असली अपराधी को बचाएगा, ऐसी संभावना बहुत कम है. ठीक इसी तरह बलात्कार के अपराध की पीड़ित की गवाही भी एक प्रभावशाली गवाही है, भले ही फिर सम्पुष्टि के लिए साक्ष्य न उपस्थित हो. सम्पुष्टि बलात्कार के मामलों में अनिवार्य नहीं है.

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम आशा राम (AIR 2006 SC 381)
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि-

"यह विधि की निर्धारित स्थिति है कि अभियोक्त्री की एकमात्र गवाही के आधार पर अभियुक्त को दोषी ठहराया जा सकता है. एक अभियोक्त्री का बयान पीड़ित गवाह से ज्यादा विश्वसनीय होता है. एक पीड़ित महिला की गवाही बेहद महत्वपूर्ण गवाही होती है . जब तक कि अकाट्य कारणों की वजह से सम्पुष्टि करने वाले साक्ष्यों की आवश्यकता कोर्ट को न महसूस हो, कोर्ट अभियुक्त को मात्र पीड़ित महिला की गवाही पर दोषी करार दे सकता है अगर उसका बयान भरोसा जगाने वाला विश्वसनीय बयान हो. सम्पुष्टि करने वाले साक्ष्यों की मांग करना कानूनी अनिवार्यता न है बल्कि वह मात्र मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अपनाया गया एक सावधान और विवेक आधारित कदम है. पीड़ित महिला/ अभियोक्त्री का बयान एक पीड़ित गवाह से भी अधिक विश्वसनीय है. अभियोक्त्री के बयान के छोटे-मोटे विरोधाभास और गैर- मामूली विसंगतियाँ एक अन्यथा भरोसे के लायक केस को ख़त्म नहीं कर सकती."

महाराष्ट्र बनाम चंद्रप्रकाश केवलचंद जैन (AIR 1990 SC 658)
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि-

"'साक्ष्य' का मतलब है और उसमें शामिल है, गवाहों द्वारा मामले के तथ्यों के सम्बन्ध में दिए गए वे सभी बयान जिनकी प्रस्तुति की आज्ञा कोर्ट देती है या जिनकी प्रस्तुति की जरुरत कोर्ट को महसूस होती है. धारा ५९ के तहत डाक्यूमेंट्स की विषयवस्तु को छोड़ कर सभी तथ्य मौखिक साक्ष्यों द्वारा साबित किये जा सकते है. धारा ११८ हमें बताती है कि कौन मौखिक साक्ष्य दे सकते है. इस धारा के तहत कोई भी व्यक्ति गवाही दे सकता है, सिवाय तब जब कोर्ट यह मानती हो कि वह व्यक्ति कम उम्र, बुढ़ापे, मानसिक या शारीरिक बीमारी या किसी अन्य कारण से पूछे गए सवालों को नहीं समझ सकता या फिर उनके विवेकपूर्ण रूप से जवाब नहीं दे सकता. यहाँ तक कि एक सह-अपराधी भी धारा १३३ के तहत अभियुक्त के खिलाफ गवाही दे सकता है और मात्र इस आधार पर कि अभियुक्त को सह-अपराधी की असम्पुष्ट गवाही पर दोषी ठहराया गया है, यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा निर्णय कानूनी रूप से गलत है. हालांकि धारा ११४ के दृष्टान्त (ख) (Illustration–b) के तहत एक व्यावहारिक नियम (rule of practice) बताया गया है कि कोर्ट यह उपाधारण कर सकता है ( 'may' presume) कि एक सह- अपराधी विश्वसनीयता के योग्य नहीं है जब तक कि तात्विक विशिष्टियों में उसकी सम्पुष्टि नहीं होती ( unless corroborated in material particulars)। अत: धारा १३३ के तहत यह कानून है कि एक सह-अपराधी सक्षम गवाह/साक्षी है एवं मात्र उसके अकेले बयान पर बिना किसी सम्पुष्टि के अभियुक्त को दोषी सिद्ध किया जा सकता है. ऐसा करना गैर- कानूनी नहीं होगा, हालांकि व्यावहारिक नियम के तौर पर धारा ११४ के दृष्टान्त (ख) के तहत कोर्ट सम्पुष्टि की जरुरत महसूस कर सकती है. धारा १३३ और धारा ११४ के दृष्टान्त (ख) का सामूहिक प्रभाव यही है. "

यौन अपराध की पीड़ित महिला को एक सह-अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता. साक्ष्य विधि यह कहीं नहीं कहती है कि उसका बयान बिना सम्पुष्टि के स्वीकार नहीं किया जा सकता. धारा ११८ के वह निश्चित रूप से एक सक्षम गवाह है और उसके बयान को शारीरिक हिंसा के पीड़ित एक घायल गवाह के बराबर माना जाना चाहिए. उसके बयान को भी उसी सावधानी और एहतियात से देखा जाना चाहिए जिस सावधानी और एहतियात से एक घायल गवाह के बयान को देखा जाता है, उसे इससे अधिक सावधानी की आवश्यकता नहीं है. जरुरत इस बात की है कि कोर्ट इस बात के प्रति जागरूक रहे कि वह एक घायल पीड़ित व्यक्ति जिसने स्वयं अभियोग चालू किया है और जो मामले के फैसले के प्रति अनुरक्त होगा, ऐसे व्यक्ति के बयान को देख रहा है. अगर कोर्ट इस बात की ओर जागरूक है और पीड़ित महिला की गवाही से संतुष्ट महसूस करता है तो ऐसा कोई कानून या व्यावहारिक नियम नहीं है कि कोर्ट को धारा ११४, दृष्टान्त (ख) की तर्ज़ पर सम्पुष्टि करने वाले बयानों की जरुरत है. अगर किसी कारणवश कोर्ट पूर्ण रूप से अभियोक्त्री की असम्पुष्ट गवाही पर विश्वास करने में संशय महसूस करती है तो उसके बयान की सम्पुष्टि के लिए साक्ष्यों की मांग कर सकती है ताकि अभियोक्त्री के बयान पर विश्वास किया जा सके.

अभियोक्त्री के बयान की सम्पुष्टि के लिए कौनसे प्रकृति के साक्ष्यों की आवश्यकता है, यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. पर अगर अभियोक्त्री बालिग़ है और पूरी समझ रखती है तो कोर्ट उसके बयान को आधार बना अभियोक्ता को दोषी करार दे सकती है जब तक कि उसका बयान अविश्वसनीय न हो. अगर मामले की परिस्थितियों को पूर्णरूपेण देखने पर यह प्रकट होता हो कि अभियोक्त्री के पास अभियुक्त के खिलाफ झूठा मामला दयार करने का कोई इरादा नहीं है तब सामान्यत: कोर्ट को उसकी गवाही को स्वीकार करने में कोई संशय नहीं होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने रामेश्वर बनाम राजस्थान राज्य मामले में यह कहा था कि संपुष्टि (corroboration), बलात्कार के मामलों में एक अपरिहार्य आवश्यकता नहीं है। कोर्ट की यह बात 30 साल बीतने के बाद भी एक बार फिरसे दोहरायी जा सकती है।

रामेश्वर मामले में कोर्ट के कथन को 3 दशकों के समय के अंतराल में जस्टिस विवियन बोस के असीम शब्दों में, जिन्होंने इस निर्णय को पीठ की ओर से लिखा और अतीत को बदल के रख दिया, फिर से दोहराया जा सकता है। कोर्ट की ओर से निर्धारित किया गया यह नियम, जो अब कानून में परिवर्तित हो गया है, वह यह नहीं है कि मामले में सजा होने से पहले, संपुष्टि आवश्यक है, बल्कि यह है कि विवेक की आवश्यकता के रूप में, संपुष्टि की आवश्यकता है। हालांकि यह नियम उस मामले में लागू नहीं होगा, जहां न्यायाधीश के मुताबिक, परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि संपुष्टि की आवश्यकता न हो।कानूनी नियम यह है कि निर्णय लेते समय जज या जूरी को सावधानी आधारित इस नियम के प्रति सजग होने चाहिए, यह नियम नहीं है कि अपराध सिद्धि के लिए हर मामले में सम्पुष्टि की ही जाये.

कारण

भरवाड़ा भोगिनभाई हीरजीभाई बनाम गुजरात राज्य (1983 (3) SCC 217)
मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निम्नलिखित बात कही गई-

भारतीय परिस्थितियों में सम्पुष्टि के बिना पीड़ित महिला की गवाही पर एक्शन लेने से मना करना पीड़ित के जख्मों को और अपमानित करने जैसा है. एक महिला या लड़की जो यौन अपराध की शिकायत करती है उसे क्यों शक, अविश्वास और संशय की नज़रों से देखा जाये. ऐसा करना एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दुराग्रहों को उचित ठहरना होगा.

अतिशयोक्ति के भय के बिना यह बात कही जा सकती है कि भारतीय परिस्थितियों में शायद ही कोई महिला यौन शोषण का झूठा मामला दायर करेगी. यह बात गाँवों और शहरों दोनों के लिए लागू होती है. कभी-कभार ही अपवाद इका-दुक्का ऐसे मामले आते है और वो भी अधिकांशत: शहरी अभिजात वर्ग में. क्योंकि-

  • भारतीय पारम्परिक समाज में एक महिला या लड़की ऐसी किसी घटना के बारे में जो उसके शील पर सवाल उठती हो, स्वीकार करने में भी हिचकिचाएगी.
  • वह इस खतरे के बारे में जागरूक होगी कि उसे समाज, अपने खुद के मित्रों, परिवार, रिश्तेदारों की ओर से बहिष्कार झेलना पड़ सकता है.
  • उसे सारे समाज के विरुद्ध बहादूरी दिखानी होगी.
  • उसे अपने परिवार, अपने स्वयं के पति, रिश्तेदारों और वैवाहिक घर का प्यार और सम्मान खोने का जोखिम उठाना होगा.
  • अगर वह विवाहित नहीं है तो उसे एक सम्मानजनक परिवार से उचित रिश्ता पाने में होने वाली मुश्किलों का भी भय होगा.
  • यह सब उसे अपरिहार्य रूप से मानसिक पीड़ा पहुँचायेगा.
  • उपहास का पात्र बनने का भय हमेशा बना रहेगा.
  • एक पारम्परिक समाज में जहाँ सेक्स एक प्रतिबंधित विषय है वहाँ अपने साथ हुई ऐसी घटना के बारे में दूसरों को बताने में उसे काफी संकोच महसूस होगा.
  • प्राकृतिक तौर पर उसका प्रयास यह होगा की मामले को अधिक चर्चा न किया जाये वरना परिवार के नाम और मान-सम्मान को हानि पहुंचेगी.
  • एक अविवाहित महिला के अभिभावक और एक विवाहित महिला के पति और उसके परिवार वाले परिवार के नाम और सम्मान को ठेस पहुंचने से बचाने के लिए घटना के किसी भी प्रकाशन से बचना चाहेंगे.
  • पीड़ित महिला किसी भी प्रकार से स्वयं को गैर-मर्यादित माने जाने से भयभीत होगी हालाँकि उसके साथ हुई घटना में उसकी कोई गलती न हो.
  • पुलिस द्वारा पूछताछ, कोर्ट, विपक्ष के वकील द्वारा क्रॉस एग्जामिनेशन, और फिर विश्वास नहीं कियेजाने का भय - ये सभी एक महिला को मामले को रिपोर्ट करने से रोकते है.

इस सब कारणों के चलते पीड़ित महिला और उसके परिवार वाले मामले की शिकायत कर दोषियों के विरुद्ध उचित कार्यवाही करने से डरते हैं. इसलिए जब इन सब कारणों के बाद भी अगर कोई अभियोग दायर किया जाता है तो संभवत: मामला झूठा नहीं, वास्तविक होगा.

पीड़ित महिला सह-अपराधी नहीं है-

महाराष्ट्र बनाम चंद्रप्रकाश केवलचंद जैन (AIR 1990 SC 658)
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि-

यौन अपराध की पीड़ित महिला को एक सह-अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता. साक्ष्य विधि यह कहीं नहीं कहती है कि उसका बयान बिना सम्पुष्टि के स्वीकार नहीं किया जा सकता. धारा ११८ के वह निश्चित रूप से एक सक्षम गवाह है और उसके बयान को शारीरिक हिंसा के पीड़ित एक घायल गवाह के बराबर माना जाना चाहिए. उसके बयान को भी उसी सावधानी और एहतियात से देखा जाना चाहिए जिस सावधानी और एहतियात से एक घायल गवाह के बयान को देखा जाता है, उसे इससे अधिक सावधानी की आवश्यकता नहीं है. जरुरत इस बात की है कि कोर्ट इस बात के प्रति जागरूक रहे कि वह एक घायल पीड़ित व्यक्ति जिसने स्वयं अभियोग चालू किया है और जो मामले के फैसले के प्रति अनुरक्त होगा, ऐसे व्यक्ति के बयान को देख रहा है. अगर कोर्ट इस बात की ओर जागरूक है और पीड़ित महिला की गवाही से संतुष्ट महसूस करता है तो ऐसा कोई कानून या व्यावहारिक नियम नहीं है कि कोर्ट को धारा ११४, दृष्टान्त (ख) की तर्ज़ पर सम्पुष्टि करने वाले बयानों की जरुरत है. अगर किसी कारणवश कोर्ट पूर्ण रूप से अभियोक्त्री की असम्पुष्ट गवाही पर विश्वास करने में संशय महसूस करती है तो उसके बयान की सम्पुष्टि के लिए साक्ष्यों की मांग कर सकती है ताकि अभियोक्त्री के बयान पर विश्वास किया जा सके. अभियोक्त्री के बयान की सम्पुष्टि के लिए कौनसे प्रकृति के साक्ष्यों की आवश्यकता है, यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. पर अगर अभियोक्त्री बालिग़ है और पूरी समझ रखती है तो कोर्ट उसके बयान को आधार बना अभियोक्ता को दोषी करार दे सकती है जब तक कि उसका बयान अविश्वसनीय न हो. अगर मामले की परिस्थितियों को पूर्णरूपेण देखने पर यह प्रकट होता हो कि अभियोक्त्री के पास अभियुक्त के खिलाफ झूठा मामला दयार करने का कोई इरादा नहीं है तब सामान्यत: कोर्ट को उसकी गवाही को स्वीकार करने में कोई संशय नहीं होना चाहिए.

अभियोक्त्री की गवाही पीड़ित गवाह (injured witness) के बराबर है-

सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में कहा है कि यौन-शोषण, बलात्कार के मामले में पीड़ित महिला की गवाही एक पीड़ित/घायल विटनेस के समान है.

एक गवाह जिसे घटित घटना की वजह से क्षति पहुंची है, उसे एक मुनासिब गवाह माना जाता है, (बशर्ते वह क्षति उसने स्वयं ना पहुंचायी हो) क्योंकि ऐसा गवाह असली अपराधी को बचाएगा, ऐसी संभावना बहुत कम है. ठीक इसी तरह बलात्कार के अपराध की पीड़ित की गवाही भी एक प्रभावशाली गवाही है, भले ही फिर सम्पुष्टि के लिए साक्ष्य न उपस्थित हो. शारीरिक हिंसा के मामलों में प्रत्यक्षदर्शी गवाह द्वारा सम्पुष्टि संभव हो सकती है, पर बलात्कार के मामलों में अपराध के प्रकृति को देखते हुए प्रत्यक्षदर्शी गवाह की संभावना कम है. अत: पश्चिमी देशों के कोर्ट द्वारा बनाये गए नियम की देखा-देख एक पीड़ित महिला की गवाही की सम्पुष्टि की माँग करना पीड़ित महिला के जख्मों का और अपमान करने जैसा होगा. इस नियम को एक आदत की तरह अनुसरण करना शायद औपनिवेशिक सोच का नतीजा है.

गौण या छोटे-मोटे विरोधाभास पीड़ित महिला की गवाही के लिए महत्वपूर्ण नहीं है-

पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह (1996 (2) SCC 384
) सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु बताये कि –

बलात्कार मात्र शारीरिक हिंसा नहीं है बल्कि वह पीड़ित महिला के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ठेस पहुँचाता है. एक हत्यारा पीड़ित के शरीर को चोट पहुँचाता है, जबकि बलात्कार एक असहाय महिला की आत्मा को ठेस पहुँचाता है. अत: कोर्ट को बलात्कार के मामलों में बहुत जिम्मेदारी के साथ देखना चाहिए. कोर्ट को इन मामलों को पूरी संवेदनशीलता के साथ संभालना चाहिए. कोर्ट को मामले की संभावनाओं को पूर्णरूपेण देखना चाहिए. गौण या छोटे-मोटे विरोधाभास जो मामले को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करते, मात्र उनके आधार पर एक अन्यथा विश्वसनीय मामले को अविश्वसनीय करार नहीं दिया जा सकता. अगर अभियोक्त्री की गवाही विश्वास जगाती हो तो बिना सम्पुष्टि के भी उसकी गवाही पर भरोसा किया जा सकता है. और इसी कारण के आधार पर अगर अभियोक्त्री की गवाही विश्वास नहीं जगाती तो कोर्ट सम्पुष्टि के लिए और साक्ष्य माँग सकती है. अभियोक्त्री की गवाही पूरे मामले के परिप्रेक्ष्य को देखते हुए स्वीकार या अस्वीकार की जानी चाहिए. यौन हिंसा के मामलों को कोर्ट को पूर्ण जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ देखना चाहिए.

पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि साक्ष्यों का मूल्यांकन करते समय कोर्ट को इस बात के प्रति जागरूक रहना होगा कि कोई भी आत्म-सम्मान रखने वाली महिला स्वयं अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ अपने पर बलात्कार जैसी अपमानजनक बात नहीं करेगी. गौण या छोटे-मोटे विरोधाभास जो मामले को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करते, मात्र उनके आधार पर एक अन्यथा विश्वसनीय मामले को अविश्वसनीय करार नहीं दिया जा सकता. महिलाओं का सामान्यत: संकोची स्वभाव और यौन हिंसा छुपाने की उनकी प्रवृति को कोर्ट को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

सम्पुष्टि (Corroboration) कब जरुरी है?

यह कानून की स्थापित स्थिति है कि सम्पुष्टि कानून की एक अपरिहार्य जरुरत नहीं है, बल्कि यह सावधानी और विवेक आधारित एक व्यावहारिक नियम है. (हिमाचल प्रदेश बनाम आशा राम 2006 SC 381 : 2006 SCC (Cri) 296)

भरवाड़ा भोगिनभाई हीरजीभाई बनाम गुजरात राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निम्नलिखित बात कही गई-

"हमारा अत: यह मत है कि पीड़ित की गवाही किसी आधारभूत असक्षमता से नहीं ग्रसित है, वह संभावनाओं के आधार पर अविश्वसनीय नहीं करार दी जा सकती. सामान्यत: मेडिकल साक्ष्यों को छोड़कर (उन स्थितियों में जहाँ मेडिकल साक्ष्य संभव है) किसी तरह की सम्पुष्टि की आवश्यकता नहीं है. हालांकि एक प्रतिबंधता निम्नलिखित है-

"संपुष्टि की मांग तब की जा सकती है जब महिला गैर-मुनासिब स्थिति में मिली हो, तब हो सकता है कि महिला ने आत्म-रक्षण की दृष्टि से आरोप लगाए हो. या फिर जब "संभावना आधारित" कारक नहीं हो."

सदाशिव राव माधव राव हड़बे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2006 (10) SCC 92) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि एकमात्र पीड़ित महिला की गवाही पर भी भरोसा किया जा सकता है अगर गवाही कोर्ट का कॉन्फिडेंस जगा सके:

"यह सत्य है कि बलात्कार के मामले में अभियुक्त को मात्र अभियोक्त्री की गवाही के आधार पर दोषी करार दिया जा सकता है. पर अगर अभियोक्त्री का बयान किसी मेडिकल साक्ष्य में समर्थन नहीं पाता है और मामले की पूर्ण परिस्थितियों को देखते हुए अभियोक्त्री का बयान संभव नहीं प्रतीत होता तो कोर्ट को मात्र अभियोक्त्री के बयान पर एक्शन नहीं लेना चाहिए. कोर्ट को, उन मामलों में जहाँ पूरा मामला असंभव सा लगे, बेहद सावधानीपूर्वक अभियोक्त्री की गवाही पर भरोसा करना चाहिए.

अदालतों द्वारा क्या टेस्ट लगाया जाए ?

क्यों एक महिला या लड़की जो बलात्कार या यौन हिंसा का आरोप लगाती है, उसके बयान को अविश्वास व संदेह के साथ देखा जाना चाहिए? कोर्ट सबूतों का मूल्यांकन करते समय पीड़ित महिला के बयान दृढ करने वाले कुछ सबूतों को देख सकती है ताकि जुडिशियल माइंड संतुष्ट हो सके पर कानूनन ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि अभियुक्त को दोषी साबित करने के लिए corroborative evidence अनिवार्य रूप से पेश किये जाए. यौन शोषण से पीड़ित महिला की गवाही पीड़ित गवाह (injured witness) के समान ही होती है, बल्कि कई बार उससे अधिक भरोसे के लायक होती है.

सम्पुष्टि की जरुरत कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है बल्कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अपनाया गया एक सावधान और विवेक आधारित कदम है. यह ध्यान रखने योग्य बात है कि यौन अपराध की पीड़ित महिला बलात्कार के अपराध की सह- अपराधी नहीं है, बल्कि वह एक अन्य व्यक्ति की हवस की पीड़ित महिला है. यह पूर्णत: अवांछित और अनुचित होगा अगर पीड़ित महिला को सह-अपराधी की तरह देखा जाये और उसके बयान को संदेहपूर्ण नज़रों से देखा जाये. किसी भी तरह का निर्णय मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यथार्थवादी विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए. एक प्रकार की सार्वभौमिकता अगर हर मामले में लगाई जाये तो न्याय के विरुद्ध एक साक्ष्य आधारित निरंकुशता पैदा होगी. कोर्ट सम्पुष्टि की जरुरत को जबरन पकड़ कर नहीं बैठ सकते अगर अभियोक्त्री की गवाही से कोर्ट का विश्वास जागृत होता है. (रंजीत हज़ारिका बनाम असम राज्य (1998) 8 SCC 635)

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दी गयी एहतियात –

सुप्रीम कोर्ट ने राजू बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2008 (15) SCC 133) में कहा कि सामान्यत: पीड़ित महिला की गवाही को संदेहास्पद न मान कर, उस पर भरोसा किया जाना चाहिए। उसके बयान को एक पीड़ित गवाह के बराबर मानना चाहिए, अगर उसका बयान भरोसे के लायक है तो उसके बयान की सम्पुष्टि करवाना जरुरी नहीं है. पर यह सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से नहीं लागू किया जा सकता. इस नियम को यंत्रवत लागू करने के बजाय हर मामले के तथ्यों और परिस्थितयों को ध्यान में रख कर लागू किया जाना चाहिए.

"इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि बलात्कार पीड़ित महिला को भारी आघात/हानि पहुंचाता है, पर एक झूठा मामला भी उसी तरह की हानि पहुंचा सकता है. यह जरुरी है कि अभियुक्तों को झूठे मामलों से बचाया जाये, खासकर उन मामलों में जहाँ बहुत से अभियुक्तों पर मामला हो. यह ध्यान में रखना चाहिए कि मूल रूप से सिद्धांत यह है कि पीड़ित गवाह घटना के दौरान उपस्थित था और सामान्यत: वह वास्तविक अपराधियों के बारे में झूठ नहीं बोलेगा पर यह नहीं माना जा सकता कि ऐसे गवाह का बयान हमेशा सच होगा या फिर बिना बढ़ा-चढ़ा कर दिया गया होगा."