कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ [भाग २]- क्या है लोकल कंप्लेंट कमिटी और इंटरनल कंप्लेंट कमिटी ?

कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ [भाग २]- क्या है लोकल कंप्लेंट कमिटी और इंटरनल कंप्लेंट कमिटी ?

पिछले लेख (कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ भाग-१) में हमने लैंगिक उत्पीड़न का महिलाओं के मूल अधिकारों पर प्रभाव, लैंगिक उत्पीड़न क्या है- ये जाना. आज के लेख में हम असंगठित क्षेत्र और लैंगिक उत्पीड़न के लिए २०१३ एक्ट में दी गयी मशीनरी के बारे में जानेंगे.

जैसा कि हमने पिछले भाग में भी देखा था कि २०१३ का अधिनियम संगठित और असंगठित दोनों के क्षेत्रों में यौन शोषण के विरुद्ध कार्यवाही हेतु कानूनी मशीनरी उपलब्ध करवाता है. असंगठित क्षेत्र में यौन शोषण की शिकायतें मुख्यत: लोकल कंप्लेंट कमिटी द्वारा सुनी जाती है जिसे जिला प्रशासन द्वारा स्थापित किया जाता है वही संगठित क्षेत्रों के लिए सम्बंधित नियुक्ता (employer) अपनी संस्था में ही एक कमिटी का गठन करता है जिसे आतंरिक परिवाद कमिटी या ICC कहा जाता है. यह दो तरह की समितियों के सम्बन्ध में कानूनी व्यवस्था करने का यह उद्देश्य था कि कोई भी वर्किंग वीमेन इस अधिनियम से बाहर न हो, फिर चाहे वह संगठित क्षेत्र में हो या असंगठित क्षेत्र में.

आज के लेख में हम इन्हीं दोनों कमिटियों के बारे में जानेंगे. पर उससे पहले एक परिभाषा जिस पर पिछले भाग में चर्चा रह गयी थी, उस पर बात करेंगे., वह है कार्यस्थल की परिभाषा.

कार्य स्थल में कौन कौन से स्थान शामिल है?

2013 के एक्ट को समझने के लिए यह समझना जरुरी है कि एक्ट में 'कार्यस्थल' की क्या परिभाषा है क्योंकि यदि लैंगिक शोषण कार्यस्थल पर नहीं हुआ है तो २०१३ का एक्ट लागू नहीं होगा और मामला ICC/LCC के पास नहीं ले जाया जा सकता. २०१३ के एक्ट के तहत 'कार्यस्थल' को व्यापक रूप में परिभाषित किया गया है. अधिनियम की धारा २(o) के तहत न केवल ऑफिस बल्कि वह सभी जगहें जहाँ महिला कर्मचारी कार्य के सम्बन्ध में जा रही है, 'कार्यस्थल' की परिभाषा में शामिल है.

उदाहरण के तौर पर एक कंपनी, महिला कर्मचारी को एक ग्राहक के कुछ जरुरी कागज़ात लेने उस ग्राहक के ऑफिस भेजती है और उस दौरान महिला के साथ अगर शोषण होता है तो इसे भी कार्यस्थल पर यौन शोषण माना जाएगा क्योंकि वह महिला उस दूसरे ऑफिस में ऑफिस के कार्य के सम्बन्ध में गयी थी. मुख्य बात बस यह है कि महिला कार्य के सम्बन्ध में गयी हो.

ग्राहक के ऑफिस पहुँचने के दौरान अगर ट्रेवल के दौरान भी शोषण होता है तो वह मामला भी उसके ऑफिस की ICC के पास जाने योग्य है.

कार्यस्थल के सन्दर्भ में यह बात भी गौर करने लायक है कि यह जरुरी नहीं की पीड़ित महिला कर्मचारी ही हो. ऊपर लिखे उदाहरण से समझते है. उपर्युक्त मामले में महिला उस ग्राहक के ऑफिस की ICC में भी कंप्लेंट कर सकती है क्योंकि यह जरुरी नहीं पीड़ित महिला उस ऑफिस की कर्मचारी ही हो. अगर कोई महिला एक ग्राहक के तौर पर या अन्य किसी कारण से अगर किसी कार्यस्थल पर जाती है और यौन शोषण झेलती है तो वह उस ऑफिस की ICC में शिकायत कर सकती है.

लोकल कंप्लेंट कमिटी और ICC में कौन-कौन से मामले प्रस्तुत किये जा सकते है?

वापस दोनों समितियों की ओर लौटते है और सर्वप्रथम यह समझते है कि कौनसी समिति कौनसे- कौनसे मामले सुनती है. ICC मुख्यत: हर संस्था/ कंपनी अपने स्तर पर आतंरिक रूप से बनाती है जो संस्था/कंपनी में होने वाले यौन शोषणों के मामलों को सुनती है, वही लोकल कंप्लेंट कमिटी जिला प्रशासन द्वारा बनाई गयी कमिटी है जो संस्था विशेष के मामले नहीं सुनती बल्कि निम्नलिखित मामले सुनती है (अधिनियम की धारा ६(१) के तहत) -

१. उन कार्यस्थलों से सम्बंधित मामले जहाँ पर आतंरिक परिवाद कमिटी (ICC) नहीं बनाई गई है.

२. उन कार्यस्थलों से सम्बंधित मामले जहाँ १० से कम कर्मचारी कार्यरत है.

३. जहाँ शिकायत स्वयं एम्प्लायर के खिलाफ है.

४. घरेलु कर्मचारी (domestic workers) की शिकायत के मामलों में.

लोकल कंप्लेंट कमिटी (स्थानीय परिवाद समिति) में कौन-कौन सदस्य होते है?

अधिनियम की धारा ६(१) के तहत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ( किस अधिनियम के तहत डिस्ट्रिक्ट ऑफिसर कहा गया है) का यह कर्तव्य है कि वह अपने जिले में लोकल कंप्लेंट समिति की निम्नलिखित सदस्यों के साथ स्थापना करें-

१. एक महिला चेयरपर्सन जो महिला अधिकारों के क्षत्र में प्रतिबद्ध हो.

२. एक सदस्य महिला जो जिले में ब्लॉक/ ताल्लुक/ तहसील/ वार्ड या नगरपालिका स्तर पर कार्यरत है.

३. दो सदस्य (जिनमें से एक महिला होगी) जो ऐसे एनजीओ या संस्थाओं से जुड़े है जो महिला अधिकारों के लिए कार्यरत हो.

४. जिले का महिला और बाल कल्याण अधिकारी सदस्य पदेन होगा.

कमिटी में कम से कम एक सदस्य अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति से होना चाहिए.

गौरतलब है कि डिस्ट्रिक्ट ऑफिसर का यह भी कर्तव्य है कि वह ग्रामीण और आदिवसीय क्षेत्रों में हर ब्लॉक, तालुका और तहसील स्तर पर और हर शहरी क्षेत्र में हर वार्ड और मुन्सिपलिटी स्तर पर शिकायत दर्ज़ करवाने और उसे सम्बंधित लोकल कंप्लेंट कमिटी तक पहुंचाने के लिए एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति करें.

आतंरिक परिवाद समिति (Internal Complaints Committee- ICC ) में कौन-कौन सदस्य होते है?

अधिनियम की धारा ४ के तहत, हर संस्था/कंपनी जहाँ १० से अधिक व्यक्ति कार्यरत हो , के लिए यह अनिवार्य है कि वह एक आतंरिक परिवाद समिति (ICC)का गठन करे. अगर मान लिया जाये कि कंपनी/ संस्था के कई स्तर पर ऑफिस है तो ICC का गठन हर स्तर पर किया जाना चाहिए. नियुक्ता (employer) निम्न सदस्यों को समिति में नॉमिनेट करता है-

१. पीठासीन अधिकारी जो सीनियर लेवल की महिला कर्मचारी होती है.

२. २ अन्य कर्मचारी जो महिला अधिकारों के सन्दर्भ में जानकारी रखते हो और ऐसे मुद्दों के प्रति समर्पित हो.

3. एक सदस्य बाहरी व्यक्ति होता है जो महिला मुद्दों पर काम कर रहे NGO से जुड़ा व्यक्ति होता है

ICC के कम से कम आधे सदस्य महिलाएँ होनी चाहिए.

यह employer की कानूनी ड्यूटी है कि वह अपनी संस्था/ कंपनी में ICC का गठन करें. ऐसा न कर पाने पर वह अधिनियम की धारा २६(१) के तहत दंड का हक़दार है. अगर एक employer, ICC का गठन नहीं करता है तो उसका लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है.

इस सम्बन्ध में धारा २६ के तहत employer के कुछ कर्तव्य निर्धारित किये गए है. हर employer का यह कर्तव्य है कि यौन शोषण की रोकथाम के सम्बन्ध में अपनी संस्था/कम्पनी में वर्कशॉप, ट्रेनिंग आदि करवाए. का यह भी कर्तव्य है कि के बारे में कर्मचारियों को समुचित जानकारी उपलब्ध करवाए.

२०१३ के अधिनियम पर किये गए शोधों में यह बात मालूम हो रही है कि अधिनियम मुनासिब तौर पर लागू नहीं किया जा सका है. कई जिलों और कई संस्थाओं में यौन शोषण के विरुद्ध कमिटियों का गठन नहीं किया गया है. ऐसे में कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा और महिला अधिकारों का सवाल आज भी बना हुआ है.

(अगले लेख में हम यह जानेंगे कि यह कमिटियां शिकायत मिलने पर किस तरह कार्यवाही करती है).