जांच शुरू करने में 13 साल की अकारण देरी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई को बाधित किया, पढ़िए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

जांच शुरू करने में 13 साल की अकारण देरी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई को बाधित किया, पढ़िए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 साल पूर्व हुए दुर्व्यवहार के मामले में एक सरकारी कर्मचारी को राहत दी है। इस कर्मचारी के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने में 13 साल लग गए। अदालत ने इस देरी को असंगत, अनुचित और ऐसी प्रकृति का बताया जिसकी वजह से अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया बिगड़ गई।

वर्तमान मामले में दिल्ली विद्युत आपूर्ति अंडर्टेकिंग (एक पूर्व कम्पनी) में मीटर की रीडिंग लेने का काम करनेवाले इस कर्मचारी (याचिकाकर्ता) के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई घटना के 13 साल बाद शुरू की गई।

जांच अधिकारी ने कर्मचारी को दोषी नहीं पाया और इसलिए उसके ख़िलाफ़ किसी तरह की कार्रवाई का आधार उसे नहीं मिला पर अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने जांच अधिकारी के निष्कर्ष को अनदेखा किया और कर्मचारी को दंडित करने की दिशा में आगे बढ़ा। जब आयुक्त को इसकी शिकायत की गई तो दंड को कम कर दिया गया पर अनुशासनात्मक अथॉरिटी के निर्णय को सही बताया गया। इसके बाद कर्मचारी ने हाईकोर्ट में अपील की।

प्रतिवादी के वकील ने एके बिंदल बनाम यूओआई (2003) 5 SCC मामले पर भरोसा जताया। याचिकाकर्ता ने कहा कि उसके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई और कारण बताओ नोटिस जारी करने में हुई देरी से उसे कई तरह के रोज़गार लाभों से वंचित होना पड़ा और उसे इन सबका भुगतान किया जाना चाहिए। अदालत ने अपने फ़ैसले के लिए यूओआई बनाम युवराज गुप्ता एवं अन्य MANU/DE/3605/2015 को आधार बनाया।

न्यायमूर्ति कैत की एकल पीठ ने कहा कि अनुशासनात्मक अथॉरिटी को जाँच अधिकारी से अलग राय रखने का कोई कारण नहीं था जिसने याचिकाकर्ता को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी थी। अदालत ने अपीली प्रक्रिया की भी आलोचना की और कहा कि वह याचिकाकर्ता की विभागीय अपील के तहत उसकी अर्ज़ी पर ग़ौर करने में विफल रहा। अदालत ने कहा कि अपीली अथॉरिटी ने जो आदेश पास किया है, लगता है उसमें किसी तरह से बुद्धि का प्रयोग नहीं किया गया है। अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ जारी सभी कारण बाओ नोटिसों को रद्द कर दिया।