सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा, ,सड़क यातायात के अपराध को आईपीसी और मोटर वाहन अधिनियम दोनों के तहत अभियोजित किया जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा, ,सड़क यातायात के अपराध को आईपीसी और मोटर वाहन अधिनियम दोनों के तहत अभियोजित किया जा सकता है

''इस तरह की व्याख्या के परिणाम यह होंगे कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकल सकेगा।''

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सड़क यातायात के अपराधों पर मोटर वाहन अधिनियम और भारतीय दंड संहिता दोनों के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।

न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति खन्ना की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट द्वारा असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश राज्य को जारी निर्देशों को रद्द कर दिया है। इन निर्देशों में हाईकोर्ट ने कहा था कि सड़क यातायात अपराधों के मामले में कार्रवाई केवल मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के तहत की जाए, न कि भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत।

गुवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट के अनुसार, एम.वी. अधिनियम का स्टेटस आईसीपी के समान है (दोनों को समवर्ती सूची में रखा गया है), और यह नहीं माना जा सकता है कि मोटर व्हीकल एक्ट (एम.वी) अधिनियम या तो अधीनस्थ कानून है, या स्टेटस के मामले में आईपीसी और सीआरपीसी से किसी तरह कमतर है। यह भी कहा गया है कि आईपीसी की धारा 5 में विशेष कानूनों की सर्वोच्चता को मान्यता दी गई है, जिसे सामान्य खंड अधिनियम, 1897 की धारा 26 की आड़ में हल्का नहीं किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि किसी व्यक्ति को लापरवाही और खतरनाक तरीके से मोटर वाहन चलाते समय किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुंचाने के मामले में अगर एमवी एक्ट के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, तो उस अपराधी को आईपीसी के तहत भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

चूंकि आईपीसी स्पष्ट रूप से सड़क यातायात के अपराधों को अपने दायरे में नहीं लेता है। हाईकोर्ट ने इस फैसले में असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों को निर्देश दिया था और सभी अधीनस्थ अधिकारियों को उचित निर्देश जारी करते हुए कहा था कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं के अपराधियों के खिलाफ केवल एम.वी एक्ट के तहत केस दर्ज किए जाएं, आईपीसी की धारा 304 के तहत दिए गए अपवादों को छोड़कर। त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस फैसले को चुनौती दी थी।

अरुणाचल प्रदेश राज्य बनाम रामचंद्र रबीदास / रतन रबीदास, मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने देखा कि एम.वी अधिनियम के अध्याय आठ के तहत किए गए अपराध, आईपीसी की धारा 297, 304, 304ए, 337 और 338 के तहत प्रावधानों की प्रयोज्यता या उपयुक्तता को रद्द या निरस्त नहीं कर सकते हैं। यह भी पाया गया कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं से संबंधित अपराध के मामलों में एमवी एक्ट के तहत या अन्यथा ऐसी कोई रोक नहीं है कि इन अपराधों के लिए आईपीसी के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन

खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा की गई व्याख्या के परिणाम यह होंगे कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा और उसे अपने अपराध के लिए किसी भी अभियोजन या मुकदमें का सामना नहीं करना पड़ेगा।

इस निर्णय में किए गए महत्वपूर्ण अवलोकन निम्नलिखित हैं।

आईपीसी और एमवी अधिनियम के प्रावधानों के बीच कोई मतभेद या विरोधाभास या टकराव नहीं है। पीठ ने दोनों अधिनियमों के प्रावधानों का जिक्र करते हुए कहा कि वे पूरी तरह से अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं।

दोनों कानून पूरी तरह से अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं। दोनों कानूनों के तहत बताए गए अपराध एक दूसरे से पृथक है और एक दूसरे से अलग हैं। दोनों विधियों के तहत प्रदान किए गए दंडात्मक परिणाम भी एक दूसरे से स्वतंत्र और अलग हैं।

जैसा कि पहले चर्चा की गई है, दोनों कानूनों के तहत अपराधों की सामग्री या तथ्य भी अलग-अलग हैं, और एक अपराधी पर दोनों कानूनों के तहत स्वतंत्र रूप से केस चलाया जा सकता है और उसे दंडित किया जा सकता है। यह सिद्धांत कि ,विशेष कानून को सामान्य कानून पर हावी या प्रबल होना चाहिए, आईपीसी और एम.वी.एक्ट के तहत सड़क दुर्घटनाओं के मामले में अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के मामलों में लागू नहीं होता है।

एमवी एक्ट में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जिसके तहत मौत व गंभीर चोट आदि के अपराधों से निपटा जा सके।

एम.वी एक्ट के तहत कोई ऐसा प्रावधान नहीं है, जो अलग से मोटर वाहन दुर्घटनाओं के मामलों में मोटर वाहन से हुई मौत, या गंभीर चोट या चोट के मामलों से निपट सकें। तेज व लापरवाही से ड्राइविंग करते समय हुई लोगों की मृत्यु, या चोट, या गंभीर चोट के मामले में एम.वी एक्ट का अध्याय आठ मूक है। न ही इस अध्याय में इस तरह के मामलों के लिए अलग से किसी सजा के बारे में कुछ बताया गया है। जबकि आईपीसी की धारा 279, 304 पार्ट-दो, 304ए, 337 और 338 को ऐसे अपराधों से निपटने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है।

यदि आईपीसी एम.वी अधिनियम के लिए रास्ता दे देता है, और सीआरपीसी के प्रावधान एम.वी अधिनियम के प्रावधानों के तहत दब जाते हैं, जैसा कि हाईकोर्ट ने माना है तो ऐसी स्थिति में तेज व लापरवाही से वाहन चलाते समय हुई मौत, गैर इरादतन हत्या ¼, ½ गैर इरादतन हत्या , या गंभीर चोट, या सामान्य चोट आदि के मामले कंपाउंडेबल हो जाएंगे। इस तरह की व्याख्या के परिणाम यह होंगे कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा और उसे अपने अपराध के लिए किसी भी अभियोजन या मुकदमे का सामना नहीं करना पड़ेगा। अपराध और सजा के बीच आनुपातिकता के सिद्धांत को ध्यान में रखना होगा।

आईपीसी में सजा कड़ी

पीठ ने कहा कि सिर्फ सजा का सिद्धांत, एक आपराधिक अपराध के संबंध में सजा का आधार है। एम.वी अधिनियम के अध्याय आठ के तहत पहली बार अपराध के लिए अधिकतम कारावास केवल छह महीने तक है, जबकि सड़क यातायात अपराधों के संबंध में आईपीसी के तहत पहली बार अपराध करने पर अधिकतम कारावास की सजा आईपीसी की धारा 304 भाग दो के तहत 10 साल तक हो सकती है।

अदालतों द्वारा दी जाने वाली सजा को अपराध की गंभीरता के साथ सराहा जाना चाहिए और गलत काम करने वालों पर इसका प्रभाव कड़ा होना चाहिए। अगर एम.वी अधिनियम से तुलना करें तो आईपीसी के तहत मोटर वाहन दुर्घटनाओं के अपराधियों की सजा कठोर है और अपराध के लिए आनुपातिक है। इस तरह की व्याख्या के परिणाम यह होंगे कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकल सकेगा।

अदालत ने यह भी कहा, कि एम.वी अधिनियम के अध्याय आठ के तहत किए गए अपराध अपनी प्रकृति के अनुरूप एम.वी अधिनियम की धारा 208 (3) के मद्देनजर कंपाउंडेबल हैं। जबकि धारा 279, 304 भाग-दो और 304ए आईपीसी के तहत अपराध कंपाउंडेबल नहीं हैं।

अदालत ने कहा कि-

"यदि आईपीसी एम.वी अधिनियम के लिए रास्ता दे देता है, और सीआरपीसी के प्रावधान एम.वी अधिनियम के प्रावधानों के तहत दब जाते हैं/अधीन हो जाते हैं,जैसा कि हाईकोर्ट ने माना है तो ऐसी स्थिति में तेज व लापरवाही से वाहन चलाते समय हुई मौत,गैर इरादतन हत्या ¼, ½ गैर इरादतन हत्या, या गंभीर चोट, या सरल चोट आदि के मामले कंपाउंडेबल हो जाऐंगे। इस तरह की व्याख्या के परिणाम यह होंगे कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा और उसे अपने अपराध के लिए किसी भी अभियोजन या मुकदमें का सामना नहीं करना पड़ेगा। "