पीड़ित नहीं दायर कर सकता बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला

पीड़ित नहीं दायर कर सकता बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दोहराया कि उन मामलों में पुनरीक्षण याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता, जिनमें अपील दायर की जा सकती है। साथ ही यह भी माना है कि बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ पीड़ित द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित एक फैसले के खिलाफ कई सारी पुनरीक्षण याचिकाएं दायर की गई थी। इस फैसले में सेशन कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें आरोपी को दोषी करार दिया गया था। साथ ही सेशन कोर्ट ने अभियुक्त-प्रतिवादी को सार्वजनिक रूप से अश्लील कृत्यों में लिप्त होने के मामले में आईपीसी की धारा 294 के तहत बरी कर दिया था।

याचिकाकर्ता, डॉ पवन कुमार तिवारी ने दलील दी कि इस मामले में कड़ा रुख अपनाए जाने की जरूरत है क्योंकि आरोपी-प्रतिवादी एक शैक्षणिक संस्थान में प्रोफेसर थे, जिसने उनके कमरे में प्रवेश किया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया।

याचिकाकर्ता ने दलील दी,''... जब आरोपी शिक्षा देने वाले व्यक्ति होते हैं तो ऐसे मामले को पूरी गंभीरता के साथ देखा जाना चाहिए और वर्तमान मामले में, इस तरह के गंभीर दृष्टिकोण को नहीं अपनाया गया है, इसलिए न्यायालय के उचित अधिकार क्षेत्र का आह्वान किया जाता है।''

न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने मामले की खूबियों या गुणों को जाने बिना ही मामले को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह सुनवाई योग्य या अनुरक्षणीय नहीं है। हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों के प्रस्तुतिकरण के साथ सहमति व्यक्त की,जिसमें कहा गया था कि एक पीड़ित द्वारा बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और अपीलकर्ता को सीआरपीसी की धारा 372 के तहत अपील दायर करनी चाहिए। सीआरपीसी की धारा 372 एक पीड़ित को अधिकार देती है कि वह बरी के आदेश के खिलाफ अपील कर सकता है।

हाईकोर्ट ने मामले में धारा 401 (4) का हवाला दिया

धारा 401 (4) का हवाला दिया, जो कहती है कि ''जहां इस संहिता के तहत अपील निहित है और कोई अपील नहीं लाई गई है, ऐसे में उस पक्षकार की तरफ से दायर किसी पुनरीक्षण याचिका पर कार्यवाही नहीं की जाएगी, जो अपील दायर कर सकता था।''

हाईकोर्ट ने 'मल्लिकार्जुन कोडागली (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य ,(2019) 2 एससीसी 752'के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया था। इस फैसले में माना गया था कि ''कानून की सादा भाषा के आधार पर और कई हाईकोर्ट द्वारा दी गई व्याख्या और संयुक्त राष्ट्र की महासभा के प्रस्ताव के अलावा यह हमारे लिए काफी स्पष्ट है कि एक पीड़ित जिसे सीआरपीसी की धारा 2 (डब्ल्यूए) में परिभाषित किया गया है। अदालत के समक्ष उन मामलों में अपील दायर करने का हकदार होगा, जिनमें सजा के आदेश के खिलाफ आमतौर पर अपील निहित है।''

हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को इस बात की अनुमति दे दी कि वह बरी करने के फैसले के खिलाफ दायर अपील के साथ-साथ अपील करने के लिए विशेष अवकाश यानि स्पेशल लीव भी दायर कर सकता है। याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व एडवोकेट बी.पी. शर्मा ने किया और राज्य की तरफ से एडवोकेट अनंत बाजपेयी पेश हुए।