आपातकाल के दौरान अमेरिका में शरण लेने वाले पहले भारतीय थे राम जेठमलानी

आपातकाल के दौरान अमेरिका में शरण लेने वाले पहले भारतीय थे राम जेठमलानी

मुकुंद पी उन्नी

समकालीन भारतीय इतिहास में न्यायपालिका और भारतीय लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक उथल-पुथल वाले दौर (1970-1976) में राम जेठमलानी बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रहे।

उनके नेतृत्व में बार काउन्सिल ने क़ानूनी पेशे के बारे में आम आचरण के नियमों को व्यवस्थित किया और इसके लिए बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया रूल्ज़, 1975 को लागू किया। जब बदनाम और आलोकप्रिय आपराधिक मामलों के आरोपियों का बचाव करने वाले वकीलों की आलोचना होती थी तो जेठमलानी के नेतृत्व में बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया उन्हें ज़रूरी सुरक्षा उपलब्ध कराता था, जिसका प्रावधान 1975 के नियम में किया गया था और जो इस तरह से था -

"अपने या किसी और को होने वाले किसी भी दुखद परिणाम की परवाह किए बिना सभी उचित और सम्माजनक तरीक़े से अपने मुवक्किल के हितों का निर्भीकतापूर्वक बचाव करना किसी वक़ील का कर्तव्य है। किसी अपराध के बारे में अपने निजी विचारों पर ध्यान दिए बिना वह किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति का बचाव करेगा और इस बात का ख़याल रखेगा कि उसकी निष्ठा उस क़ानून के प्रति है जो यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति को पर्याप्त साक्ष्य के बिना दोषी नहीं माना जा सकता"।

क़ानून की प्रैक्टिस करने वाले व्यक्ति के रूप में राम जेठमलानी ने इन्हीं विचारों को हमेशा गले से लगाए रखा क्योंकि ख़ुद उन्हें कई बार बदनाम लोगों का बचाव करने के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उनका मानना था कि ऐसा समाज जिसमें कानून का शासन है, किसी व्यक्ति को सिर्फ़ अदालत ही दोषी क़रार दे सकता है। जब तक सभी क़ानूनी प्रक्रियाओं को आज़मा नहीं लिया जाता और आरोपी व्यक्ति के पास ख़ुद को निर्दोष साबित करने के लिए जब कोई और क़ानूनी रास्ता नहीं बच जाता तभी जाकर किसी व्यक्ति को दोषी माना जा सकता है।

क़ानूनी व्यवस्था और आरोपी के अधिकारों के बारे में उसमें उनकी आस्था को लेकर उनकी क्या राय थी इस बारे में उनके इस साक्षात्कार से जाना जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा, "अपने मुवक्किल के प्रति आपका दायित्व है और अदालत के अधिकारी के रूप में भी आपका यही दायित्व है।

आपातकाल के मुखर आलोचक

अपनी ओजपूर्ण भाषण शैली और धारदार शब्दों के इस्तेमाल ने जेठमलानी को क़ानूनी पेशे के बाहर राजनीति में भी अपनी पारी को चमकाने में मदद की। आपातकाल लगाने के लिए उस समय की सरकार की आलोचना करने के लिए वे बमुश्किल अपनी गिरफ़्तारी से बच सके। केरल बार फ़ेडरेशन ने उन्हें जनवरी 1976 में पलक्कड में एक सेमिनार में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। उस समय वे बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष थे और उस समय तक आपातकाल के छह महीने हो चुके थे। उस सेमिनार में उन्होंने इंदिरा गांधी की कड़ी आलोचना की।

"वह यह अच्छी तरह जानते थे कि श्रीमती गांधी की आलोचना करने के लिए उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है," यह कहना है एडवोकेट केएस मेनन का जो उस समय श्रोताओं के बीच मौजूद थे जब जेठमलानी आपातकाल के ख़िलाफ़ बोल रहे थे। इस सेमिनार के अंत तक, पलक्कड के ज़िला मजिस्ट्रेट ने आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने के लिए लागू किए गए बदनाम क़ानून मीसा के तहत जेठमलानी के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया, लेकिन इससे पहले की उनको यह वारंट थमाया जाता, जेठमलानी बॉम्बे के लिए निकल चुके थे और उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में इस वारंट को चुनौती दी। उनकी याचिका को सोली सोराबजी ने राम जेठमलानी के पुत्र महेश जेठमलानी के साथ मिलकर तैयार किया और इस पर क़रीब 300 वकीलों ने इस मामले के पैरवीकार के रूप में हस्ताक्षर किया।

अदालत में राम जेठमलानी का बचाव नानी पालकीवाला के नेतृत्व में मशहूर वकीलों के समूह ने किया जिसमें सोली सोराबजी भी शामिल थे। अदालत ने उन्हें गिरफ़्तारी से अंतरिम राहत दे दी। अपने संस्मरण में पालकीवाला के बारे में राम जेठमलानी ने उन दिनों को याद करते हुए लिखा है :

"इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि केरल बार में अपने भाषण के दौरान आपातकाल की आलोचना करने के लिए जब श्रीमती गांधी की सरकार ने बदनाम मीसा क़ानून के तहत उन्हें बिना किसी मुक़दमा के गिरफ़्तार करने का निर्णय किया तो मैंने नानी को अपना वक़ील चुना। इस आपातकाल ने 1975 में भारतीय लोकतंत्र को कलंकित और नष्ट किया। 300 वकीलों के समर्थन से नानी बॉम्बे हाईकोर्ट से पालघाट के ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ रोक आदेश प्राप्त करने में सफल रहे। प्रशासन ने मेरे इस भाषण को राजद्रोह जैसी गतिविधि माना था। यह रोक उसी दिन प्रभावी हुआ जिस दिन कुख्यात जबलपुर फ़ैसला सुनाया गया और इस रोक आदेश के कारण मैं भारत से बाहर निकल सका और अमरीका में शरण ले पाया"।

यद्यपि जेठमलानी पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर सकते थे, पर पालकीवाला ने उन्हें सुझाव दिया कि जब तक आपातकाल नहीं हट जाता वह देश से बाहर रहें। जेठमलानी भारत से निकलकर 28 अप्रैल 1976 को मांट्रीऑल, कनाडा पहुँचे। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने कुख्यात एडीएम जबलपुर फ़ैसला सुनाया, जिस रात राम जेठमलानी ने भारत छोड़ा उसकी चर्चा उन्होंने अपने साक्षात्कार में कुछ इस तरह से किया है –

"उस समय लगभग 101 वक़ील नासिक जेल में बंद थे। मैंने पालकीवाला से कहा कि मैं 102वें वक़ील के रूप में गिरफ़्तार होकर वहाँ जेल में चला जाता हूँ। मैं जेल जाने के भय से बचना नहीं चाहता था। अगर मैं भारत से बाहर रहता हूँ, तो इतना तो निश्चित था कि मैं भारत के बाहर रहकर भारत और उसके लोकतंत्र के साथ जो हो रहा है उसका प्रचार करूँगा और दुनिया को बताऊँगा कि कैसे यह आपातकाल नक़ली है। यह निर्णय लिया गया कि मुझे भारत के बाहर चले जाना चाहिए और मैं उसी रात निकल गया और पुलिस आयुक्त मुझे हवाई जहाज़ तक छोड़ने आया"।

अमेरिका में राजनीतिक शरण लेने वाला पहला व्यक्ति

जेठमलानी भारत से निकलकर मांट्रीऑल पहुँचे जहाँ उनका बेटा पढ़ाई कर रहा था। मई 1976 में वे अमेरिका पहुँचे और अमरीका में राजनीतिक शरण पाने की गुहार लगाने वाले पहले भारतीय बने। "अमेरिका ने श्रीमती गांधी के दुश्मन को शरण दी" नाम से अपनी रिपोर्ट में न्यू यॉर्क टाइम्ज़ ने कुछ इस तरह से लिखा -

अपनी तरह की पहली कार्रवाई में, अमेरिका ने बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष राम जेठमलानी को राजनीतिक संरक्षण दिया है। वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतियों के कटु आलोचक हैं।

ऐसा माना जाता है कि श्रीमती गांधी ने एक साल से अधिक समय पहले जो आपातकाल लागू किया उसके बाद राजनीतिक शरण पाने वाले वे पहले भारतीय हैं। आपातकाल के कारण (भारत में) नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया है।

उन्होंने मिशिगन के वायने स्टेट यूनिवर्सिटी में तुलनात्मक संवैधानिक क़ानून पढ़ाया और अमरीका में दो साल तक नागरिक अधिकारों से सरोकार रखने वाले समूहों को भारत में जो कुछ हो रहा है उसके बारे में संबोधित किया। जब राम जेठमलानी ने बॉम्बे उत्तर-पश्चिम क्षेत्र से 1977 में होने वाले आम चुनावों के लिए नामांकन भरा, तब तक उनके नाम से घर-घर में लोग परिचित हो गए थे पर वह अभी भी विदेश में ही थे। उन्होंने तत्कालीन क़ानून मंत्री एचआर गोखले को चुनाव में हराया और एक ओजस्वी सांसद के रूप में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की।

लेखक सुप्रीम कोर्ट में वक़ील हैं और लाइव लॉ में नियमित रूप से लिखते हैं। [इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं, लाइव लॉ के नहीं और लाइव लॉ इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।]