'प्रिंसिपल' से क्रॉस एक्जामिन वाले मामले में पॉवर ऑफ अटॉर्नी गवाही नहीं दे सकता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुख्तारी अधिकार (पॉवर ऑफ अटॉर्नी) वाला व्यक्ति वैसे मामलों में मूल मालिक (प्रिंसिपल) की ओर से गवाही नहीं दे सकता, जिनके बारे में केवल मालिक को ही जानकारी हो और जिनमें उसे क्रॉस-एक्जामिन (प्रतिपृच्छा) की जा सकती हो।

इकरारनामे की शर्तों की नाफर्मानी के कारण जारी किये गये आदेश (स्पेशल परफॉर्मेंस) से संबंधित मुकदमे से जुड़ी इस अपील में यह दलील दी गयी थी कि बिक्री के समझौते की शर्तों को पूरा करने के संबंध में अपनी तत्परता और इच्छा जाहिर करने के लिए मुद्दई (वादी) कटघरे में खड़ा नहीं हुआ।

अपील में यह भी दलील दी गयी थी कि मुख्तारनामा दिये जाने से पहले के मामलों में प्रिंसिपल की ओर से मुख्तारी के लिए अधिकृत व्यक्ति गवाही नहीं दे सकता, खासकर उन तथ्यों के आलोक में जो केवल वादी को ही मालूम हों। (मोहिन्दर कौर बनाम संत पॉल सिंह)

'जानकी वाशदेव बनाम इंडसइंड बैंक लिमिटेड' के मामले में दिये गये फैसलों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी ने कहा कि मुख्तारी-अधिकार प्राप्त व्यक्ति अपने ही अधिकार के संबंध में गवाही दे सकता है, न कि मालिक द्वारा किये गये कार्यों के लिए ।

कोर्ट ने कहा, "इसी तरह मुख्तारी अधिकार प्राप्त व्यक्ति उन मामलों में मूल मालिक की ओर से गवाही नहीं दे सकता, जिनके बारे में प्रिंसिपल यानी मूल मालिक को ही निजी जानकारी पता हो या उनका क्रॉस एक्जामिनेशन किया जा सकता है। हमारा मानना है कि प्रतिवादी का कटघरे में खड़े न होने के कारण उसके खिलाफ विपरीत धारणा बनायी जा सकती है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में मुद्दालेह (प्रतिवादी) ने एक सितम्बर 1989 को करार रद्द कर दिया था और एक अवधि में वादी को मुआवजा भी दे दिया गया था और रद्द करने की प्रक्रिया को कभी चुनौती भी नहीं दी गयी। पीठ ने अपील को मंजूर करते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि हो सकता है कि गिरवी प्रॉपर्टी को छुड़ाने के मामले में प्रतिवादी की ओर से दी गयी जानकारी से भले वादी संतुष्ट न हो, इसका आशय प्रतिवादी की ओर से तत्पर या इच्छुक होने और समझौते की शर्तों को पूरी करने की क्षमता से नहीं है।