जिस विवाह को कायम रखना मुश्किल हो रहा हो, उसके विच्छेद के लिए अनुच्छेद 142 की शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है : सुप्रीम कोर्ट

जिस विवाह को कायम रखना मुश्किल हो रहा हो, उसके विच्छेद के लिए अनुच्छेद 142 की शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह उन मामलों में विवाह विच्छेद के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निहित अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, जहां यह पाया जाता है कि विवाह आगे निभाना मुश्किल है, वह भावनात्मक रूप से मृत हो चुका है, जो बचाव से परे है और जो पूरी तरह से टूट चुका हो। भले ही मामले के तथ्यों से कानून की नजर में कोई ऐसा आधार उपलब्ध न हो, जिसके आधार पर तलाक की अनुमति दी जा सकती है।

इस मामले में (''आर.श्रीनिवास कुमार बनाम आर.शमेथा'') हाईकोर्ट ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसने इस आधार पर तलाक की डिक्री की मांग की थी कि उनका विवाह पूरी तरह से टूट चुका है।

पति ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की

हाईकोर्ट के निर्णय का विरोध करते हुए, पति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया कि, पति और पत्नी दोनों पिछले 22 वर्षों से अलग-अलग रह रहे हैं और अब इस विवाह को बचाना असंभव है और ऐसा कोई तरीका नहीं बचा है, जिसके आधार पर इस शादी को बचाया जा सके।

यह शादी अब बचाव से परे टूट चुकी है इसलिए, यह आग्रह किया गया था कि चूंकि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है, इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करके विवाह को भंग करना सही रहेगा, ताकि पक्षकारों को पर्याप्त न्याय मिल सके।

पत्नी की तरफ से बचाव पेश किया गया

दूसरी ओर, पत्नी की तरफ से पेश हुए एडवोकेट जयंत कुमार मेहता ने इन दलीलों का विरोध किया, उन्होंने कहा कि जब तक दोनों पक्षों द्वारा सहमति नहीं दी जाती है, तब तक भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों के प्रयोग करके भी इस आधार पर विवाह को भंग नहीं किया जा सकता है कि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है।

वरिष्ठ वकील द्वारा दिए गए प्रस्तुतिकरण से सहमत होते हुए, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम.आर शाह की पीठ ने कहा कि विभिन्न निर्णयों में, शीर्ष अदालत ने विवाह को भंग करने के लिए अनुच्छेद 142 लागू किया था।

पीठ ने कहा कि-

"जहां तक प्रतिवादी-पत्नी की ओर से प्रस्तुत की गई दलील-कि जब तक दोनों पक्षों द्वारा सहमति नहीं दी जाती है, तब तक भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों के प्रयोग करके भी इस आधार पर विवाह को भंग नहीं किया जा सकता है कि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है, इस दलील में कोई तथ्य नहीं है।

अगर विवाह करने वाले दोनों पक्ष स्थायी रूप से अलग होने और/या आपसी सहमति से तलाक के लिए सहमत होते हैं, तो उस स्थिति में, निश्चित रूप से दोनों पक्ष आपसी सहमति से तलाक की डिक्री के लिए सक्षम अदालत के समक्ष जा सकते हैं। केवल ऐसे मामले में जब कोई एक पक्ष सहमत नहीं है और तलाक के लिए सहमति नहीं देता है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, पक्षों के बीच पर्याप्त न्याय करने के लिए लागू किया जाना आवश्यक है।

हालांकि, ऐसे मामलों में, पत्नी के हित को आर्थिक रूप से संरक्षित करने की भी आवश्यकता है ताकि भविष्य में उसे आर्थिक रूप से परेशान न होना पड़े और उसे दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े।"

मामले में दायर अपील को स्वीकारते हुए पीठ ने यह भी कहा कि-

"वर्तमान मामले में, निश्चित रूप से, अपीलार्थी-पति और प्रतिवादी-पत्नी 22 वर्षों से अधिक समय से अलग-अलग रह रहे हैं और पक्षकारों के लिए अब एक साथ रहना संभव नहीं होगा। इसलिए, हमारा विचार है कि प्रतिवादी-पत्नी के हितों की रक्षा करते हुए, एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ते के जरिए उसकी भरपाई कर दी जाए, जिसके बाद भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करने और पक्षकारों के बीच के विवाह को भंग करने के लिए यह एक उपयुक्त मामला है।"