हाउसिंग सोसाइटी इंडस्ट्री नहीं, इसके कर्मचारी नहीं हैं कामगार, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

हाउसिंग सोसाइटी इंडस्ट्री नहीं,  इसके कर्मचारी नहीं हैं कामगार, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर दोहराया है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम (आईडी एक्ट) , 1947 के तहत हाउसिंग सोसाइटी (आवासीय समिति) न तो 'उद्योग' है और न इसके कर्मचारी 'कामगार'।

जस्टिस डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने गौतमबुद्ध नगर के अरुण विहार रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की एक अपील पर व्यवस्था दी, "आवासीय समिति सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत होती है और इसका काम अपार्टमेंट मालिकों को आवश्यक रखरखाव सुविधाएं उपलब्ध कराना है और इस प्रकार सोसाइटी को इंडस्ट्री नहीं कहा जा सकता।"

लेबर कोर्ट के फैसले को चुनौती

याचिकाकर्ता सोसाइटी ने एक लेबर कोर्ट (श्रम अदालत) के उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके तहत सोसाइटी द्वारा नौकरी से बाहर किये जा चुके प्रतिवादी को राहत प्रदान की गयी थी।

श्रम अदालत ने कहा था, "संबंधित कर्मचारी को उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा- 6(एन) के प्रावधानों पर अमल किये बिना नौकरी से मुअत्तल कर दिया गया था और ऐसा करना अवैध छंटनी के दायरे में आता है।"

चूंकि औद्योगिक विवाद अधिनियम एवं उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद अधिनियम में इंडस्ट्री, 'इंडस्ट्रीयल डिस्प्यूट' और 'वर्कमैन' की परिभाषा समान है, ऐसे में हाईकोर्ट ने इस मामले का निपटारा बेंगलौर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा (1978) के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये फैसले के आलोक में किया।

हाईकोर्ट ने बताया, कोई कार्य इंडस्ट्री के दायरे में कब आएगा

हाईकोर्ट ने कहा, "कोई कार्य इंडस्ट्री के दायरे में तभी आ सकता है, जब वह कार्य संगठित हो, न कि निजी या व्यक्तिगत नौकरी। मालिक की व्यक्तिगत सेवा के लिए रखे गये घरेलू नौकरों और औद्योगिक विवाद कानून 1947 की धारा 2(जे) के तहत परिभाषित 'वर्कमेन' (कामगार) में अंतर बेंगलूर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड के मुकदमे में सामने आया था, जिसमें यह व्यवस्था दी गयी थी कि निजी कार्यों के लिए रखे गये घरेलू नौकर इंडस्ट्री की परिभाषा के दायरे के बाहर होंगे।"

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि 'क्या सोसाइटी एक इंडस्ट्री है', इस सवाल पर सोम विहार अपार्टमेंट ऑनर्स हाउसिंग मेनटेनेंस लिमिटेड बनाम वर्कमेन (2002) मामले में विचार किया गया था, तब यह व्यवस्था दी गयी थी कि जब किसी व्यक्ति को सोसाइटी के सदस्यों के सेवार्थ काम पर रखा जाता है तो इस तरह के काम को न तो इंडस्ट्री की श्रेणी में रखा जायेगा, न ही ऐसे कर्मचारियों को वर्कमेन (कामगार) माना जायेगा।

न्यायालय ने मेसर्स अरिहंत सिद्धि कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड बनाम पुष्पा विष्णु मोरे एवं अन्य, 2018 मामले में दिये गये फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी का प्रमुख कार्य अपने सदस्यों को सेवाएं प्रदान करना है। यदि सोसाइटी अपने मुख्य कार्य से हटकर कोई व्यावसायिक गतिविधि भी चलाती है तब भी इसे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(जे) के दायरे में इंडस्ट्री नहीं कहा जा सकता।

बेंच ने कहा, "इस तरह की हाउसिंग सोसाइटी द्वारा किया गया कोई अनुषंगी कार्य संयुक्त कार्य माना जायेगा और 'डोमिनेंट नेचर टेस्ट' के तहत इससे कार्य की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं होगा और यह इंडस्ट्री के दायरे में नहीं आ सकेगा।"

हाईकोर्ट ने कर्णानी प्रोपर्टीज लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल सरकार एवं अन्य (1990) के मामले में दिये गये फैसले को प्रतिवादी द्वारा आधार बनाये जाने को अनुचित करार देते हुए स्पष्ट किया कि उक्त मामला बड़े मकानों के मालिकाना वाली रीयल एस्टेट कंपनी से जुड़ा है, जिसने उन मकानों के रखरखाव के लिए कर्मचारी नियुक्त किये थे, जो इंडस्ट्री के दायरे में आता है, लेकिन हाउसिंग सोसाइटी के लिए इसे मिसाल के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा, "आईडी एक्ट, 1947 का उद्देश्य औद्योगिक विवादों के निपटारे और औद्योगिक संबंधों के नियमन पर ध्यान केंद्रित करना था, न कि गांव के प्रत्येक छोटे-मोटे बढ़ई या शहर के उस सोनार के मामले में दखल देना, जो अपने पुत्र या सहयोगी के साथ बैठकर ग्राहकों का काम निपटाता है।"