पिता ऐसी बेटी को गुज़ारे की मासिक राशि देने के लिए बाध्य नहीं जो ख़ुद कमा रही है : कर्नाटक हाईकोर्ट

पिता ऐसी बेटी को गुज़ारे की मासिक राशि देने के लिए बाध्य नहीं जो ख़ुद कमा रही है : कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि पिता अपनी उस बेटी को गुज़ारे की मासिक राशि देने के लिए बाध्य नहीं है जो नौकरी से पैसे कमा रही है।

न्यायमूर्ति एसएन सत्यनारायण और पीजीएम पाटिल ने इस बारे में सदाशिवानंद की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार कर ली। पीठ ने कहा, "शुरुआत में अदालत ने कुछ राशि के भुगतान के बारे में आदेश देकर ठीक किया था पर जब उस समय के बाद के लिए नहीं जब उसे किसी प्रतिष्ठित कंपनी में 20-25 हज़ार प्रति माह की नौकरी मिल गई। उसको 10 हज़ार की अतिरिक्त राशि दिलाकर उसकी आदत नहीं बिगाड़ी जा सकती। पिता के कंधे पर अन्य अविवाहित बेटियों के गुज़ारे का भार भी है और रिपोर्ट के हिसाब से इन लोगों ने अपनी पढ़ाई रोक दी है और दो बेटे अभी भी बालिग़ नहीं हुए हैं और उसे उनका भरण-पोषण तब तक करना है जबतक कि वे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते"।

पीठ ने शादी में ख़र्च होने वाली राशि को 15 लाख से घटाकर 5 लाख कर दिया। अदालत ने कहा, "शादी का ख़र्च तब होना है जब बेटियों की शादी का दिन निर्धारित हो जाता है और यह ख़र्च 5 लाख से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए"।

पिता ने पारिवारिक अदालत के 9 नवंबर 2016 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील की थी। उसकी दूसरी बेटी पद्मिनी ने अदालत में हिंदू अडॉप्शन एंड मेंट्नेन्स ऐक्ट के तहत एक मामला दायर किया और नागरिक प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 1 के तहत भी राहत की माँग की।

बेटी ने कोर्ट से कहा था कि वह उसके पिता को उसकी शादी होने तक गुज़ारे की राशि देना जारी रखे, शादी की तिथि निर्धारित होती है तो शादी का ख़र्च दे और उसकी शिक्षा ठीक तरह से पूरी हो जाए इसकी व्यवस्था करे।

पिता ने कहा कि अदालत ने उसके मामले को जल्दबाज़ी में निपटा दिया और पेश किए गए साक्ष्यों पर ग़ौर नहीं किया। उसकी बेटी बीई करने के बाद एम टेक भी कर चुकी है और एक कंपनी में नौकरी से ठीक ठाक राशि कमा रही है। पर अदालत ने इन तथ्यों को नज़रंदाज़ कर बेटी को 10 हज़ार हर माह देने और शादी के लिए 15 लाख की राशि देने का फ़ैसला सुना दिया।

पीठ ने उपलब्ध साक्ष्यों पर ग़ौर करने के बाद कहा, "…अपीलकर्ता और उसकी पत्नी के बीच चल रहे कई सारे मामलों में एक मामला यह भी है जिसमें पत्नी ने अपने गुज़ारे की राशि और अपनी बेटियों की गुज़ारे की राशि के लिए अदालत में मामला दायर कर रखा है; दूसरा वैवाहिक संबंधों की बहाली के लिए और तीसरा संपत्ति के मामले से संबंधित है जिसमें उसने 6/7 हिस्सेदारी की माँग की है"।

"इस मामले में वादी एक इंजीनियरिंग स्नातक है और वह नौकरी में है। अगर सिर्फ़ यह माना जाए कि उसे 20 से 25 हज़ार ही मिल रहे हैं, इतनी राशि के बाद अदालत का उसे गुज़ारे की राशि देने का आदेश देना तर्कसंगत नहीं है। उसको शादी के लिए 15 लाख की राशि देने का आदेश भी तर्कसंगत नहीं है जबकि इसकी कोई माँग नहीं की गई थी। इस बात का कोई ब्योरा नहीं पेश किया गया है कि वादी की शादी में 15 लाख रुपए ख़र्च होंगे। अदालत ख़ुद ही यह अनुमान लगा रहा है कि उसकी शादी में 15 लाख रुपए ख़र्च होंगे और यह भी किसी तरह से तर्कसंगत नहीं है"।