डॉक्ट्राइन ऑफ प्रुडेंस : पत्नी, चार बच्चों के हत्यारे की मौत की सजा आजीवन कारावास में तब्दील

डॉक्ट्राइन ऑफ प्रुडेंस : पत्नी, चार बच्चों के हत्यारे की मौत की सजा आजीवन कारावास में तब्दील

उच्चतम न्यायालय ने पुनर्विचार याचिका को आंशिक तौर पर मंजूर करते हुए पत्नी और चार बच्चों की हत्या के दोषी व्यक्ति सुदम उर्फ राहुल कनीराम जाधव की फांसी की सजा आजीवन कारावास में तब्दील कर दी है।

सुदम अपनी पत्नी और चार बच्चों की गला दबाकर मारने का अभियुक्त था। निचली अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड का आदेश सुनाया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी 2012 में अपनी मोहर लगायी थी। उसकी पुनरीक्षण याचिका भी 'सर्कुलेशन' प्रक्रिया के तहत खारिज कर दी गयी थी। (पुनर्विचार याचिका को अदालत कक्ष में सुने बिना खारिज किये जाने को डिस्मिस्ड बाई सर्कुलेशन कहा जाता है।) हालांकि मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक बनाम रजिस्ट्रार, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया मामले में आये फैसले के आलोक में उसकी समीक्षा याचिका फिर से खुली अदालत में सुनी गयी।

पुनरीक्षण के स्तर पर कोई अतिरिक्त आधार नहीं

पुनरीक्षण याचिका दायर करने वाले सुदम की ओर से पेश वकील नित्या रमाकृष्णन ने दलील दी कि पूरा का पूरा मुकदमा परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था, जैसे- अंतिम तौर पर दिखे साक्ष्य, दो तथाकथित न्यायेतर स्वीकारोक्ति और याचिकाकर्ता के इरादे तथा इन्हीं साक्ष्यों पर गलत तरीके से भरोसा किया गया।

मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक के मामले में जारी आदेश पर भरोसा करते हुए इस बात की दलील दी गयी थी कि पुनर्विचार के दौरान अतिरिक्त आधार (एडिशनल ग्राउंड) का जिक्र किया जा सकता है। पीठ ने तब मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक मामले में 31 अक्टूबर 2018 को जारी आदेश की व्याख्या की, जिसमें कहा गया है, "हम याचिकाकर्ता को अपनी पुनर्विचार याचिका के समर्थन में कानूनी तौर पर अनुमति योग्य अतिरिक्त आधार पेश करने की अनुमति देते हैं।"

यह कहना यथेष्ठ है कि इस बात को लेकर बहस नहीं हो सकती कि यह अदालत पुनर्विचार संबंधी अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते वक्त साक्ष्य को सम्पूर्णता में फिर से विचार नहीं कर सकती। इसके अलावा यह स्पष्ट है कि मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक मामले में 31 अक्टूबर 2018 के आदेश में 'एडिशनल ग्रांउड्स' का हवाला दिया गया है, वह उन ग्राउंड्स के लिए हैं जो याचिकाकर्ता पुनर्विचार अर्जी के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अदालत के समक्ष उठा सकते थे, लेकिन जब पुनरीक्षण याचिका दायर की गयी थी तब उसने इन ग्राउंड्स को उठाया नहीं था।

वास्तव में समूचे आदेश को पढ़ने से यह बात सामने आती है कि शीर्ष अदालत मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक मामले में अपने आदेश का दायरा उन पुनर्विचार याचिकाओं तक बढ़ाये जाने पर विचार कर रही थी, जिन्हें 'सर्कुलेशन' के जरिये खारिज कर दिया गया था। इतना ही नहीं, क्या इसे पुनरीक्षण याचिका खारिज किये जाने के बाद दायर उन सुधारात्मक याचिकाओं के लिए भी लागू किया जा सकता है, जिन्हें सर्कुलेशन प्रक्रिया के जरिये खारिज किया गया तथा अदालत ने उन्हें फिर से सुनने की अर्जी ठुकरा दी थी।

इस तथ्य के खास संदर्भ में कि याचिकाकर्ता इकलौता व्यक्ति था जिसकी पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में विचार नहीं किया गया और जिन सीमित तथ्यों पर सुधारात्मक याचिका दायर की गयी, उसके आलोक में यह कहा जा सकता है कि सुधारात्मक अधिकार क्षेत्र (क्यूरेटिव ज्यूरिस्डिक्शन) के तहत पुनरीक्षण याचिका पर पूरी तरह पुनर्विचार नहीं हो सकता। इस अदालत ने अपने 31 अक्टूबर 2018 के आदेश में राहत का दायरा खारिज हो चुकी सुधारात्मक (क्यूरेटिव) याचिका तक बढ़ा दिया। ऐसा करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने जिन दलीलों पर भरोसा जताया उसे मान लिया गया है।

उपरोक्त चर्चा के मद्देनजर हम याचिकाकर्ता के वकील की उन दलीलों को खारिज करने के पक्ष में नहीं हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि उपरोक्त आदेश के मद्देनजर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई करते वक्त सम्पूर्ण साक्ष्य पर फिर से विचार करने के लिए एक नया रास्ता खुलता है। उपरोक्त व्याख्या के मद्देनजर याचिकाकर्ता के वकील की दलील पर विचार किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति आर वी रमन, न्यायमूर्ति मोहन एम शांतनगोदौर और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने जिस दलील पर विचार किया था वह यह था कि अपील पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अभियुक्त ने शव की पहचान न होने देने के इरादे से मृतक का चेहरा कुचल दिया था। इस पहलू पर बेंच ने कहा,

"इस बात के साक्ष्य नहीं हैं कि महिला का चेहरा उस हद तक कुचल दिया गया था कि उसे पहचाना न जा सके या ऐसा करने का कोई प्रयास किया गया हो। हम साक्ष्य रिकॉर्ड में इसे एक और त्रुटि के रूप में देखते हैं।"

विवेक का सिद्धांत (डॉक्ट्राइन ऑफ प्रुडेंस)

कोर्ट ने अशोक देववर्मा बनाम त्रिपुरा सरकार (2014) के फैसले का हवाला भी दिया, जिसमें 'रिजिजूअल डाउट' की अवधारणा पर विचार विमर्श किया गया है, जिसका अर्थ है कि किसी तार्किक संदेह से इतर अभियुक्त के दोषी होने की बात पर पूरी तरह यकीन होने के बावजूद, कोर्ट इस तरह के अपराध के लिए रिजिजूअल डाउट्स पर विचार कर सकता है या सजा को टाल सकता है। इस बात पर भी विचार किया गया कि अमेरिकी अदालतों के समक्ष रिजिजूअल डाउट्स की मौजूदगी का हवाला परिस्थितियों की गम्भीरता को कम करने के लिए दिया जाता रहा है।

निस्संदेह मृत्युदंड संबंधी भारतीय न्यायशास्त्र में इस बारे में ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है और इसका कारण यह रहा है कि इस अदालत ने कई मौकों पर व्यवस्था दी है कि दोषी ठहराये जाने के लिए जरूरी साक्ष्यों की गुणवत्ता की तुलना में फांसी की अटल सजा सुनाने के लिए साक्ष्यों की गुणवत्ता ज्यादा बेहतर होनी चाहिए। बेंच ने आगे कहा कि ऐसी स्थिति मे रिकॉर्ड में उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की प्रकृति के आधार पर दोषी ठहराये गये अपराधी को मृत्युदंड सुनाना अनुचित माना गया है।

बच्चन सिंह का जिक्र करते हुए बेंच ने 'संतोष कुमार सतीशभूषण बरियार बनाम महाराष्ट्र सरकार' केस में वर्णित 'प्रिंसिपल ऑफ प्रुडेंस' के बारे में कहा है कि जब भी ऐसी परिस्थितियों में किसी सजा पर रोक/तार्किकता के संबंध में विचारों में अंतर हो या निर्धारक कारक की आत्मचेतना का प्रश्न अथवा सजा निर्धारण की प्रक्रिया पर अमल के मामले में निरंतरता का अभाव, तब आजीवन कारावास की सजा के पक्ष में निर्णय देने और मृत्युदंड को अपवाद के तौर पर इस्तेमाल की सलाह दी जाती है।

इस मामले में भी डॉक्ट्राइन ऑफ प्रुडेंस का इस्तेमाल करते हुए पीठ ने कहा,

"निस्संदेह, साक्ष्य परिस्थितिजन्य थे, इस तथ्य के बावजूद यह कोर्ट की समझ में नहीं आया। हम पाते हैं कि रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्य याचिकाकर्ता के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन डॉक्ट्राइन ऑफ प्रुडेंस के मद्देननजर इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य याचिकाकर्ता के पक्ष में जाते हैं। साथ ही, यह भी संभव है कि अनीता के चेहरे की चोट के त्रुटिपूर्ण अवलोकन के कारण न्यायालय ने याचिकाकर्ता को मौत की सजा सुनाई हो। इस प्रकार हमारा सुविचारित मत है कि इस बात की प्रबल संभावना थी कि कोर्ट अपील की सुनवाई करते हुए मृत्युदंड को निरस्त कर दिया होता, क्योंकि याचिकाकर्ता के खिलाफ केवल 'अंतिम बार दिखी परिस्थितियां, तथाकथित न्यायेतर स्वीकारोक्ति और याचिकाकर्ता के इरादे' जैसे ही इकलौते साक्ष्य मौजूद हैं। दूसरे शब्दों में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि घटना की गंभीरता और बर्बरता के बावजूद इस मामले में आजीवन कारावास की सजा का रास्त बंद हो गया था।"

पीठ ने उसके बाद याचिकाकर्ता की मौत की सजा कम करके आजीवन कारावास में बदल दिया, उसे शेष जीवनकाल के लिए जेल में रहना होगा। उसे सजा माफी पाने का अधिकार नहीं होगा।