"क्या न्याय के बिना शांति हो सकती है?" अयोध्या फैसले पर बोले वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन

"क्या न्याय के बिना शांति हो सकती है?" अयोध्या फैसले पर बोले वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन

राजीव धवन ने कहा कि "बाबरी मस्जिद में जो पत्थर हैं, वे मुसलमानों के हैं! मैं उनसे कहूंगा कि वे इन पत्थरों को लें आएं और उनसे जो नाइंसाफी की गई है, उसका मकबरा बनवाएं।"

राम मंदिर-बाबरी म‌स्‍जिद विवाद में मुस्लिम पक्ष के वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा है कि कि सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर के फैसले के खिलाफ, जिसमें हिंदू पक्षों को अयोध्या स्थित विवादित स्थल पर मंदिर बनाने की अनुमति दी गई है, समीक्षा याचिका दायर की जानी चाहिए।

वह नई दिल्ली में सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में "भारत का संविधान 70 साल बाद" विषय पर बोल रहे थे।

राजीव धवन ने कहा कि "बाबरी मस्जिद में जो पत्थर हैं, वे मुसलमानों के हैं! जमीन उन्होंने दी है, लेकिन पत्थर उन्हीं के हैं! मैं उनका प्रवक्ता नहीं हूं, मगर मैं उनसे कहूंगा कि वे इन पत्थरों को लें आएं और उनसे जो नाइंसाफी की गई है, उसका मकबरा बनवाएं।"

राजीव धवन ने कहा, चलो मान लेते हैं कि 1992 में मस्जिद ढहाई नहीं गई होती और से आज भी वहीं खड़ी होती। फैसले के मुताबिक, 1992 में स्वामित्व हिंदुओं के पास रहा होता। अगर मस्जिद अब भी खड़ी होती, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का वास्तव में अर्थ होता कि 'उसे नष्ट करो और आगे बढ़ो!'

उन्होंने कहा कि 1528 और 1857 के बीच, आपके पास ये साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि आपने वहां प्रार्थना की थी ...


राजीव धवन ने कहा कि वक्फ ही वक्फ होता है! अगर मैं वहां एक सदी तक प्रार्थना नहीं करता, तब वो वक्फ ही रहता! 1528 से, पहले मुगलों और फिर नवाबों ने वहां शासन किया! आखिर वहां एक मस्जिद क्यों थी, जब उसमे नमाज नहीं पढ़ी जाती थी, और वो भी तब जब मुसलमान शासक थे। हास्यास्पद है ये! वे कह रहे हैं कि हिंदुओं की पूरी जमीन पर पहुंच थी और कम से कम बाहरी आंगन तक थी ही। ये कैसे संभव है? अंदर के आंगन तक पहुंचने के लिए, जहां मुसलमान जाते रहते थे, आपको बाहरी आंगन को पार करना पड़ता! विकल्प बहुत सरल था- वहां मस्जिद थी! चारदीवारी से घिरी! ये मुस्लिमों की मिल्कियत ‌थी! 1885 के एक फैसले में कहा गया था कि जहां तक ​​हिंदू अधिकार का सवाल है, वे वहां मंदिर नहीं बना सकते हैं! हिंदुओं के पास जो था वो मात्र प्रार्थना का निर्धारित अधिकार था!... उन्होंने इसे उलट दिया! उन्होंने कहा कि मास्‍जिद हिंदुओं की संपत्ति थी! क्यूं कर? क्योंकि कुछ सज्जनों ने कहाकि कि उन्होंने सुना था कि 1857 से पहले वहां पूजा होती थी?

राजीव धवन ने कहा, "मैं क्यों समीक्षा दायर करना चाहता हूं? समीक्षा वो तरीका है जिससे अदालत के समक्ष ये बताया जा सकता है कि फैसले से समस्या क्या है? यह एकमात्र आधिकारिक तरीका है, जिससे मुस्लिम समुदाय कोर्ट को बता सकता है, न कि मीडिया को, कि यह निर्णय गलत है! ... इस विवाद का अंत होना चाहिए। अगर सुन्नी वक्फ बोर्ड दबाव में है, और वह समीक्षा याचिका दायर नहीं करना चाहता तो वो न करे.! एम सिद्दीकी अगुआ हैं, वो जमात से हैं, वो दायर करेंगे। अन्य लोग भी दायर करेंगे... भारत के लोगों को ये जानने का अधिकार है कि वे इस फैसले को गलत क्यों कहते हैं! यह एक आधिकारिक बयान के रूप में रिकॉर्ड पर होगा, न कि टीवी कार्यक्रम पर या एक अखबार में!"

"लोग क्यों नहीं चाहते कि समीक्षा दायर की जाए? शांति के लिए? क्या न्याय के बिना शांति हो सकती है? ..."

सुप्रीम कोर्ट की कार्य प्रणाली पर राजीव धवन ने‌ कहा, "क्या सर्वोच्च न्यायालय ने हमें विफल किया है? दुर्भाग्य से, बार-बार किया है! उन्होंने सीबीआई का क्या किया? वे जानते थे कि उन्होंने कुछ गलत किया है। तो जस्टिस गोगोई ने क्या किया? उन्होंने कहा कि मैं जस्टिस सीकरी को भेज रहा हूं और आप किसी और को नियुक्त करने जा रहे हैं! एक्टिवस्टों के मामले में क्या हुआ? अरुणाचल में क्या हुआ? भ्रष्टाचार के मामले में क्या हुआ? मुझे लगता है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत राजनीतिक भ्रष्टाचार हो रहा है।"