अभियुक्त को है चुप रहने का अधिकार, चुप्पी को अपराध की स्वीकृति नहीं माना जा सकता, पढ़िए कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला

अभियुक्त को है चुप रहने का अधिकार, चुप्पी को अपराध की स्वीकृति नहीं माना जा सकता, पढ़िए कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मंगलवार को आईपीसी की धारा 302 के तहत मर्डर के आरोप में दोषी एक व्यक्ति को यह कहते हुए दोषमुक्त कर दिया, कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 उचित संदेह से परे अपने मामले को साबित करने से अभियोजन पक्ष को छूट नहीं देती है और एक आरोपी को बिना प्रतिकूल प्रभाव के चुप्पी का/चुप रहने का अधिकार है।

पृष्ठभूमि

यह अपील प्रशांत बिस्वास ने दायर की थी, जिसे रानाघाट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने उसकी पत्नी की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि अपीलकर्ता पीड़िता को प्रताड़ित करता था और उसने अपने गांव की एक महिला स्वप्ना के साथ अवैध संबंध बनाए रखने के लिए उसकी हत्या कर दी होगी। हालांकि, उन गवाहों में से किसी ने भी अपीलकर्ता को स्वप्ना के साथ मिलते हुए नहीं देखा था।

सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अपीलकर्ता द्वारा दिए गए बयानों में उसने अपने खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों से इनकार किया, यह दावा करते हुए कि वह कथित घटना के समय घर पर नहीं था।

सजा के आदेश को पारित करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने कहा कि अभियुक्त को उन तथ्यों और परिस्थितियों का विशेष ज्ञान था, जिसमें उसकी पत्नी की हत्या की गई थी और उन परिस्थितियों को समझाने का भार भी उस पर था। हालांकि, इस तरह के भार को डिस्चार्ज नहीं किया गया था और घटना के समय केवल अपनी उपस्थिति से इनकार करने से आरोपी को 'अलेबाई' (alibi) का लाभ नहीं मिल सकेगा। इस संबंध में साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 पर भरोसा किया गया था, जिसमें यह कहा गया है कि जब कोई भी तथ्य, विशेष रूप से किसी व्यक्ति के ज्ञान में होता है, तो उस तथ्य को साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होता है।

परिणाम

"प्रशांत बिस्वास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य" की अपील पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश थोट्टिल बी. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति अरिजीत बैनर्जी की पीठ ने यह विचार किया कि अपीलकर्ता की सजा ट्रायल कोर्ट के विचार में एक मजबूत संदेह द्वारा प्रेरित थी। उन्होंने नोट किया कि आरोपी को उसकी पत्नी की हत्या से जोड़ने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी मौजूद नहीं था।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा, घटना के घटित होने के समय या उसके आसपास अपीलकर्ता की अपने घर में उपस्थिति को स्थापित करने के लिए पुख्ता सबूतों के नाम पर कुछ भी रिकॉर्ड पर लाया नहीं गया था। अन्वेषण अधिकारी की ओर से यह पता लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि घटना के समय आरोपी कहां था।

अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह के पास इस घटना के बारे में कहने के लिए कुछ भी नहीं था और उन्होंने जो कुछ भी कहा वो आरोपी को दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसके अलावा, अपीलकर्ता के स्वप्ना के साथ अवैध संबंध होने का आरोप भी निराधार था, इसलिए अदालत का मत था कि ऐसा कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि अभियुक्त, अपराधी था।

अदालत ने जसपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य, (2012) 1 SCC (Cri) 1 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें यह माना गया था कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का उद्देश्य, उचित संदेह से परे (beyond reasonable doubt) अपने मामले को साबित करने से अभियोजन पक्ष को छूट देना नहीं था।

"धारा 106 तब लागू होती, जब यह स्थापित किया गया होता कि अपीलकर्ता घटना के समय या उसके आसपास मृतका के साथ था या मृतका को अंतिम बार उसके साथ देखा गया था। केवल यह तथ्य कि अपीलकर्ता और पीड़िता विवाहित थे, इस कारण के चलते अधिनियम की धारा 106 को आकर्षित नहीं किया जा सकता है, भले ही घटना के समय अपीलकर्ता कहीं भी रहा हो," खंडपीठ ने कहा।

अदालत ने कहा कि आरोपी को सीआरपीसी की धारा 313 के तहत यह कहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह घटना की रात कहां था। "किसी भी अभियुक्त को चुप रहने का अधिकार है और इस तरह की चुप्पी को उसके खिलाफ लाए गए किसी भी आरोप की स्वीकृति के रूप में नहीं माना जा सकता है। एक अभियुक्त को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है। उसे दोषी साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर है। अभियुक्त को कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है", पीठ ने निष्कर्ष निकाला।

अपीलकर्ता के लिए अंकित अग्रवाल, सुबीर देबनाथ, सोहम बनर्जी, अलोट्रीयो मुखर्जी और रोमा रॉय एवं राज्य के लिए एपीपी मधुसूदन सुर और एडवोकेट मनोरंजन महतो पेश हुए।