IBC की कार्यवाही में लंबित स्थगन में लेनदार को समझौता डिक्री की संतुष्टि के लिए प्राथमिकता नहीं दी जा सकती, पढ़िए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

IBC की कार्यवाही में लंबित स्थगन में लेनदार को समझौता डिक्री की संतुष्टि के लिए  प्राथमिकता नहीं दी जा सकती, पढ़िए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

एक अवमानना की याचिका को खारिज करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को माना है कि अवमानना की कार्यवाही को भुगतान के उस आदेश को तामील या निष्पादित करने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता है,जिनके निष्पादन को एक कानून द्वारा चल रही दिवाला कार्यवाही के कारण रोका गया हो।

क्या था मामला

याचिकाकर्ता, एक एकमात्र स्वामी है और उसने अपना पैसा वसूलने के लिए प्रतिवादियों,जो कि एक निर्माण कंपनी है व उसके निदेशकों के खिलाफ सूट दायर किया था। जहां पर पक्षकारों के बीच समझौता होने पर एक समझौता डिक्री को कोर्ट ने पारिक कर दिया था। जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष वर्तमान सिविल अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी और आरोप लगाया कि प्रतिवादी उसका भुगतान नहीं कर रहे है और जानबूझकर समझौता डिक्री की अवज्ञा कर रहे है। जिसके बाद दिवाला और दिवालियापन संहिता 2016(आईबीसी) की धारा 10 के तहत दिवाला समाधान प्रकिया के लिए मामला दायर कर दिया गया,जिसमें अभी आईबीसी की धारा 14 के तहत स्थगन या रोक की अवधि चल रही है।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्रतिवादियों ने जानबूझकर कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया है और आईबीसी की धारा 14 के तहत लगाए गई रोक का भारतीय संविधान के अनुच्छेद 215 व अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत अवमानना की कार्यवाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यह भी दावा किया गया कि याचिकाकर्ता ने एक क्रियाशील लेनदार के तौर पर आईबीसी की धारा 15 के तहत अपने पैसे के लिए दावा किया है,जिसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह केस प्रतिवादियों को दंडित करने के लिए अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत दायर किया गया है,न कि अपना पैसा वापिस पाने के लिए।

यह भी दलील दी गई कि प्रतिवादी कंपनी की तरफ से रोक को बचाव के तौर पर प्रयोग नहीं किया गया सकता है क्योंकि उन्होंने इस रोक के शुरू होने के बाद भी अपनी देय राशि की एक किस्त की अदायगी कर दी है। इसलिए प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाए कि वह समझौता डिक्री का पालन करें।

प्रतिवादियों की दलीलें

प्रतिवादियों की तरफ से सबसे पहली दलील दी गई कि अवमानना की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है या अनुरक्षणीय नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अच्छा है कि पक्षकारों के बीच एक समझौता हुआ था,परंतु प्रतिवादियों की तरफ से कोर्ट के समक्ष कोई स्पष्ट अंडरटेकिंग नहीं दी गई थी। यह भी दलील दी कि सिर्फ वहीं सहमति या समझौते के आदेश अवमानना के अधिकारक्षेत्र में आते है,जिनके साथ अंडरटेंकिग या निषेधाज्ञा दी गई हो। इसलिए अवमानना की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और याचिकाकर्ता के पास यह अधिकार है कि वह समझौता डिक्री को निष्पादन की प्रक्रिया के तहत लागू करवा ले।

दूसरी दलील यह दी गई कि याचिकाकर्ता आईबीसी की कार्यवाही के कारण समझौता डिक्री को निष्पादित या लागू नहीं करवा पाया था। इसलिए यह जानबूझकर कोर्ट के आदेश को न मानने का मामला नहीं है और अवमानना की कार्यवाही नहीं बनती है।

यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता उनके क्रियाशील लेनदारों की लाइन में लगा एक लेनदार है,इसलिए अब डिक्री का पालन सिर्फ आईबीसी की कार्यवाही के जरिए ही करवा सकता है। उसे इस अवमानना याचिका के चलते लेनदारों लाइन को तोड़कर तरजीही व्यवहार नहीं दिया जा सकता है।

अंतिम दलील में यह भी स्पष्ट किया गया कि प्रतिवादियों ने स्थगन या रोक की अवधि शुरू होने के बाद जो किस्त दी थी,वह कंपनी के खाते से नहीं दी गई थी,बल्कि वह राशि निदेशकों ने अपने खाते से एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही से माफी पाने के लिए की थी क्योंकि उस मामले में उनको भी आरोपी बनाया गया था।

निष्कर्ष

कोर्ट ने प्रतिवादियों की उस दलील को खारिज कर दिया,जिसमें अवमानना के केस को सुनवाई योग्य न होने की बात कही थी। कोर्ट ने रामा नारंग बनाम रमेश नारंग व अन्य, (2006)11 एससीसी 114 मामले में दिए गए फैसले पर विश्वास किया,जिसमें माना गया था कि अदालत की अवमानना अधिनियम की धारा 2(बी) के तहत किसी आदेश या डिक्री के जानबूझकर अवज्ञा या ना मानने की बात कही गई है,अगर कोई ऐसा करता है तो उसे अवमानना माना जाएगा और समझौता डिक्री भी वैसी ही डिक्री है,जैसी डिक्री न्यायिक निर्णय के तहत पास की जाती है। यह माना गया था कि सहमति से जब एक डिक्री पारित की जाती है तो अदालत उस सहमति में अपना आदेश भी जोड़ देती है और इस प्रकार यह उसमें आदेश ओर अनुबंध,दोनों से शामिल हो जाते है।

याचिकाकर्ता की तरफ से दी गई पहली दलील का जवाब देते हुए कोर्ट ने प्रतिवादियों की उस दलील को सही पाया कि प्रतिवादियों द्वारा अपनी लेनदारी खत्म करने के लिए लेनदारों ( जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल है) को जो भुगतान किया जाएगा,उस अब आईबीसी की कार्यवाही लागू होगी या उसी कार्यवाही के तहत अब कोई भुगतान किया जाएगा।

इसलिए याचिकाकर्ता के पक्ष में दी गई डिक्री का पालन न करने के लिए प्रतिवादियों को कानून के तहत रोका गया था। ऐसे में उन्होंने जानबूझकर समझौता डिक्री की अवज्ञा नहीं की थी। जस्टिस ज्योति सिंह की कोर्ट ने माना कि यह कानूनन निर्धारित है कि अवमानना की कार्यवाही को सफल बनाने के लिए जानबूझकर पालन न किए जाने का तथ्य पाना चाहिए,परंतु इस केस में ऐसा नहीं है।

नियाज मोहम्मद व अदर्स बनाम हरियाणा राज्य व अन्य, (1994)6 एससीसी 332 सहित अन्य मामलों में दिए गए फैसलों पर भी कोर्ट ने विश्वास किया। जिनमें माना गया है कि ''अवज्ञा या नाफरमानी कुछ दमदार परिस्थितियों का परिणाम है जिनके चलते आदेश का पालन कर पाना ( अवमानना करने वाले के लिए या विचारक ) संभव नहीं था। ऐसे में न्यायालय इस कथित अवमानना करने वाले या विचारक को दंडित नहीं कर सकता है।''

कोर्ट ने बाद में यह भी कहा कि ''आईबीसी कार्यवाही के लंबित रहते हुए,प्रतिवादियों द्वारा समझौता डिक्री की संतुष्टि के लिए याचिकाकर्ता को अधिमान्य व्यवहार या तरजीही व्यवहार नहीं दिया जाना उचित है।''

कोर्ट ने प्रतिवादियों की उन दलीलों का भी समर्थन किया,जिनमें कहा गया था कि शुरूआती किस्त की राशि कंपनी के निदेशकों ने दी है और कहा कि इससे स्थगन की कार्यवाही किसी भी तरह प्रभावित नहीं हुई है। याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णनन व साथ में वकील अंकित अग्रवाल पेश हुए और प्रतिवादियों की तरफ से वकील जवाहर ने पैरवी की।