चेक बाउंंस के केस की कार्रवाई को सिर्फ इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता कि नोटिस वैधानिक अवधि में नहीं दिया गया, पढ़िए SC का फैसला

चेक बाउंंस के केस की कार्रवाई को  सिर्फ इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता कि नोटिस वैधानिक अवधि में नहीं दिया गया, पढ़िए SC का फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताज़ा फैसले में यह माना है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कार्रवाई को इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता है कि मांग नोटिस (demand notice) को वैधानिक अवधि के भीतर विधिवत रूप से तामील नहीं किया गया है।

न्यायालय ने दोहराया है कि आरोपी को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत नोटिस की तामील, एक ट्राइबल इश्यू है और आरोपी द्वारा धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर याचिका में इसे निर्विवाद पोजीशन के रूप में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है।

इस मामले में, उच्च न्यायालय ने आरोपी द्वारा Cr.P.C की धारा 482 के तहत दायर याचिका को इस आधार पर खारिज करने की अनुमति दी कि वैधानिक अवधि के भीतर अभियुक्त को कानूनी नोटिस नहीं दिया गया है और यह टिप्पणी चेक रिटर्न मेमो पर नोट की गई है। उच्च न्यायालय ने आगे कहा था कि नोटिस की तामील में निहित प्रावधान, जनरल क्लॉज़ एक्ट में सुपरसीड नहीं किये गए हैं और इसलिए, वर्तमान मामले में जनरल क्लॉज़ एक्ट की धारा 27 लागू नहीं हुई है।

न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने किशोर शर्मा बनाम सचिन दुबे के अपने संक्षिप्त आदेश में उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए अवलोकन किया:

"इन दोनों तथ्यों के चलते, पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता होगी और यह परीक्षण योग्य इशू है, जैसा कि इस अदालत ने 'अजीत सीड्स लिमिटेड बनाम के. गोपाल कृष्णैया (2014) 12 एससीसी 685' और 'लक्ष्मी द्येचेम बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य (2012) 13 एससीसी 375 के मामलो में अभिनिर्णित किया गया है।"

अजीत सीड्स लिमिटेड में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नोटिस की तामील, सबूत और साक्ष्य का मामला है और प्रक्रिया जारी करने के चरण में, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत कार्यवाही को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना जल्दबाजी होगी। इसे आगे इस प्रकार अभिनिर्णित किया गया कि:

"यह स्पष्ट है कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 114, न्यायालय को यह मानने/अनुमान लगाने में सक्षम बनाती है कि प्राकृतिक घटनाओं के सामान्य क्रम में, संचार/पत्र/नोटिस व्यक्ति के पते पर पंहुचा दिया गया होगा। जनरल क्लॉज़ अधिनियम की धारा 27, इस अनुमान को जन्म देती है कि नोटिस की तामील प्रभावी मानी जाएगी, यदि इसे पंजीकृत डाक द्वारा सही पते पर भेजा गया है। शिकायत में यह बताना आवश्यक नहीं है कि बिना नोटिस की तामील हुए वापस आने के बावजूद, यह माना जायेगा कि नोटिस तामील हो गई है या पते पर रहने वाले व्यक्ति को नोटिस का ज्ञान है।

जब तक कि नोटिस जिसे भेजा गया है, वह व्यक्ति इसके विपरीत साबित नहीं करता है, तब तक नोटिस की तामील को उस समय मान लिया जाता है, जिस समय वह पत्र व्यापार के सामान्य कोर्स में पंहुचा दिया गया होगा। "