" गरीब, खानाबदोश जनजाति के निर्दोष लोगों को झूठा फंसाया गया, " SC ने 6 को बरी करते हुए आगे जांच के आदेश दिए, 5 लाख का मुआवजा

 गरीब, खानाबदोश जनजाति के निर्दोष लोगों को झूठा फंसाया गया,  SC ने 6 को बरी करते हुए आगे जांच के आदेश दिए, 5 लाख का मुआवजा

एक अनूठे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न केवल मौत की सजा के 6 दोषियों को बरी कर दिया है बल्कि 16 वर्ष पहले हुए एक अपराध में आगे जांच का भी आदेश दे दिया है।

न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी, न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति एम. आर. शाह की पीठ ने महाराष्ट्र राज्य को यह आदेश दिया है कि बरी हुए सभी दोषियों को क्षति के रूप में 5 लाख रुपये का भुगतान किया जाए।

अंकुश मारुति शिंदे और 5 अन्य पर 5 हत्याएं करने और 1 महिला (जो बच गई) और 15 साल की एक बच्ची (जिसकी मौत हो गई) के साथ बलात्कार करने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्ष 2009 में इन सभी को दी गई मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखा था। पुनर्विचार याचिकाओं पर मंगलवार को दिए गए एक फैसले में सभी को बरी कर दिया गया है।

रहस्यमयी चार आरोपी

बेंच ने पाया कि यह रिकॉर्ड पर आया था कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को दिए अपने बयान में घायल गवाह (जिसका कथित रूप से बलात्कार किया गया था), ने नाम के साथ तस्वीरों से 4 व्यक्तियों की पहचान की जो कोई और हैं।

"पीडब्लू 8 द्वारा 7.6.2003 को पहचाने गए सभी लोगों की योग्यता की कोई जांच नहीं की गई। इसके विपरीत, वर्तमान मामले के अभियुक्तों जो खानाबदोश जनजाति के हैं, उन्हें झूठा फंसाया गया।" बेंच ने अवलोकन किया।

जाहिर तौर पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज दोषसिद्धि उसी गवाह (पीडब्लू 8) द्वारा किए गए बयान पर निर्भर है, जिसने 2.5 वर्ष बाद इन 6 आरोपियों के खिलाफ सबूत दिए। हालांकि उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया गया था कि उसके बयान में लगाए गए आरोपों को पुलिस/विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अपने बयानों में नहीं बताया था जो जाँच के दौरान दर्ज किए गए थे। पीठ ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि ये चूक मामूली चूक है।

"पीडब्लू 8 के पूरे साक्ष्य पर गौर करने पर हम उच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार नहीं करते हैं कि ये चूक एक मामूली चूक है। घटना के बारे में पीडब्लू 8 के चित्रण और विभिन्न आरोपित व्यक्तियों द्वारा निभाई गई भूमिका के बारे में विचार करने पर हम इस राय में हैं कि यह चूक एक अहम चूक हैं और ये अभियोजन के मामले के लिए घातक हैं और किसी भी मामले में ये पीडब्लू 8 की विश्वसनीयता पर उचित संदेह पैदा करती है," पीठ ने इस संबंध में पाया।

पीठ ने तब यह माना कि यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 (8) के तहत आगे की जांच के लिए एक उपयुक्त मामला है, जो उन 4 व्यक्तियों भी भूमिका की जांच को योग्य बनाती है, जिन्हें घायल गवाह द्वारा पहचान लिया गया था। राज्य को प्रत्येक 'आरोपी' को 05 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश देते हुए पीठ ने जेल में पिछले डेढ़ दशक से उनकी दुर्दशा का भी बखान किया।

"एक को छोड़कर, सभी अभियुक्त पिछले 16 सालों से जेल में हैं। सभी मौत की सजा का सामना कर रहे थे। 6 आरोपियों में से 1 को बाद में किशोर पाया गया था। मनोचिकित्सक की रिपोर्ट के अनुसार जिसने एक आरोपी अंकुश मारुति शिंदे की जांच की, जो बाद में किशोर पाया गया, उसने स्पष्ट रूप से इस बात को माना है कि वह कई वर्षों से उप-मानवीय परिस्थितियों में रहता है। उसे एकान्त में रखा गया था। प्रतिबंधित मानव संपर्क और मृत्यु के सतत डर के कारण वो यातना झेलने पर विवश था। उसे केवल अपनी माँ से मिलने की अनुमति थी, और वह भी कभी- कभार। उसे अन्य कैदियों के साथ घुलने-मिलने की अनुमति भी नहीं थी।

इसलिए सभी आरोपी निरंतर तनाव में थे और वे मृत्यु के सतत भय में थे। जैसा कि वे मौत की सजा का सामना कर रहे थे, उन्होंने पैरोल, फरलॉ आदि में से किसी भी अन्य सुविधाओं का लाभ नहीं उठाया। उन सभी की उम्र 25-30 वर्ष के बीच थी और एक आरोपी किशोर था, उन्होंने जेल में अपनी जिंदगी के अपने बहुमूल्य वर्ष खो दिए हैं। इसके चलते उनके परिवार के सदस्यों को भी नुकसान उठाना पड़ा है।"

जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष के आचरण पर कड़ा रुख पेश करते हुए अदालत ने मुख्य सचिव, गृह विभाग, महाराष्ट्र राज्य को निर्देश दिया कि वे इस मामले की जाँच करें और उन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करें जो अभी भी सेवा में हैं।

"हम मुख्य सचिव, गृह विभाग, महाराष्ट्र राज्य को इस मामले को देखने और अभियोजन मामले की विफलता के लिए ज़िम्मेदार ऐसे अधिकारियों की पहचान करने का निर्देश देते हैं, जो सरासर लापरवाही के कारण या चूक के कारण इस मामले में वास्तविक अपराधी हैं," पीठ ने कहा।